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दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत ख़राब हो गई पेंटिंग



कूड़ा-कचरा बीनने वाले जिन पहले बच्चों ने उसे देखा उन्हें लगा कि वह कूड़े के ढेर पर ऐसे ही पड़ी कोई बड़ी-सी चीज़ है । हालाँकि ध्यान से देखने पर उन्हें लगा कि उस चीज़ में कुछ तो ख़ास था । उस पर लगी गंदगी , और लिपटी पत्तियाँ और लताओं को हटाने के बाद जा कर उन्हें पता लगा कि दरअसल वह तो एक ख़राब हो गई बड़ी-सी पेंटिंग थी ।

कूड़ा-कचरा बीनने वाले बच्चों ने उसे वहीं छोड़ दिया क्योंकि उन्हें लगा कि वह उनके किसी काम की नहीं थी ।
पेंटिंग
पेंटिंग
कुत्ते भी उसे उसे सूँघ कर आगे बढ़ जा रहे थे । लेकिन वहाँ से गुज़र रहे इलाक़े के एक चित्रकार की निगाह इत्तिफ़ाक़ से उस पर जा पड़ी । उसने फ़ोन , एस. एम. एस. और व्हाट्स ऐप के माध्यम से अपने अन्य चित्रकार यार-दोस्तों के बीच यह ख़बर फैला दी । जल्दी ही आस-पास के सभी चित्रकार उस पेंटिंग को देखने वहाँ आ पहुँचे । जो चित्रकार उस पेंटिंग पर लगी-लिपटी गंदगी को साफ़ करके उसे इलाक़े के चित्रकार के घर ले गए उन्होंने पाया कि वह पेंटिंग अपनी ख़राब हालत में भी बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी । जैसे कूड़े के ढेर पर पड़े रहने के बावजूद उसके निखार में ज़्यादा कमी नहीं आई हो । हालाँकि वह बड़ी-सी पेंटिंग कहीं-कहीं से ख़राब ज़रूर हो गई थी , पर साफ़ नज़र आ रहा था कि वह अब भी एक बहुत ख़ूबसूरत पेंटिंग थी ।

पेंटिंग को ज़्यादा साफ़ किए बिना ही उस के किनारे पर अंकित पेंटर का नाम देखा जा सकता था । हालाँकि वह नाम क्या था , यह साफ़-साफ़ पढ़ पाना लगभग असम्भव था , क्योंकि ठीक वहीं से पेंटिंग का ख़राब हो गया हिस्सा शुरू हो रहा था । इलाक़े के चित्रकार के ड्राइंग-रूम में जमा अन्य सभी चित्रकार तरह-तरह के क़यास लगा रहे थे कि आख़िर वह पेंटिंग किसने बनाई होगी और इतनी ख़ूबसूरत पेंटिंग ख़राब हो कर कूड़े के ढेर पर कैसे पहुँच गई । यहाँ मौजूद सभी लोग पेशेवर चित्रकार थे जो स्वयं बहुत बढ़िया पेंटिंग बनाते थे । पर कूड़े के ढेर से मिली उस पेंटिंग जितनी ख़ूबसूरत पेंटिंग बनाने की वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे । वे सभी उस ख़राब हालत में भी मिली उस पेंटिंग की सुंदरता से मंत्रमुग्ध थे ।

सारी शाम वे सभी चित्रकार उस इलाक़े के अपने चित्रकार साथी के ड्राइंग-रूम में बैठ कर उस सुंदर पेंटिंग को निहारते रहे , उस के बारे में चर्चा करते रहे । इलाक़े के चित्रकार के पास एक द्रव्य था जिससे उसने पेंटिंग पर लगी धूल-मिट्टी और गंदगी को थोड़ा और साफ़ कर देना चाहा । और तब उस पेंटिंग की ख़ूबसूरती और ज़्यादा उभर कर सामने आई । यह देखकर उस चित्रकार के सभी साथियों ने दाँतों तले अपनी उँगलियाँ दबा लीं और कई चित्रकार एक स्वर में बोल उठे , “ अरे , यह तो अपनी इस हालत में भी लेओनार्डो द विंची की मशहूर पेंटिंग ‘ मोनालिज़ा ‘ से कहीं ज़्यादा सुंदर पेंटिंग लग रही है । “ बल्कि कुछ अन्य चित्रकारों को वह अपनी इस अवस्था में भी वैन गॉग की प्रसिद्ध पेंटिंग ‘ सनफ़्लावर्स ‘ से भी अधिक ख़ूबसूरत पेंटिंग लगी । इलाक़े के चित्रकार को भी यह पेंटिंग द विंची की एक और प्रसिद्ध पेंटिंग ‘ द लास्ट सपर ‘ से कहीं अधिक बेहतर और चित्ताकर्षक पेंटिंग लगी । उस पेंटिंग का सौंदर्य देखकर उन सभी चित्रकारों के मुँह खुले-के-खुले रह गए ।

