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दूषित सोच


ज्येष्ठ की शिखर दोपहरी थी। आकाश में सूर्य तवे की तरह तप रहा था।मैं अपनी फूस की बनी झोपड़ी में बैठा
पशुओं के जोहड़
कुछ संगीत के स्वर मन ही मन गुनगुना रहा था।

एक लगभग पचास वर्षीय बूढा आता है ,वह  पसीने में बेहाल था। वह मेरी झोपड़ी के पास आकर रुका और पीने के लिए पानी मांगा। मैंने बूढ़े की गर्मी में हालत देखी और मैं तुरन्त झोपड़ी में रखे कोरे मटके में से एक लोटा भरकर ठंडा पानी लाया। जैसे ही मैंने पानी का लोटा उस बूढ़े की तरफ बढ़ाया, बूढ़े ने पूछा-" बेटा जाति क्या है ?" मैंने अपनी जाति बता दी । जाति जानने के बाद उसने पानी का लोटा न लेते हुए , उच्च जाति के लोगों के घर पूछे। मैंने कहा इस बस्ती में कोई उच्च जाति का घर नहीं है। यह सुनकर वह बूढा पानी पिए बिना वहाँ से चला गया ।

थोड़ी देर बाद पता कि वह बूढा पशुओं के जोहड़ में पानी पी रहा था।और पास बैठे लोगों से कह रहा था जहाँ सवा मन से ज्यादा पानी होता है वो शुद्ध होता है।





- अशोक कुमार ढोरिया

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