0
Advertisement

बचपन ना आया 



आज फिर आई सुबह मांजा  पतंग लेकर
सुनहरी धूप आई दबे पाँव  छत से उतर कर
दूब पर फिर से बिछी ओस की चादर
बचपन
बचपन
सघन वृक्षों से चहका  अनगिन पक्षियों का स्वर
लगा जैसे सब ने  पुकारा , बुलाया साथ मिल कर
पर ठिठोली से भरा बचपन ना आया लौट कर |
फिर गस्त पर आया  प्रभाकर  ले कर उजाले
गलियों से गुजरे गुब्बारे, कुल्फी   के फेरीवाले
फिर से आई सांझ   झूलों पे   झूली लेकर हिंडोले
शाखों से गूंजे फिर से पक्षियों के स्वर निराले
लगा जैसे सब ने  पुकारा , बुलाया साथ मिल कर
पर ठिठोली से भरा बचपन ना आया लौट कर |
लगा कभी  चमकीले बटन , आई निशा  मन मोहिनी
या निस्तब्द  नभ ले बहुरूपिया चांद और चांदनी
आया  चांद को ढकने एक नन्हा मेघ का टुकड़ा
और तभी  आया पवन  दिखाने चांद का मुखडा
लगा जैसे सब ने  पुकारा , बुलाया साथ मिल कर
पर ठिठोली से भरा बचपन ना आया लौट कर |


- संतोष चौहान 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top