थोड़ा और साफ़ करने पर उन सबको ऐसा लगा जैसे उस ख़राब हो गई पेंटिंग में से कोई आभा फूट रही थी । सभी चित्रकार उसके क्षतिग्रस्त फ़्रेम की मरम्मत करने में जुट गए और देखते-ही-देखते उन्होंने उसके फ़्रेम को फिर से ठीक कर डाला जिससे उस पेंटिंग में चार चाँद लग गए ।

चाय पीते हुए वे सभी चित्रकार गहन विचार-विमर्श करते रहे कि आख़िर इस इतनी बढ़िया पेंटिंग का क्या किया जाए । कुछ चित्रकारों ने सलाह दी कि इसे किसी विख्यात आर्ट-गैलरी को गिफ़्ट में दे दिया जाए ताकि यह पेंटिंग भी अन्य बढ़िया पेंटिंग्स के साथ उस आर्ट गैलरी की शोभा बढ़ाए । किंतु इलाक़े का चित्रकार इस पेंटिंग का स्वामित्व छोड़ने के पक्ष में नहीं था । अंत में यह राय बनी कि अगले हफ़्ते शहर की प्रसिद्ध आर्ट-गैलरी में लगने वाली प्रदर्शनी में अन्य पेंटिंग्स के साथ इस ख़ूबसूरत पेंटिंग को भी रखा जाए ताकि वहाँ आने वाले चित्रकला-प्रेमी इस अद्भुत पेंटिंग के सौंदर्य से अभिभूत हो सकें और इसे देखने का आनंद ले सकें ।

चित्रकारों की सभा जब ख़त्म हुई और बाक़ी सभी चित्रकार अपने-अपने घरों को लौट गए , तब भी इलाक़े का चित्रकार अपने घर के ड्राइंग-रूम में मौजूद उस बड़ी-सी विरल पेंटिंग को विभिन्न कोणों से निहार कर प्रफुल्लित होता रहा । रात में जब वह अपने शयन-कक्ष में सोने गया तो उसकी नींद में आने वाले सपने उसी ख़राब हो गयी बेहद ख़ूबसूरत पेंटिंग से भरे रहे । हालाँकि यह भीषण ठंड का मौसम था किंतु उस पेंटिंग की वजह से उस चित्रकार के सपने में वसंत ऋतु छाई रही , रंग-बिरंगे ख़ुशबूदार फूल खिले रहे , मनमोहक तितलियाँ उड़ती रहीं , कोयलों की मधुर कूक सुनाई देती रही । उस चित्रकार के स्वप्न के आकाश में एक साथ कई इंद्रधनुष छाए रहे ।

आख़िर वह दिन भी आ गया जिस दिन उस अद्भुत पेंटिंग को शहर की विख्यात आर्ट-गैलरी में प्रदर्शन हेतु रखा जाना था । एक बार फिर इलाक़े के चित्रकार के जान-पहचान के सभी चित्रकार उसके यहाँ इकट्ठा हुए । आज पहले दिन की अपेक्षा और ज़्यादा भीड़ थी क्योंकि अन्य चित्रकारों ने अपने जान-पहचान के और चित्रकारों को भी इस अवसर पर बुला लिया था , और उन और चित्रकारों ने अपनी जान-पहचान के और भी चित्रकारों को वहाँ पहुँचने का न्योता दे डाला था ।

