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अभिलाषा


चाह थी कि एक नन्हीं सी परी पाऊँ मैं,
घूमती देखूँ तो उसको इतराऊँ मैं,
समय के साथ बड़ी वो होती गयी,
उसकी सही परवरिश के लिए,
नन्हीं परी
कठोर मैं होती गयी,
कठोरता मैं वह वात्सल्य कहाँ गुम गया,
शायद मैं भी न जान पाई,
चिन्तित हूँ उसके लिए,शायद मैं घबराई,
मुझको गलत न समझ लेना,
मेरी नन्हीं परी,
तुमको निहारुँ,इतराऊँ,
इतनी ही मेरी इच्छा जगी,
चाह थी कि........
तुमको जीवन की हर सफलता मिले,
तुम पर कभी कोई उँगली न उठे,
अपना तुम रख सको ध्यान,
तुमको सही बनाना ही है,
मेरा कर्तव्य प्रधान,
तुम जीवन के उच्चतम शिखर को प्राप्त करो,
अपने संकल्प को पहचानो और स्वीकार करो,
करना होगा इसके लिए तुम्हें परिश्रम महान,
समय को व्यर्थ न करना,
इसका सदा करना सम्मान,
चाह थी कि......
उच्च शिखर पर सफलता केजब तुम पहुँचो,
तो देखना,
तुमको वही ममतामयी माँ आएगी ध्यान,
मुझको और मेरी निष्ठुरता को भूल,
तुम मुझे दोगी सम्मान,
मैं फिर इतराऊँगी,इठलाऊँगी,
कि मैंने देखा था जो सपना,
सुगन्धित पुष्प में परिणित हो,
वह सपना आज हुआ अपना,
वह सपना आज.......
चाह थी कि ........
               

  -रशिम श्रीधर
        (माँ की पाती पुत्री के नाम)
                  स्वरचित

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