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बचपन की यादें



खिला-खिला सा आंगन था,
मस्ती भरी कहानी थी।
हर गम से अनजान था,
बचपन की यादें
वो बचपन की नादानी थी।।

खेलते- खेलते सो जाता था,
वो नींद भी बड़ी  प्यारी थी।
हर गम से अनजान था,
वो बचपन की नादानी थी।।

आंखो में भरा एक सपना था,
कागज की कस्ती की सवारी थी।
हर गम से अनजान था,
वो बचपन की नादानी थी।।

पापा का दुलारा था,
मां की ममता भी बड़ी न्यारी थी।
हर गम से अनजान था,
वो बचपन की नादानी थी।।

दुनिया को ना जाना था,
पर सोच बड़ी सयानी थी।
हर गम से अनजान था,
वो बचपन की नादानी थी।।

गुस्से में भी हस जाता था,
वो भी एक शरारत थी।
हर गम से अनजान था,
वो बचपन की नादानी थी।।

        


- नवीन उप्रेती

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