अंत में उस ख़राब हो गई ख़ूबसूरत पेंटिंग को एक जुलूस की शक़्ल में शहर की विख्यात आर्ट-गैलरी में ले जाया गया , जहाँ उसे अन्य लगी हुई पेंटिंग्स के साथ एक महत्त्वपूर्ण स्थान पर विधिवत लगा दिया गया । उस पेंटिंग के वहाँ लग जाने से उस प्रदर्शनी में जैसे रौनक़ आ गई । लोग उस पेंटिंग की ओर खिंचे चले आते थे ।

चित्रकला-प्रदर्शनी देखने आने वालों के बीच वह ख़राब हो गई ख़ूबसूरत पेंटिंग चर्चा का विषय बनी रही । वहाँ मौजूद कई कला-प्रेमियों ने उस पेंटिंग के चित्रकार का नाम जानने का प्रयास किया और अपने इस प्रयास में विफल रहने पर दुखी हुए । कई रईस कला-प्रेमियों ने उस ख़राब हो गई ख़ूबसूरत पेंटिंग को ख़रीदने के लिए लाखों रुपए देने की बात कही , किंतु उसे लेकर आए इलाक़े के चित्रकार ने वह विरल पेंटिंग बेचने से इंकार कर दिया ।

वह ख़राब हो गई ख़ूबसूरत पेंटिंग इतनी अद्भुत और जीवंत थी कि कि कुछ लोग उस बड़ी-सी पेंटिंग में बने दरवाज़े को असली दरवाज़ा समझ कर उसमें घुसने का प्रयास करते हुए पाए गए और हँसी का पात्र बन गए । एक मधुमक्खी , जो न जाने कहाँ से उड़ती हुई प्रदर्शनी-कक्ष में घुस आई थी , उस विरल पेंटिंग में बने फूल को असली फूल समझ कर उस पर जा बैठी और मूर्ख बन गई । एक बच्चा गिलास ले कर आया और उस पेंटिंग में बने नल में से बहते हुए जल को असली पानी समझ कर उसे अपने गिलास में भरने का विफल प्रयास करने लगा । हद तो तब हो गई जब एक बुज़ुर्ग कला-प्रेमी ने उस पेंटिंग की दीवार पर बने पर्दे को असली पर्दा समझ कर उसे थोड़ा-सा खिसका देने की कोशिश कर डाली और वहाँ मौजूद लोगों की हँसी का पात्र बन गया ।

तीन दिन और तीन रातों तक वह पेंटिंग शहर और बाहर से आए कला-प्रेमी दर्शकों की चर्चा का केंद्र-बिंदु बनी रही । उसे देखने आए सभी लोगों ने ऐसी ख़राब हालत में भी उसे दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत पेंटिंग का दर्ज़ा दिया । ‘ विज़िटर्स बुक ‘ में सभी कला-प्रेमियों ने उस ख़ूबसूरत पेंटिंग को सराहने वाले उद्गार व्यक्त किए । सब को बस एक ही कमी खल रही थी । काश , यह पता चल पाता कि ऐसी अद्भुत पेंटिंग को बनाने वाले चित्रकार का नाम क्या था । यदि वह चित्रकार उन कला-प्रेमियों के समक्ष उपस्थित होता तो वे उसका महिमामंडन करते व उसे दुनिया के श्रेष्ठतम चित्रकार के ख़िताब से अलंकृत कर देते ।

चित्र-प्रदर्शनी के ख़त्म होने वाली शाम को फिर से वही विकट समस्या उत्पन्न हो गई कि आख़िर अब इस पेंटिंग का किया क्या जाए । कुछ कला-प्रेमियों ने फिर से सलाह दी कि इसे देश की राजधानी के सबसे बढ़िया म्यूज़ियम को गिफ़्ट में दे दिया जाए ताकि यह पेंटिंग वहाँ आने वाले कला-प्रेमियों का मन मोहती रहे । किंतु पहले की तरह ही इसका मालिकाना हक़ रखने वाले इलाक़े के चित्रकार ने यह सलाह ठुकरा दी । चार घंटे तक चली एक हंगामेदार बैठक के अंत में सर्वसम्मति से यह राय बनी कि ऐसी अद्भुत पेंटिंग कोई इंसान बना ही नहीं सकता है । उस बैठक के अंत में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसके अनुसार यह एक असाधारण पेंटिंग थी जिसके दैवीय होने के अधिक आसार थे । उसी बैठक में यह तय किया गया कि दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत ख़राब हो गई इस पेंटिंग को पवित्र गंगा नदी के जल में विसर्जित कर दिया जाए । तय किया गया कि वह महान् पेंटिंग प्रकृति का अंश थी और यही उचित होगा कि वह वापस उसी विराट् प्रकृति में मिल कर उसका अभिन्न अंग बन जाए । 

