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लगन 


एक गाँव के मोहल्ले में कुछ बच्चे बाहर गली में खेल रहे थे l कोयल सुबह की राग अलाप रही थी l मोहल्ले में जन्नत की सी शांति व  संजीवता छाई हुई थी l एक गरीब परिवार में एक 4-5 वर्ष का बालक अपने पिता से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर रहा था l दोनों बाप-बेटे को घर के दूसरे कामकाज व पारिवारिक कार्यक्रमों में कोई दिलचस्पी नहीं थी l वो तो मानो बरसो से एक दूसरो से मिले हो l पिता के पास जो कुछ भी किताबी ज्ञान था, वह उसे एक ही दिन में दे देना चाहता था l पिता ने पुत्र से प्रेमपूर्वक स्लेट पर गणित की कुछ संख्या लिखकर उसे
लगन
पूछी l उसने स्लेट पर 23 लिखकर पूछा,`` ये कितने हैं?``
``पिताजी तेईस है`` बेटे ने झटपट बता दिया l
पिता ने पुन: 54 लिखते हुए पूछा`` अब बता ये कितने हैं?``
``पिताजी चौंवन है l`` उसने झटपट जवाब दे दिया l पिता की ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा l उन्हें मानो स्वर्ग का सुख मिल गया हो l वैसे भी एक पिता को सबसे ज्यादा खुशी तब होती है, जब उसका पुत्र उसके इरादों पर खरा उतरता हो और यह छोटा सा बालक तो बड़ा बुद्धिजीवी प्रतीत हो रहा था l उसने जिज्ञासू होकर अपने पिता से कहा, ``पिताजी और पूछो न क्या हुआ?`` 
``ठीक है तो अब बता 8 और 12 को जोड़ने पर कितने आयेंगे?`` 
``पिताजी ये तो कितना सरल है बीस l`` बच्चे ने जब प्रसन्नता पूर्वक जवाब दिया तो पिता ख़ुशी के मारे उछल पड़ा l 
``अरे वाह! मेरे शेर l`` 
उनके उछलने से मिटटी की स्लेट जमी पर गिर गई और टूट गई l जैसे ही बालक ने टूटी हुई स्लेट को देखा तो वह फूट- फूटकर कर रोने लगा l   
``पिताजी आपने मेरी स्लेट तोड़ दी l`` 
``बेटा मैंने जानबूझकर नहीं तोड़ी पर तूं रो मत दूसरी ले ले l``,  पिता ने प्रेम पूर्वक कहा l 
`` नहीं पिताजी ये एक ही थी मेरे पास l आप दस रूपये दे दो मैं नई ले के आजाऊंगा l अपने बेट का जवाब सुनकर पिता स्तब्ध रह गया l जब उसके पिता कुछ नहीं बोले तो बालक ने फिर से कहा, ``पिताजी दे दो न दस रूपये l``
``नही है बेटा मेरे पास! क्या है न नौकरी छुटी हुई है, जैसे ही लग जाएगी तुम्हे मैं बहुत सी स्लेट दिलवा दूंगा``, जब पिता ने मजबूरी भरी भारी आवाज में कहा तो बालक ने भी अपनी बात रख दी ``पिताजी बिना स्लेट मैं पढूंगा कैसे? यहीं तो थी मेरे पास एक मात्र आपके पास है न दस रूपये दे दो न पिताजी`` 
``नही है बेटा पिता ने जब झुटमूट कहा तो बालक ने कहा, ``है न पिताजी आपकी ऊपर वाली जेब में झूट क्यों बोल रहे हो?`` बेटे की  पारखी नजर से पिता बच न सका l 
``बेटे ये दस रूपये l ये तो मेरी बीड़ी के लिए है l`` जब पिता ने मजबूरी जताई तो पुत्र से रहा नहीं गया उसने कहा, ``दे दो न पापा आज-आज बीड़ी मत पीना l`` 
``ठीक है ले जा l`` पिता ने मायूस होकर जैसे ही पैसे दिए l बालक की ख़ुशी का ठीकाना न रहा l वह दौड़ता हुआ दूकान की तरफ निकल पड़ा और उस पिता को अपने बेटे की पढाई के प्रति `लगन` को देखकर अपने नशे की क़ुरबानी देनी नागवार न लगी l   



    -राजेन्द्र कुमार शास्त्री ( गुरु ) 
सम्पर्क सूत्र - rk399304@gmail.com 
                                                                                                        मोबाइल - 9672272740                                                    

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  1. ye kahani aur iska sirshak bahut hi acha hai, dil ko chu lene wala post aapne likha hai thanks.
    mai pehli baar aapki website par aya lekin mujhe bahut acha laga, aasha karta hu aage bhi kuch nayi post milegi.

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