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कोल्हू का बैल


क्या कभी आपने 
'कोल्हू के बैल ' को दौड़ते देखा है ??
शायद देखा हो !
मैने  भी देखा है कोल्हू के बैल को सुबह से शाम तक दौड़ते हुऐ !!
मुंह पर मुछीका लगाये
( जिससे किसी खाने पीने की चीज की और न लपकें) लगातार दौड़ते हुऐ, !!
कभी -कभी तो कोल्हू के बैल के आँखो पर भी काली पट्टी बाँध देते हैं दौड़ाने से पहले , मैंने कारण पूछा तो साझी काका ने बताया,"बिटिया बैल की आँखी खुली रही तो ओका सब कुछ घूमत दिखिये ,बैल का चक्कर आ जाई यही लिए हम एकी आँखी  बांध देत हैं।।
~~वो "कोल्हू के बैल" दौड़ते हुऐ थक जाते थे, उनके पैर लड़खड़ाने लगते थे फिर भी ....
फिर भी दौड़ते जाते थे ! वो कुछ देर सुस्ताना चाहते थे लेकिन उनके बंधनों के कारण वो बैठ ही नही पाते थे, ,जब कभी उनकी चाल धीमी होती मालिक की कर्कश आवाज सुनते ही फिर दौड़ने लगते बस दौड़ते ही जाते थे !!
थोड़ी-थोड़ी देर में उनकी चाल लड़खड़ाने लगती तो फिर से उनकी पीठ पर चोट की जाती और वो फिर दौड़ने लगते थे |
बूँद-बूँद रस इकट्ठा करते हुऐ , ,!
अपने जीवन का रस खोकर अपने मालिक के लिये रस
इकट्ठा करते हुऐ,,,!
इस आशा में कि कहीं पहुंच रहे है वो 'कोल्हू के बैल' बस गोल-गोल दौड़ते जाते थे ..!
कोल्हू के बैल
कोल्हू के बैल
जब साझी के खेतों में पहली बार गन्ने की पेराई होती थी तो पहली बार का रस वो कन्याओं और ब्राह्मणों को बुलाकर पिलाता था ! पहली बार बना गुड़ उन्हे भेंट करता था इस उम्मीद में कि 'अगर ये खुश होंगे तो गन्ने से ज्यादा रस निकलेगा ,गुड़ की अधिक बिक्री होगी"
(ये साझी ने बताया था) वो गन्ने के रस से बनी लस्सी पिलाता था जो कि मुझे कभी अच्छी नही लगी फिर भी मुझे इंतजार रहता था गन्ने के मौसम का कि कब साझी आये और बोले,"दीदी काल हमरे खेत में ईंखै पेरी जईंहैं बिटिया का लेन अईवे ,भेज दिहो |
और फिर मेरी और देखते हुऐ ~कय बिटिया चलिहो ??
और इससे पहले कि नानी कुछ बोले मैं झट से हाँ बोल देती !
वहाँ की बोली न मैं बोल पाती थी और न ही समझ पाती थी बार-बार नानी से पूछना पड़ता था किसने क्या बोला ?
खैर मुझे बेसब्री से इंतजार होता था अगले दिन का...!
....और अगले दिन उसके साथ बैलगाड़ी पर खेतों तक जाना ,धीरे-धीरे चल रही बैलगाड़ी से हाथ बढ़ाकर सड़क के दोनो ओर लगे पेड़ -पौधों को छूकर देखना ,कभी -कभी हाथ बढ़ाकर कुछ फूल भी तोड़ लेना,,,
ये सब बहुत अच्छा लगता था |जब खेतों तक पहुंच जाती तो जहाँ तक नजर जाती बस हरियाली ही दिखती थी और वहां पहुंच कर मैं देख पाती थी कैसे गन्ने से रस से गुड़ बनता है ?
कैसे कोल्हू में लगे बैलों के दौड़ने से रस इकट्ठा होता है ..?
मैं टकटकी बाँधकर सब कुछ देखती रहती थी !
बैलों के गले में बँधी घंटी की टनटन और दौड़ते पैरों की चाप से बड़ी प्यारी धुन निकलती थी || (किसी का कष्ट किसी का मनोरंजन यही है समाज का सच...! )
उन्हे देखकर एक बात और जान पाई कि कष्ट जब सहन ना हो तो पशुओं के भी आँसू निकलते है ! मैं देखती थी लगातार दौड़ते हुऐ वो हाँफने लगते थे और थकान के कारण उनके आँसू निकलने लगते थे | मैं छोटी थी इसलिये सोचती थी इन्हे भूख लगी होगी इसलिये रो रहे हैं और आस-पास से हरी पत्तियाँ तोड़कर उनके रास्ते में डाल देती थी मगर कभी मुंह बँधा होने के कारण तो कभी मालिक की मार के डर से वो मुंह फेर कर निकल जाते थे | जब वो कोल्हू से आजाद होकर आँख बंद कर आराम कर रहे होते थे तब मैं डरते-डरते उनके पास जाकर देखती कि उनके चेहरे पर आँसुओं की गहरी लाइन बनी हुई है और बेतहासा हाँफ रहे है |
खैर ...! यही उनका भाग्य था आखिर वो "कोल्हू के बैल" थे ||
...लेकिन हम तो नही हैं कोल्हू के बैल फिर क्यों ??
फिर क्यों हम लगातार उसी गोल चक्कर में दौड़ते रहते है। हम भी तो बांध लेते हैं अपने मन पर 'मुझीका' ताकि मन छोटी-छोटी खुशियों की और न लपके ।
अगर हम थोड़ा सोचेंगे तो जानेंगे कि हमारे और उनके जीवन में कोई खास फर्क नही और इसीलिये हम सोचते ही नही क्योकि सोचेंगे तो घबड़ाहट होगी तभी तो बिना सोचे हम भागते जा रहे हैं अब पहुंचे तब पहुंचे करते हुए---!
भले ही कही पहुंचे या ना पहुंचें बस दौड़ते ही जा रहे हैं अपने लिये,अपनों के लिये रस इकट्ठा करने के लिये ..! उस रस को इकट्ठा करने के लिए जिसका उपभोग हम कभी नही कर पाते । छोटी-छोटी खुशियों से मुंह फेरकर बड़ी खुशी पाने की चाह में बस बढ़े जा रहे हैं!!
बूंद-बूंद रस इकट्ठा करते हुए हम थक जाते हैं ,हमारे पाँव लड़खड़ा जाते है,मन चाहता है कुछ दिन रुकना मगर जिम्मेदारियों के बँधन में जकड़े हुऐ हमें रुकने की फुरसत ही कहाँ है ...! 
अब पहुँचे ....
तब पहुँचे . ..
बस पहुँच गये ...करते हुऐ भागे जा रहे हैं 'कोल्हू का बैल' बनकर ...||



- मीनाक्षी वशिष्ठ 

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