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भोली 

वह कक्षा तीन की छात्रा थी,नाम था भोली। हमेशा अस्त-व्यस्त,बाल बिखरे, देर से आती और पीछे चुपचाप बैठ
भोली सी लड़की की कहानी
जाती ।देर से आने के कारण वह अक्सर मुझसे डाँट खाती,बोलती कुछ नहीं,चुपचाप सिर झुकाए सुनती रहती।

आज भी वह रोजाना की तरह देर से आयी।रोज़ -रोज़ उसके देर से आने के कारण मुझे बहुत गुस्सा आया,सोचा कि आज प्रधानाचार्या जी के पास ले ही जाती हूँ।मैंने जैसे ही उसे पकड़ना चाहा ,उसने मुझे अपने नन्हें नन्हें हाथों से रोकने का प्रयास किया। उसके हाथों को देखकर मैं ठिठक गयी, अन्तर्मन में जैसे कुछ हिल सा गया,उसके हाथों में आटा लगा हुआ था। बहुत पूछने पर उसने बताया कि माँ के गुज़र जाने के बाद वो अपने छोटे भाई और बहन के लिए खाना बनाकर आती है,और पिताजी काम पर जाते हैं तो उनके लिए भी रोटी बनाती है। उसकी बातें सुनकर मेरी आँखों से लगातार आँसू निकलते जा रहे थे। वह फिर चुप ही खड़ी थीऔर मुझे अपने ऊपर ग्लानि हो रही थी कि मैं पूरी वास्तविकता जाने बिना ही उसे डाँटती रही।

तब मैंने निश्चय किया कि अब वो चाहे कितनी भी देर से आये उसे प्यार से ही पढाऊँगी,और इसकी माँ की कमी 
को दूर करने की कोशिश करूंगी। 


- रश्मि श्रीधर

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  1. बहुत सुंदर छोटी सी कहानी है. इसे पढ़ कर मैंने एक ग़ज़ल लिखी है--

    ६७२४. मुहल्ले में लड़की जो इक रह रही थी


    मुहल्ले में लड़की जो इक रह रही थी
    फ़क़त उम्र उसकी बरस चार की थी

    बहुत ही थी भोली वो छोटी सी बच्ची
    सभीके दिलों में वो जैसे बसी थी

    सदा खिलखिलाना, चहकना, फुदकना
    निशानी यही एक उसकी बनी थी

    फिज़ा संग लाती थी जब भी वो आती
    बहारों के साए में ज्यों वो पली थी

    खिले थे बहुत फूल यूँ तो चमन में
    मगर उसकी सूरत सभीसे हसीं थी

    तभी एक दिन एक तूफ़ान आया
    न उससे वो मासूम सी बच सकी थी

    लिए शक्ल हैवान की कोई आया
    नज़र उसकी कब से कली पर लगी थी

    हुआ खून इंसानियत का ख़लिश था
    गिरह उसके बचपन में ज्यों लग गई थी.

    बहर --- १२२ १२२ १२२ १२२

    महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
    mcgupta44@gmail.com

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