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कसूर उसका ना था



कसूर उसका ना था,
पर फिर भी सजा उसे मिल रही।
आवाज़, जो रोकना चाहती है यह,
उन तक पहुँच ना रही।

क्या बीत रही होगी उस पर,
स्त्री
यह तुम सोचोगे ना कभी।
बस अपने चिराग के खातिर,
ताने दोगे उसे ही।

आखिर कब तक सहती वह तुम्हारा प्यार,
हार उसे ही माननी पड़ी।
छोड़ कर चली गई वह अपनी हिम्मत को,
जिसकी कमी सदियों से रही।

शोक रहा कुछ पल का महमान,
पर उसे ना कुछ फर्क पड़ा।
सँवार दी फिरसे उसने किसी की जिंदगी,
पर अब भी समाज उसे यही कह रहा,
कि कसूर तेरा था नहीं।

कहना चाहुँगा मैं हर उस स्त्री को,
जो पीड़ित है इस दर्द से,
हिम्मत कभी नहीं छोड़ना तुम,
क्योंकि कमी है उसी की यहीं।
बुझाना है तुम्हे उस चिराग को,
जिसके दम पर समाज तुम्हें घूर रहा,
डर किस से रही हो तुम,
आखिर कसूर तुम्हारा था नहीं।।


- चेतन सोनी

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