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बुजुर्ग माता पिता की उपेक्षा समाज के लिए शुभ नहीं


आधुनिक युग में जितनी तेजी से भौतिक और वैज्ञानिक जीवन में विकास हुआ है ,उतनी ही तेजी से व्यक्ति का नैतिक और सांस्कारिक पतन भी हुआ है। दूसरों ,गुरुओं ,बड़ों ,बुजुर्गों की तो बात ही क्या अब तो माता -पिता तक के प्रति समर्पित ,सम्मान करने वाले और आज्ञाकारी बच्चे मिलने कम होते जा रहे। इतनी तेज भौतिक लिप्सा ,स्वस्वार्थ की भावना पनप रही की सम्मान ,संस्कार ,संस्कृति ,परंपरा इन्हें पिछड़ेपन की निशानी ,उन्नति में बाधा लगती है । 

बहू और बेटियां परिवार की धुरी होती है। यदि उन्हें अच्छे संस्कार दिये जांय। तो वे परिवार को अच्छी तरह से समझकर और प्रयास करें तो सारी पारिवारिक समस्याओं का निदान कर सकती हैं।आज के जमाने में कोई भी
माता पिता की उपेक्षा
माता पिता की उपेक्षा
अपने बेटी को यह नहीं सिखाता कि वह जब अपने ससुराल जाए तो सबको साथ लेकर चले।हर ,माता -पिता , विशेषकर माता ,अपनी बेटी को वही सब अधिक सिखा रही जिससे एकल परिवारवाद का उदय हो और उसका सुख ही सर्वोपरि हो।बेटा हो या बेटी ,जब तक माता -पिता के सहारे हैं ,शारीरिक रूप से कम सक्षम हैं तब तक तो बहुत आज्ञाकारी हैं ।टेलीविजन ,इंटरनेट ,सोशल मिडिया पर उपलब्ध सामग्री इन्हें परिवार के संस्कारों से अलग ले जाती है और इनके सपने ,कल्पनाएँ उधर घूमने लगती हैं।अधिकतर परिवार आज कमाने -खाने की आकांक्षा में बाहर निकल अलग रहते हैं। जहाँ बच्चों को बुजुर्गों अथवा बड़ों अथवा अपने संस्कार से सम्बन्धित लोगों का साथ नहीं मिल रहा इसलिए वे भिन्न सोच वाले होते जा रहे हैं। जब बचपन से ही बच्चा स्वतत्र और खुद के बारे में सोचता हो तो बड़ा होने पर उससे अपने देखभाल की उम्मीद करना बेकार है ,वह तो अपने मन की ही करेगा और जहाँ उसका अधिक स्वार्थ होगा वहां ही झुकेगा ।

आज 90 प्रतिशत मामलों में यह पाया गया है कि सीधी लकड़ी को हर कोई काटना चाहता है। बेटा -बहू भी इस सिधाई का नाजायज फायदा उठाते हैं।  परिवार और नजदीक के लोग भी फायदा उठाते हैं और अंततः जब वह कमजोर ,असहाय होते हैं तो उन्हें उपेक्षित कर देते हैं । नौकरी पेशा लोगों को उपेक्षा का दंश अधिक झेलना पड़ता है । इसके दो कारण हैं - एक तो उनका रूटीन बिगड़ा होता है जो उन्होंने जीवन भर बनाया था । दूसरा वे अपने नौकरी के समय पर्याप्त समय और ध्यान अपने बच्चों पर नहीं दे पाते हैं। उनके पास ,पेंशन आदि हो सकता है पर परिवार का साथ मिल हो जाए जरुरी नहीं है। जो कुछ नहीं बचा पाते अपने जीवन में और सबकुछ अपने बच्चों पर ही भविष्य की उम्मीद में लगा देते हैं ,वह सबसे अधिक उपेक्षा और तिरस्कार झेलते हैं ,क्योंकि स्वार्थी दुनिया में देने को उनके पास कुछ नहीं होता है। उन्हें भी बहुत तिरस्कार ,अपमान भुगतना होता है जिनके पति अथवा पत्नी का साथ छूट गया हो या दोनों में से एक ही बचा होता है। 

