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बुद्धिमान सब कुछ पा लेते हैं



बुद्धिमान सब कुछ पा लेते हैं - काले पहाड़ पर एक बूढ़ा सांप रहता था .अब बुढ़ापे के कारण वह कुछ करने के योग्य नहीं रहा था .जवानी में जो मज़े वह मारता रहा था उनकी यादों से उसका मन और अधिक व्याकुल हो जाता . 

मगर केवल यादों से तो पेट नहीं भर सकता था .पेट तो कुछ करने से ही भर सकता था .इसी चिंता के कारण वह सारा - सारा दिन बैठा सोचता रहता की करे तो क्या करे ?

एक दिन उस सांप को बहुत उदास देखकर मेढ़क राजा ने उससे पूछा - मामा जी ,क्या बात है ? आज कल आप बहुत उदास नज़र आते हैं .और कहीं आते जाते भी नहीं ."

सांप और मेढ़क
सांप और मेढ़क
बूढ़ा सांप  बड़ी होशियारी से अपने मन की भावनाओं को छुपाते हुए बोले - अरे भांजे ,मैंने कहाँ जाना है ?
मैंने कल ही शाम को यहाँ पर एक मेढक को देखा ,जो आना भोजन खोज रहा था .मैंने उसे पकड़ना चाह तो वह भागकर एक ब्राह्मण के घर में घुस गया .मुझे तो यह नहीं पता की वह कहाँ गया .मुझे उस ब्राह्मण पर बहुत क्रोध आया .मैंने बदले की आग में जलते हुए उस ब्राह्मण के बेटे को काट लिया .ब्राह्मण शयद मुझसे भी अधिक क्रोधी था .उसने मुझे यह शाप दे दिया की तूने मेरे लड़के को काटा है न ,केवल उस मेढक के लिए .जा अब तू सारी उम्र मेढ़को की सवारी बन कर रहेगा .मेरे बेगुनाह बेटे को काटने की यही सजा मिलेगी तुझे .

मेढकों के राजा ने इस बूढ़े सांप की दर्द भरी कहानी सुनी तो उसके मन को दुःख हुआ और साथ ही उस सांप से सहानुभूति भी हो गयी की केवल उसने एक मेढक के लिए अपने सारे मेढकों को इक्कठा किया और कहा - 

"चलो आज से हम उस सांप की सवारी किया करेंगे जो हमारा खानदानी शत्रु चला आ रहा है ."

उसने मेढकों को तालाब से बाहर आने को कहा की चलकर हम सब आज सांप की सवारी का आनंद लेंगे .आज कितना अच्छा दिन है . हा ..हा .हा ..

देखते ही देखते सारे मेढकों के राज ने सांप से खुश होकर कहा - भाई नाग देवता ,मेरे होते हुए तुम भूखे मत रहना ,देखो जब भी भूख लगे मेरे छोटे मेढकों में से एक खा लिया करना ."

अँधा क्या मांगे दो आँखें .

यही तो वह बूढ़ा चाहता था .जो बेचारा भूखा मरता था ,उसे मेढकों का ताज़ा मांस खाने को मिलने लगा .उसका क्या था ,हर रोज़ अपनी पीठ पर मेढकों को बिठा कर ले जाता और घुमा कर ले आता .पेट भरने के लिए यह धंधा बुरा नहीं था .अब तो सांप का रोज का ही काम था ,मेढकों को पीठ पर बिठा कर घुमाना और फिर एक मेढक को खा कर पेट भर लेता .वैसे तो इससे दोनों पक्ष ही खुश थे .दोनों ही पक्ष आनंद ले रहे थे . 

एक दिन सांप धीरे - धीरे चलने लगा था .मेढक राजा ने उससे पूछा - अरे भाई  नागराज ,आज इतना धीरे क्यों चल रहे हो ?"

"मेढक राजा मैं क्या करूँ ? आज कुछ भूख ही इतनी अधिक लग रही हैं कि चला ही नहीं जा रहा ."

"बस इतनी ही बात के लिए तुम चिंतित हो ? अरे भाई भूख लगी है तो सुबह ही एक मेढक खा लो .मगर हमारी सैर का आनंद तो ख़राब न करो ."

"आपकी आज्ञा का बिना मैं यह काम कैसे कर सकता हूँ महाराज ?" यह कहते हुए बूढ़ा सांप दो - दो मेढकों को खाने लगा जिसके कारण वह काफी मोटा हो गया था .उसका बुढ़ापा भी जवानी में बदलने लगा .

एक दिन रास्ते में एक और काला सांप मिला .उसने जैसे ही मेढकों को सांप की पीठ पर चढ़ा देखा तो बड़ी हैरानी से पूछने लगा .

" अरे भाई ,यह तुम क्या कर रहे हो ? अपने शत्रुओं को अपनी पीठ पर घुमाते फिर रहे हो .क्या तुम्हे शर्म नहीं आती ?

बूढ़ा सांप बहुत धीरे धीरे से उस सांप के कान में बोला - " भैया धीरे बोलो ,कहीं मेरा बना बनाया खेल मत बिगाड़ देना .देख नहीं रहे की मैं अब कितना बूढ़ा हो गया हूँ ? मैं अब मेढकों का शिकार तो नहीं कर सकता हूँ . बस अपनी बुद्धि के बल से ही अपना पेट भर रहा हूँ .देखो इस चाल से बहुत सारे मेढक मैंने खा लिए हैं ,जो रह गए हैं उन्हें भी जल्द किनारे लगा दूंगा ."

" वाह - वाह चाचा ! तुमने तो वास्तव में ही अपनी बुद्धि की शक्ति से कमाल कर दिखाया है ."

धीरे - धीरे उस सांप ने सब मेढकों को खा लिया .अब तो केवल उनका राजा ही बचा था .उसे भी अंत में अपना भोजन बनाकर बुद्धिमान सांप अब अपने लिए कोई नया शिकार खोजने की बात सोचने लगा .



कहानी से शिक्षा -
बुद्धि की शक्तिहीनता से शरीर की शक्ति का नाश हो जाता है .बुद्धिहीन अपना सब कुछ खो देते हैं और बुद्धिमान सब कुछ पा लेते हैं .


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