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इश्क की राह 



इश्क की राह पर हम कुछ कदम ही चले थे,
जख्म हरे थे और घाव बड़े  गहरे थे I

टूटा हुआ दिल लेकर मैं, अनजानी राह पर चल पड़ा था,
मुसाफ़िर की तलाश थी, पर पीछे अँधेरा खड़ा था I
इश्क की राह
इश्क की राह

बड़े सोख से सुनाता था, अपनी दिले-दास्तान काफिलों में
शायद इसलिए ही अब जाने से डरता हूँ, महफ़िलों में I

डरता हूँ मैं, कहीं मुहोब्बत फिर न हो जाए,
बड़ी सिद्दत से बनाए गए आशियाँ, फिर न ढह जाए I

बड़ा दुःख हुआ था, ये जानकर की मुझे तो बंजर मिला है,
हैरान हूँ मैं, की उसी बंजर में एक फूल खिला है I

उनकी क्या तारीफ करूँ मैं, जिनकी गुलाबी सैंडिल हैं,
दीपक की जरुरत नहीं मुझे, उनकी आँखे ही कैंडिल हैं I

खुदा कहूं, रब कहूं या फिर भगवान उसे,
यकीन करो मेरा, ईश्वर ने बड़ी सिद्दत से बनाया है उसे I

उसे देखने के बाद, बातें करने को दिल करता है,
लेकिन क्या करूं, मुझे अपनी औकात से डर लगता है I

दिल करता है, उनकी थोड़ी तारीफ  ओर करलूं,
लेकिन कल फिर मिलना है, जरा सा तो सो लूं I




- राजेन्द्र कुमार शास्त्री `गुरु`
                 

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  1. meri kahani kah di bhai
    sachi .. very very good.
    dile dastan kya sunaye,ab to apno se hi dar lagta h.
    lade the jis jalim ke liye jamane se , wahi ab mujhe bewfa kahta h.

    उत्तर देंहटाएं
  2. meri kahani kah di bhai
    sachi .. very very good.
    dile dastan kya sunaye,ab to apno se hi dar lagta h.
    lade the jis jalim ke liye jamane se , wahi ab mujhe bewfa kahta h.

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