हर माता -पिता की उम्मीद होती है की बेटे का विवाह करेंगे तो बहू आएगी और घर -परिवार के साथ उनकी भी देखभाल करेगी । खानदान -परंपरा -संस्कार को बनाए रखेगी । नाती -पोते होंगे और घर खुशहाल होगा । पर बहुत कम ऐसा हो पाता है। जहाँ संयुक्त परिवार है वहां तो ऐसा हो सकता है पर जहाँ केवल बेटे ,बेटी और माता -पिता हैं वहां ऐसा कम देखने को मिलता है । बहुत जल्दी विसंगति और दिक्कते शुरू हो जा रही है। बहू आई और पति को अपने अलग लेकर जाने के बारे में सोचने लगती है । खुद के स्वार्थ के बारे में पहले सोचने लगती है । बेटे के माता -पिता बोझ लगने लगते हैं । कुछ मामलों में सास -ससुर -ननद से उसे कष्ट होता है ,फिर वह ऐसा करती है पर ,अधिकतर पहले की सोच ही उसपर हावी रहती है कि ,अपने पति के साथ रहना है ,खुद के बारे में ही सोचना है । इसमें बहुत कुछ उसके मायके से सिखाया हुआ भी हो सकता है अथवा कही किसी संगत से वह यह ज्ञान अर्जित की हुई होती है। बेटे की स्थिति कुछ दिन त्रिशंकु सी होती है और माता -पिता तथा पत्नी के बीच झूलते हुए पत्नी की तरफ मुड़ जाता है । वह पत्नी की बात मानने लगता है और माता -पिता के प्रति पत्नी बुरे भाव भर देती है जिससे वह अपने माता -पिता को भी अपने सुख में बाधक मानने लगता है । पत्नी की ओर झुकता बेटा ,अपने माता -पिता की उपेक्षा करने लगता है और असहाय बुजुर्ग माता -पिता बेबस ,लाचार ,मजबूर हो जाते हैं।माता -पिता चाह ही लें तो बेटे -बहू को सुधारा जा सकता है । उन्हें सबक दिया जा सकता है । आखिर बाप बाप ही रहेगा ,बेटा कितना भी बड़ा हो जाए । यहाँ जरूरत है ,सक्षम बनने की ,आत्मविश्वास ,आत्मबल बढाने की ,समय के सदुपयोग की ,अवचेतन को सुधारने की ,सोच को बदलने की ,निराशा ,हताशा से निकल आशा और शक्ति पाने की ।

भारत में जहां कभी संतानें पिता के चेहरे में भगवान और मां के चरणों में स्वर्ग देखती थीं, आज उसी देश में संतानों की उपेक्षा के कारण बड़ी संख्या में बुजुर्ग माता-पिता की स्थिति दयनीय होकर रह गई है। अत चैरीटेबल संगठन ‘हैल्पएज इंडिया’ द्वारा देश के 23 शहरों में बुजुर्गों की स्थिति बारे करवाए गए नए शोध में यह पता लगाने की कोशिश की गई कि बुजुर्गों के साथ दुव्र्यवहार किस सीमा तक, कितना, किस रूप में और कितनी बार होता है तथा इसके पीछे कारण क्या हैं ? शोध में पता चला कि 82 प्रतिशत पीड़ित बुजुर्ग अपने परिवार के सम्मान के चलते इसकी शिकायत नहीं करते और या फिर उन्हें मालूम नहीं कि इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है।

‘विश्व बुजुर्ग दुव्र्यवहार जागरूकता दिवस’ के अवसर पर 14 जून को हैल्पएज इंडिया के सी.ई.ओ. मैथ्यू चेरियन द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘हर वर्ष हम अपने बुजुर्गों के विरुद्ध किए जाने वाले इस घिनौने अपराध को समझने और इसके विरुद्ध लोगों में जागरूकता पैदा करने की कोशिश करते हैं। दुर्भाग्य से बुजुर्गों का उत्पीडन घर से शुरू होता है और इसे वे लोग अंजाम देते हैं जिन पर वे सर्वाधिक विश्वास करते हैं।’’ हमारे लिए न सिर्फ अपने बुजुर्गों के सम्मानजनक जीवन-यापन के लिए बहुत कुछ करना बाकी है बल्कि बच्चों में अपने माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करने के संस्कार भरना भी अत्यंत आवश्यक है। लिहाजा बच्चों को बचपन से ही इसकी शिक्षा देनी चाहिए।’’ इसी को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने ‘अभिभावक और वरिष्ठ नागरिक देखभाल व कल्याण’ संबंधी चंद कानून बनाए हैं परंतु इन कानूनों तथा अपने अधिकारों की ज्यादा बुजुर्गों को जानकारी नहीं है। अत इन कानूनों के व्यापक प्रचार की जरूरत है ताकि बुजुर्गों को अपने अधिकारों का पता चले और उन्हें जीवन की संध्या में अपनी ही संतानों की उपेक्षा का शिकार होकर अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए तरसना न पड़े। आवश्यकता इस बात की भी है कि माता-पिता अपनी सम्पत्ति की वसीयत तो बच्चों के नाम अवश्य कर दें परंतु सम्पत्ति उनके नाम ट्रांसफर न करें। ऐसा करके ही वे अपने जीवन की संध्या में आने वाली अनेक परेशानियों से बच सकते हैं।    

