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शकुंतला


आज चौका छूने की रसम है. बुझे मन से शकुंतला उठकर तैयार होने लगी. सिंदूर मांग में भरते-भरते एक पल के लिए उनका हाथ रूक गया. सोचने लगी, क्या सचमुच ब्याहता हैं हम? सिर्फ मांग में सिंदूर भरने से कोई ब्याहता हो जाता है क्या? उसके लिए तो पति का साथ चाहिए. क्या मेरे भाग्य में है ऐसा? सिंदूर हाथ में लिए सोचती रही. कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं उनकी दूसरी पत्नी हूं? कहीं उनका किसी अन्य स्त्री के साथ प्रेम संबंध तो नहीं? कुछ समझ ही नहीं आ रहा था. किससे कहे, क्या कहे? आंखों से आंसू टपक पड़े थे.

अरे बहू तुम रो रही हो? नैहर की याद आ रही है? क्या करोगी, लड़कियों का भाग्य ऐसा ही होता है. सास निर्मला के मुंह से सहानुभूति के बोल सुन शकुंतला की सब्र का बांध टूट गया था. फफक पड़ी थी वो.

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शकुंतला
शकुंतला
बिदाई के बाद नैहर से ससुराल आये पंद्रह दिन हो गये थे, लेकिन पति वीरेंद्र ने एक बार भी फोन नहीं किया था अब तक. अब चिंता होने लगी थी शकुंतला को. हिम्मत करके उसने निर्मला से पूछ ही लिया, अम्मांजी सच-सच बताइएगा. कहीं इनका किसी से प्रेम संबंध तो नहीं? इनके जीवन में कोई और स्त्री तो नहीं? कहीं मैं इनकी दूसरी पत्नी तो नहीं? क्यों इन्होंने उस रात एक बार भी बात नहीं की हमसे? ना ही ये हमें लेने मेरे घर आये, ना स्टेशन. क्या बात है, कुछ बताइये तो सही. यदि ये इस शादी से गुस्से में हैं तो हमें उनके पास भेज दीजिए, हम अपने तरीके से इन्हें मनाने की कोशिश करेंगे. एक के बाद एक प्रश्न करती चली गयी शकुंतला अपनी सास से. लेकिन निर्मला एक भी प्रश्न का उत्तर दिये बिना उसे समझाने लगी. चिंता की कोई बात नहीं है बहू. थोड़ा शर्मिला है. आज शाम जब घर आ जायेगा तो पूछ लेना? सुबह ही फोन आया था. आज घर आ रहा है.
क्या आज लौट रहे हैं ये? एक अनचाही खुशी तैर गयी थी शकुंतला के चेहरे पर.
सचमुच शाम को वीरेंद्र घर आ गये थे. नजर उठाकर शकुंतला को देखा भी था. रात में सोने के समय शकुंतला ने जब वीरेंद्र से बात करनी चाही तो वे बिना कुछ बोले ही सो गये. किंतु शकुंतला को रातभर नींद नहीं आयी. आती भी कैसे भला. रातभर में उसने निश्चय कर लिया था कि कल उसे क्या करना है. सुबह उठते ही अपना सामना बांधना शुरू कर दिया. सात बजे तक जब वे कमरे से बाहर नहीं निकली तो निर्मला बुलाने चली आयी. किंतु दरवाजे पर पहुंच उसके कदम ठिठक गये.

अरे बहू, वीरेंद्र के साथ कहीं बाहर जा रही हो क्या. अम्मांजी क्या आप हमें अपनी बहू मानती हैं? अरे ये कैसा प्रश्न है? तुम वीरेंद्र की पत्नी हो, इस नाते मेरी बहू ही हुई. तो फिर अब तक हमें इनका सच क्यों नहीं बताया गया? निर्मला को जब कोई बहाना नहीं सूझा ताे वह बाहर जाकर शकुंतला के ससुर सुरेंद्र व देवर राजेंद्र को बुला ले आयी.

