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शहीदों को समर्पित कविता 


शुरू हो चुकी शंख नाद,
मैं फिर से विगुल बजानें आऊँगा!
शहीदों को समर्पित कविता

तू दरिया होगा अपनें जहां का,
तेरा अस्तित्व मिटानें,
मैं फिर से सागर बनके आऊँगा !

अरे कायरों तू बाज नही आया,
अपनें काले कारनामों से,
तुझें गिराने तुझे उखाड़ने,
मैं फिर से जन्म लेकर,
तुझे मिटानें आऊँगा!

माँ के आंसु बेकार नही होगें,
पिता के जज्बे शिथिल नही होगें,
यारों की यारी खामोश नही होगें,
तुझे हिलाने ऐ दुश्मनों,
मैं फिर से तेरे जमीं पर,
जलजले बनके आऊँगा!

तू क्या समझे इन्सानियत क्या है,
तू क्या समझे प्यार क्या है,
तेरे नफरत को मिटाने,
मैं फिर से तुझे ऐ पापी,
सीख सिखाने आऊँगा!

तू सावधान हो जा अरे बुजदिलों,
घमंड न कर अपनें नुमाईशों पर,
मैं फिर तेरे वजूद को,
खाक में मिलानें आऊँगा!

छोड दे नजर डालना,
ऐ बुरे नजर वाले,
तू एकदिन बिन आंखों का हो जायेगा,
न तेरा दस्तूर रोक पाया है न रोक पायेगा,
एक नही पल में सैकडों हो जाऊँगा,
मैं फिर से अपनें ,
देश को बचाने आऊँगा!


- राहुलदेव गौतम

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  1. बहुत अच्छी कविता। लेखक महोदय को मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं। शहीदों को प्रणाम।
    राजेन्द्र कुमार शास्त्री'गुरु'

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