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अंग्रेजी माध्यम के शिक्षण से खुले प्रतिभा अपहरण के द्वार 

          
प्रतिभा पलायन की समस्या - भारत में लोग अपने उन बच्चों के प्रति बहुत गौरवान्वित होते हैं जो अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर अच्छे अंक अर्जित कर विदेशों में बड़े पैकेज की नौकरी प्राप्त कर लेते हैं। अंग्रेजी माध्यम से विद्यालय में पढ़ने वाले भारतीय बच्चे पढ़ाई के दौरान ही विदेशी कंपनियों के द्वारा नौकरी के लिए चयनित हो जाते हैं। ऐसे बच्चों के माता-पिता हर मिलने वाले के समक्ष बड़े गर्व से यह कहते थकते नहीं हैं कि अरे हमारे "पप्पू" या "पप्पी" का तो केंपस सिलेक्शन हो गया है। पढ़ाई पूरी करते ही वह विदेश चला जाएगा। बड़ा अच्छा पैकेज मिला है उसे। पहले दिन से ही गाड़ी, बंगला सब कुछ उसे उपलब्ध होगा।

प्रतिभा पलायन
प्रतिभा पलायन 
जब-जब मेरे समक्ष इस तरह की कोई अभिव्यक्ति किसी पालक के द्वारा होती है तो मेरे लिए विचारणीय होता है कि यह मुद्दा गर्व का है या शर्म का। अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चे अपने परिवार से, परिवेश से, परंपरा से, भाषा से पूरी तरह कट जाते हैं और एक ऐसी लंपट संस्कृति में लिप्त हो जाते हैं जो न केवल अपनी नहीं है बल्कि नैतिक भी नहीं है। 

मेरी नजर में केंपस सिलेक्शन एक तरह का अपहरण है।भारतीय प्रतिभाओं का अपहरण, अच्छे पैकेज की बंदूक के बल पर किया गया अपहरण, जिसमें इन प्रतिभाओं का पालन करने वाले माता-पिता और राष्ट्र के सब संसाधन तो लगते हैं लेकिन हासिल कुछ नहीं होता। सारे लाभ विदेश  के खाते में ही जाते हैं।

जिन देशों में भारतीय प्रतिभाओं को अच्छे पैकेज की नौकरी मिलती है  क्या उन देशों में प्रतिभाओं की कमी है? भारतीय प्रतिभाओं का कैंपस सेलेक्शन उनकी प्रतिभा के कारण होता है या इसलिए होता है कि भारतीय प्रतिभाएं उन्हें तुलनात्मक रूप से सस्ते में मिल जाती हैं। जो पैकेज हमें बहुत बड़ा लगता है, भारतीय प्रतिभाओं को नौकरी देने वालों के लिए वह बहुत तुच्छ है और नौकरी देने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि जो अच्छा पैकेज वे भारतीय प्रतिभा को दे रहे हैं वह खर्च तो उन्हीं के देश में होना है, शराब पर, सिगरेट पर, गर्लफ्रेंड पर,  फास्ट फूड पर,  जुआ-सट्टे जैसे खेलों पर, चिकित्सा पर और यदि किसी कानूनी उलझन में फंस गए तो वकीलों पर। मतलब घी, घी में ही मिलना है।

भारतीय प्रतिभाओं का चयन इसलिए भी हो जाता है कि भारतीय प्रतिभाएं कम वेतन लेकर भी विदेशियों के प्रति बहुत आज्ञाकारी हैं। विदेशियों की लंपट जीवन शैली युवाओं  को आकर्षित करती है। उस जीवन शैली को अपनाने और उसे निरंतर बनाए रखने के लिए वे  विनम्रता पूर्वक अच्छे से अच्छे परिणाम देते हैं क्योंकि अच्छा परिणाम न देने पर नौकरी से हटा कर वापस भारत भेज दिए जाने का खतरा हमेशा उनके समक्ष होता है। उन्हें नौकरी देने वाले यह अच्छी तरह जानते हैं कि  इस दबाव में  भारतीय प्रतिभा अच्छे से अच्छा काम करेगी। यह एक तरह की बंधुआ सेवा ही है जिसका लाभ सिर्फ विदेश को ही मिलता है, भारत हर तरह से घाटे में ही रहता है। इसलिए भारत से बाहर जाने वाली प्रतिभाओं के प्रवाह को प्रतिभा पलायन नहीं प्रतिभा अपहरण कहना मुझे ज्यादा उचित लगता है। मुझे लगता है आप भी इससे सहमत होंगे। 

अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपने देश से प्यार करने वाले हम जैसे कुछ सिरफिरे लोगों के लिए सबसे अधिक खेद की बात यह है कि इस खुलेआम अपहरण के लिए सारी सुविधाएं हमारी अपनी सरकारें ही उपलब्ध करवा रही हैं। अपने हाथों में पुष्प गुच्छ लिए, पलक-पांवडे बिछाए अपहरणकर्ताओं का  स्वागत कर रही हैं। यह अपने पैरों पर अपने हाथ से ही कुल्हाड़ी मारने जैसा है। इससे उलट यदि सरकारों ने अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों को मान्यता न दी होती, भारतीय भाषा में उच्च शिक्षा की व्यवस्था विकसित की होती, नौकरी को इतना महिमा मंडित न किया गया होता, स्व रोजगार को बढ़ावा देकर नौकर नहीं  मालिक बनने का  वातावरण विकसित किया होता तो देशी प्रतिभाएं विदेश जाने को इतनी लालायित न होतीं और न ही उन्हें विदेश जाने के अवसर इतने सुलभ होते। 

विदेश न जाने वाली देशी प्रतिभाएं भूखी तो नहीं मरतीं? वह कुछ न कुछ अपने दम पर अपने देश में ही करतीं तो उनकी प्रतिभा का लाभ उनके परिवार को, समाज को और अंततः देश को मिल सकता था। भारत जो कभी सोने की चिड़िया था, विश्व गुरु था पुनः एक महाशक्ति बन सकता था पर अब हर शर्त पर विदेशी सहायता की वैशाखियों पर चलने की, ऋण लेकर घी पीने की जो चाल चल पड़ी है वह गुलामी से कम है क्या? पर इस चाल को कौन और कैसे रोके, यही यक्ष प्रश्न है।



 –ब्र. विजयलक्ष्मी जैन

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