सुरेंद्र ने जो बात बतायी, उसे सुन शकुंतला के पैरों तले की जमीन ही खिसक गयी. बहू, असल में वीरेंद्र में बुद्धि की थोड़ी कमी है. बुद्धि कम का मतलब, हम समझे नहीं. शकुंतला ने पूछा. मतलब वह....... इसके आगे सुरेंद्र कुछ भी नहीं कह सके. निर्मला ने बताया कि एक दुर्घटना में सिर पर चोट लगी थी तभी से वीरेंद्र की सोचने-समझने की शक्ति प्रभावित हो गयी. जन्मजात ऐसा नहीं है वह. महीने में पंद्रह दिन उसे उपचार के लिए पागलखाने जाना होता है. अभी वहीं से आया है. नियमित ऑफिस भी नहीं जा पाता. मैनेजर अच्छा है, उपस्थिति लगा देता है. जब थोड़ा सामान्य होता है, तब ऑफिस भी चला जाता है. डॉक्टर का कहना है कि धीरे-धीरे ठीक हो जायेगा, परंतु पहले की तरह कभी नहीं हो पायेगा. सारी बातें बताकर जोर-जोर से रोने लगी थी निर्मला.
किंतु निर्मला की बातों को जानने-समझने में शकुंतला को कोई रुचि नहीं थी. जिसका पूरा संसार ही अंधेरा हो गया हो, उसे दूसरे के जीवन में फैले अंधेरे के कारणों को जानने में क्यों रुचि होगी भला. उसने अपने सास-ससुर और देवर के आगे हाथ जोड़ा और नैहर छोड़ आने की प्रार्थना की. पहले तो वे नहीं माने, परंतु जब शकुंतला ने अन्न-जल त्याग दिया तो उन्होंने उसे नैहर भेज दिया.

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भारी मन से शकुंतला ने अपने घर में प्रवेश किया. उसे इस तरह अचानक आया देख उसकी भाभियां घबरा गयीं. क्या हुआ दीदी? किंतु उनसे बिना कुछ बोले ही शकुंतला चुपचाप अपने कमरे में आकर लेट गयी. बिना खाये ही सो गयी. सुबह जब उठी तो आंखें फूली हुई थीं. पर किसी ने उसेसे कुछ भी नहीं पूछा. नित्य क्रिया से निवृत्त हो नहाने चली गयी. नहाने के बाद हल्के रंग की साड़ी में बिना सिंदूर-बिंदी के जब वह बाहर आयी तो भाभियाें से रहा न गया. उन्होंने पूछ ही लिया, दीदी अब तो बता दीजिए, क्या हुआ है वहां? पूरी बात जान भाई-भाभी ने उससे सहानुभूति जतायी. कोई बात नहीं दीदी, यह आपका ही घर है, आप यहीं रहिये. यहां के सिवा और कहां जायेंगे, मन ही मन में शकुंतला ने प्रश्न किया.

जीवन सहानुभूति के सहारे नहीं चलता, न ही सहानुभूति की उम्र लंबी होती है. एक सप्ताह के भीतर ही शकुंतला को यह बात समझ में आ गयी थी कि अब उनका अपना कोई नहीं रहा. चैन की बात यह थी कि पिता के इस घर में शकुंतला का भी हिस्सा था. यहां बहनों और बुआओं ने भी उसका साथ दिया. सो, घर का एक कोना भाईयों को अपनी बहन को देना पड़ा. जीवन-यापन के लिए वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी. गहनों की कारीगरी का काम भी आता था उसे, सो भाईयों की दूकान के लिए भी काम कर लिया करती थी. जब घर में सस्ता कारीगर हो तो बाहर से महंगा काम क्यों कराना. इस तरह शकुंतला अपना जीवन जीने लगी. भतीजे-भतीजीयों पर अपनी ममता लुटाने लगीं. अभी सामान्य होने का प्रयास कर ही रही थीं कि देवर आ पहुंचा उन्हें लिवाने. वीरेंद्र फिसलकर गिर पड़े थे और एक बार फिर उनके सिर पर चोट लगी थी. पैर भी टूट गया था. दो महीने बाद पैर का प्लास्टर कटा था.

अबकी बार वीरेंद्र पूरी तरह पागल हो गये थे अौर पागलखाने भेज दिये गये थे. किंतु इस बार शकुंतला बिना आस के वापस नैहर नहीं आयी थी. कोर्ट में मुकदमा करके आयी थी कि पति की जगह उन्हें नौकरी दी जाये.

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कोर्ट में मुकदमा किये सात साल बीत गये हैं, परंतु अब तक इस बारे में कोई निर्णय नहीं हुआ है. एक और शकुंतला सुबह की आस में टकटकी लगाये खड़ी है. जाने कब अंधेरा छंटेगा, कब भोर होगी. पति के साथ की आस तो नहीं, किंतु कम से कम सरकारी नौकरी तो मिल जाये, इसी आस में शकुंतला अब तक बैठी है. 



- तरु श्रीवास्तव

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