अगले दिन सभी चित्रकार बंधु , कला-प्रेमी तथा जन-सामान्य एक जुलूस के रूप में विधिवत् उस विरल पेंटिंग को लेकर गंगा नदी के तट पर पहुँचे । लोगों की भीड़ ‘ दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत पेंटिंग , अमर रहे , अमर रहे ‘ के नारे लगा रही थी । भीड़ का उत्साह देखते ही बनता था ।

उस अद्भुत पेंटिंग के सम्मान में उस दिन सभी मंदिरों में विशेष पूजा की गई । गुरुद्वारों में विशेष अरदास की गई तथा कड़ाह प्रसाद बाँटा गया । गिरिजाघरों में भी विशेष प्रार्थना-सभाएँ आयोजित की गईं तथा मस्जिदों से मौलवियों ने उस पेंटिंग के लिए ख़ास तौर पर दुआ माँगी । इस तरह वह विरल पेंटिंग साम्प्रदायिक तनाव से भरे इस कठिन समय में एकता और साम्प्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बन गई ।

अंत में वह पेंटिंग लेकर इलाक़े का वह चित्रकार अपने साथी चित्रकारों के साथ एक बड़ी-सी नाव में सवार हुआ । गंगा नदी के बीच में पहुँच कर उन्होंने उस अद्भुत पेंटिंग के साथ एक भारी पत्थर बाँध दिया ताकि पानी में बहाए जाने पर वह पेंटिंग तैरती-उतराती हुई दोबारा किनारे पर न आ लगे बल्कि सीधा नदी के तल पर डूब जाए । और इस तरह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत ख़राब हो गई पेंटिंग को गंगाजल के जल में विसर्जित कर दिया गया ।

इस घटना को हुए बरसों बीत गए हैं किंतु आज भी कला-प्रेमियों की स्मृति में यह घटना बरसात की काली रात में बिजली के कौंधने जितनी स्पष्ट है । जैसा कि होता है , अब इसके इर्द-गिर्द लोक-कथाएँ और किंवदंतियाँ बन गई हैं । हर साल गंगा नदी के तट पर उसी जगह पर साल के उसी दिन एक चित्रकला-मेला लगता है जहाँ दूर-दूर से नामी चित्रकार अपने चित्रों और पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगाते हैं । यह जगह अब कला-प्रेमियों के लिए किसी तीर्थ-स्थल जैसी बन गई है ।मेले में मौजूद कोई बच्चा जब किसी चित्र की तारीफ़ करता है तो कई जोड़ी हाथ उसे नदी के बीच में स्थित वह स्थल दिखाने लगते हैं जहाँ बरसों पहले दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत ख़राब हो गई पेंटिंग को नदी के जल में विसर्जित कर दिया गया था । गंगा नदी के बीच में मौजूद उस स्थल के पास से गुज़र रहे स्टीमर और नावों पर सवार लोगों को नाविक अक्सर इशारा करके बताते हैं — “ वह देखिए । वहाँ । हाँ , वहाँ । वही है वह जगह जहाँ बरसों पहले क़ुदरत की नायाब चीज़ वापस क़ुदरत से जा मिली थी । जहाँ बरसों पहले दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत ख़राब हो गई पेंटिंग को नदी के जल में विसर्जित कर दिया गया था ... “ 

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प्रेषक : सुशांत सुप्रिय
A-5001 ,
गौड़ ग्रीन सिटी , 
वैभव खंड ,
इंदिरापुरम् ,
ग़ाज़ियाबाद - 201014
( उ.प्र. )
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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