जमाना बदल गया है:- बाल मनोचिकित्सक डॉक्टर उमा बनर्जी कहती हैं, ‘आजकल के माता-पिता और बच्चों के बीच का व्यवहार मुझे असामान्य सा लगता है। माता-पिता अपने बच्चे को भगवान सा दर्जा दे कर उन्हें सिर पर बिठा कर रखते हैं। यही बच्चे जब अपनी मनमानी करने लगते हैं, तो माता-पिता हमारे पास आते हैं अपनी समस्या लेकर।’ आज के अभिभावक अपने समय में बिलकुल अलग जिंदगी जीते थे। मां की भूमिका मूलत घर संभालने की ही होती थी। बच्चों की परवरिश में उनका दखल न के बराबर रहता था। उस समय के अधिकांश पिता अपने बच्चों के साथ एक दूरी बना कर चलते थे। घर में एक अनुशासन बना रहता था। बच्चे अपनी रोजमर्रा की दिक्कतें या उलझनें अपने दोस्तों या अपने हमउम्र बच्चों से बांटते। माता-पिता और बच्चों के बीच एक अनकही सी दूरी आज के समय में एकदम मिट गई है। आज के दौर के माता-पिता अपने आपको बच्चों का दोस्त कहलवाना पसंद करते हैं। बच्चों और माता-पिता के बीच दोस्ताना रिश्ते अगर एक दायरे में रहे, तो संबंधों में दरार नहीं आती। लेकिन ऐसा नहीं होता। बच्चे कब हद पार कर जाते हैं, इस बात का अभिभावकों को पता ही नहीं चलता। ‘बच्चे का दोस्त बनने के लिए उनकी हर जिद पूरी करना जरूरी नहीं है। बल्कि शुरू से उन्हें सही मूल्य और संस्कार देना चाहिए। उन्हें तर्क के साथ बताएं कि बड़ों के साथ मार-पीट या डांट फटकार क्यों गलत है। बच्चों को सेंसिटिव बनाना स्कूल का नहीं, माता-पिता का दायित्व है। अगर शुरू से उन्हें पैसे से कोई चीज ले दे कर बहलाया जाएगा, तो मानवीय मूल्यों की इज्जत नहीं कर पाएंगे।’यह सही है कि आज परिवार में माता-पिता और बच्चों के बीच दूरियां रही ही नहीं। शिक्षित मांएं बच्चों की बेहतरीन परवरिश चाहती हैं। वहीं आधुनिक पिता की भूमिका भी ‘ब्रेड अर्नर’ से कहीं ज्यादा की है। वह बच्चों का फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड है। माता-पिता चाहते हैं कि घर के निर्णयों में भी बच्चों की भागीदारी हो।

हर दौर में माता-पिता और बच्चों के बीच के रिश्ते बदलते रहे हैं। हर दौर के अभिभावक मानते हैं कि वे अपने माता-पिता से बेहतर अपने बच्चों की परवरिश कर सकते हैं। अगर आज की पीढ़ी कम संवेदनशील है या उनके मूल्य बदल रहे हैं, तो कहीं न कहीं इसमें उनकी सोच से ज्यादा उनके अभिभावकों की सोच शामिल है। परिवार की उष्मा को बनाए रखने के लिए बच्चों को शुरू से ईमानदारी, सच्चाई, धैर्य और अनुशासन सिखाया जाना चाहिए। उनके सामने खुद उदाहरण बनें। उनकी प्रशंसा का कोई अवसर ना चूकें। उनका आत्मविश्वास बढ़ाएं। उन्हें जीने की कला सिखाएं। जानवरों से प्यार करना सिखाएं, इससे वे संवेदनशील होंगे। बच्चों के दोस्त बनें, लेकिन हमेशा एक हलकी दूरी बनाए रखें। पर हमेशा संवाद बनाए रखें।


-  डा. राधेश्याम द्विवेदी

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