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मुर्ख को शिक्षा नहीं देनी चाहिए 


नीलगिरि पर्वत पर बंदरों का एक झुंड रहता था। ये लोग कई पीढि़यों से वहीं पर रह रहे थे। जैसा कि यह आम होता है कि हर पीढ़ी के अपने-अपने विचार होते हैं, जो कभी पुरानी पीढ़ी से मेल खाते हैं, कभी नहीं। 

ऐसे में बंदरों की नई पीढ़ी के विचार थे। वे कभी किसी बूढ़े की सलाह लेने के लिए तैयार नहीं थे। बूढ़ों को तो वे
बंदरों का एक झुंड
बंदरों का  झुंड 
यह कहते थे- ‘ये तो पुराने जमाने के लोग हैं। अब तो नया जमाना आ चुका है।’ ऐसे शब्द कहते समय वे इस बात को बिलकुल ही भूल जाते थे कि यह जवान ही तो एक दिन बूढ़े बन जाते हैं। खैर ,जवानी के जोश में बन्दर अपनी दुनिया में मस्त रहते थे .

एक बार पहाड़ों पर खूब बर्फ पड़ रही थी। सर्दी के मारे सभी पक्षियों, जानवरों का बुरा हाल होने लगा। बंदर बेचारे भी ठंड के मारे इधर-उधर सर्दी से बचने का उपाय सोच रहे थे। अचानक ही बंदर ने एक ऐसा फल देखा, जो आग की भांति चमक रहा था.

‘लो आग तो मिल गई, अब ठंड भी भाग जाएगी।’ बंदरों के सरदार ने कुछ बंदरों को फल तोड़ने के लिए भेजा।

बंदर फल तोड़कर ले आए, तो उसे आग समझकर तापने के लिए बैठ गए। सारे बंदर उसके चारों ओर घेरा डाले बैठे थे कि एक उड़ता हुआ पक्षी उसके पास आकर बोला- ‘अरे भाई! तुम यह क्या कर रहे हो?’ ‘तुम अंधे हो क्या? तुम्हें दिखाई नहीं देता कि हम सर्दी से बचने के लिए आग ताप रहे हैं, बंदरों का सरदार चीख कर बोला।’

 ‘अरे! मैं तो अंधा नहीं, हां तुम पागल जरूर हो गए हो?’ पक्षी ने भी जोश में आकर कहा। ‘क्या हम पागल हैं?’

 ‘हां…हां… तुम पागल नहीं तो और क्या हो! ऊपर से तो बर्फ पड़ रही है, उधर, तुम सब नकली आग को आग समझकर ठंड को दूर कर रहे हो। ऐसे मौसम में तो किसी गुफा में छुपकर ही अपना बचाव किया जा सकता है, बाहर बैठकर नहीं।’

 बंदरों के सरदार को इस बार गुस्सा आ गया और चीखकर बोला- ‘ओ हवा में उड़ने वाले! तू हमें पागल क्यों समझता है? हम उन बंदरों की संतान हैं, जिनकी सात पीढि़यां इन पहाड़ों पर बीत चुकी हैं। अब हमें कोई क्या बताएगा? हम सब जानते हैं। तुम ही पागल हो जो, कुछ नहीं जानते।’ 

पक्षी ने नम्रता से बंदर को कहा- ‘देखो भाई, मैं जो कुछ भी आपको बता रहा हूं, वह एक सत्य है। मुझे ऐसा करने से कोई लाभ तो नहीं। मैं केवल आपकी भलाई के लिए कह रहा हूं कि बर्फ जब भी पड़े, तो प्राणी को किसी गुफा का सहारा लेना चाहिए।  यदि तुम अब भी न संभले तो नुकसान हो जाएगा। इसलिए अब भी मौका है, बच जाओ। हो सकता है, बर्फ का तूफान भी आ जाए। यह मौसम का रुख बता रहा है।’ 

‘क्या तुम हमें मारना चाहते हो, क्या तुम चाहते हो, हम सब मर जाएं?’ ‘नहीं…नहीं… ऐसी बात नहीं। मैं तो केवल इतना ही कह रहा हूं कि तुम लोग इस मौत से बच जाओ।’ 

‘फिर मौत का नाम लिया तुमने? मारो, इस पापी को यह हमें मारने आया है।’बंदरों का सरदार क्रोध के मारे दांत पीस कर बोला .

फिर क्या था, सारे बंदर उस बेचारे पक्षी पर टूट पड़े। देखते ही देखते उसके पर नोच डाले और शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।



कहानी से शिक्षा - 
  • मूर्खों को शिक्षा नहीं देनी चाहिए . 

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