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कविता 



निराश, दु:खी , हताश कवि
जब बाट जो रहा था
भावों की
तभी मुस्कुराती हुई
पलके झपकती हुई
चंचल मन सी कविता
आई हवाओं सी

पूछ बैठा वो कवि
सावन में बूँद सी टपकती
रिमझिम बारिश सी बरसती
सूखे व मृत मन को चंचल
कर देने वाली
ऐ! कविता तूं
इतने दिन कहाँ थी?

शब्द न जाने कहाँ खो गए थे
बिन तेरे प्यासे थे मेरे भाव
रस भी मेरा  साथ छोड़ गए थे
बस अकेला था मैं
उस अँधेरी कोठारी में
जिंदगी बन गई थी, इक ठहराव

लेकिन अब तुम फिर आई हो
खुशिया संग जो लाई हो
उस डगर फिर चल पडूंगा
कलम से फिर कुछ लिख लूँगा
लेकिन अब तो बता दो, ऐ! कविता
इतने दिन तुम कहाँ थी?
                   



- राजेन्द्र कुमार शास्त्री `गुरु` 

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