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कम्बल 

उस भिखारी का ठण्ड के मारे बुरा हाल था I मैं उसकी मदद करना चाहता था लेकिन मेरे पास भी सिर्फ एक ही
भिखारी
कम्बल था और फिर ? कड़ाके की ठण्ड थी I  मैं गाड़ी से तकरीबन बारह बजे रेलवे स्टेशन  पर उतरा I  एक लैदर  का कोट, एक खैसला, टोपी और मफलर भी  ठण्ड के आगे हाथ खड़े कर चुके थे I

मैं ठण्ड के मारे कंपकंपा रहा था I  आखिरकार मैं जैसे-तैसे करके एक सीमेंटेड बर्थ पर जाकर बैठ गया I  रेलवे स्टेशन पर इकी-दूकी आदमी नजर  आ रहे थे I  मैंने अपने पावों  को ऊपर उठाया और खैसले को  एक  रजाई की तरह प्रयोग करके बैठ गया I  ज्यों ही मैंने पलकें उठाकर ऊपर की तरफ देखा तो रेलवे स्टेशन  के एक कौने में एक बूढा भिखारी बैठा था I  उसके पास कम्बल  नहीं था I बस  एक स्वेटर  थी  और उसमे भी  अनैकों छिद्र थे I  वह बैचारा ठण्ड से बचने के लिए कौने में खिसक चूका था लेकिन उसका ये उपाय काम नहीं कर रहा था I  ये सब देखकर  मेरा मन किया की मैं उसे अपना खैसला दे दूं I  लेकिन जैसे ही मैंने खैसले को समेटने  के लिए अपने पाँव बाहर निकाले  मेरे नेक इरादे जबाब दे चुके थे I  मैंने उस बुजुर्ग भिखारी की मदद तो करनी चाही लेकिन मैं असहाय था I कुछ ही पल बाद एक दूसरा भिखारी वहां आया I उसके पास एक कम्बल था I वह उस भिखारी के पास जाकर बैठ गया I उसने अपन कम्बल फैलाया और आधा उसे भी औढा दिया I 

मैं ये सब देखकर भावविभोर हो गया I मुझे उसी पल पता चल गया की मदद करने के लिए दिमाग लगाने की नहीं दिल की जरुरत होती है I काश! मैं भी उस भिखारी की तरह बड़ा दिल वाला होता I 

     
- राजेन्द्र कुमार शास्त्री `गुरु`

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