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आज मैंने कुछ नहीं किया 



आज मैं ने कुछ नहीं किया, लेकिन कुछ तो किया, आखिर क्या किया?
सुबह उठा, अल्लाह का शुक्र अदा किया;
फ्रेश हुआ,
नाश्ता करने गया,
लेखन
जितना करता था, उतना नहीं किया!
वेटर भाई को बोला,
आज मन नहीं कर रहा खाने का।
वहां से कमरे पर आ गया,
थोड़ी देर धूप में बैठा,
कहीं बेचैनी थी, कहाँ, नहीं पता;
दुविधा में था,
नहाऊँ या नहीं?
आज मैं ने कुछ नहीं किया, लेकिन कुछ तो किया, आखिर क्या किया?

आज एक दोस्त को बर्थडे विश किया,
अमीर खुसरो की मुकरियां पढ़ा,
विद्यापति की पदावली पढ़ा।
दोपहर हुआ,
लंच किया,
जितना करता था, उतना नहीं किया!
कुछ गड़बड़ था,
वह मेरे अंदर था,
मुझे झकझोर रहा था;
लाइट चली गयी और
आज मैं ने कुछ नहीं किया, लेकिन कुछ तो किया, आखिर क्या किया?

लाइट चली गयी तो चेयर से उठा,
हॉस्टल में, रूम के सामने बने, बरामदे के बाहर, लॉन में रखी, उस चीज़ पर, जाकर बैठ गया;
जिसका मुझे नाम तक नहीं पता।
मन को शांत करने के उपायों को तलाश किया।
लॉन में खड़े पेड़ पर, आती-जाती चिडियों की, चहचहाहट को सुना।
खास दोस्त से करिअर को लेकर बहुत सी गुफ्तगू हुयी।
2018 वाला ₹100 का नोट देखा,
संयुक्त अरब अमीरात वाला पाँच दिरहम का नोट देखा; लाइट फिर आ गयी और,
वह भी उठ कर चला गया।
आज मैं ने कुछ नहीं किया, लेकिन कुछ तो किया, आखिर क्या किया?

लाइट आ गयी तो,
मैं भी कमरे में आया,
पानी की खाली बोतल को उठाया और बरामदे में लगे, फ्रीजर से पानी लेने आ गया।
मेरे रूम की बैक में रहने वाले और मेरे साथ हर अच्छे-बुरे पहलू पर, अपनी बेबाक राय रखने वाले,
मेरे खास मित्र से चर्चा हुयी।
शाम का वक्त हुआ,
एस एस नॉर्थ और साउथ हाल के बीच बनी जामा-मस्जिद की मीनार से, मग़रिब की अज़ान आने लगी;
लेकिन आज मैं ने कुछ नहीं किया,
अपनी क़लम को उठाया और बस लिख दिया,
आज मैं ने कुछ नहीं किया, लेकिन कुछ तो किया, आखिर क्या किया?




- मो. जहाँगीर
एम. एस. डब्ल्यू. 
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ 

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