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बच्चों की परवरिश कैसे करें 


बच्चों की परवरिश कैसे करें -Bacho Ki Parvarish Kaise Kare  - बच्चे , हम सब के जीवन का एक  अभिन्न  अंग हैं | चाहे बात व्यक्तिगत हो या व्यावसायिक | आधे  से ज़्यादा बातें बच्चों से संबंधित होतीं हैं | 

व्यक्तिगत पक्ष “हम जो  कर रहे हैं , बच्चों के लिए ही तो कर रहे हैं | कमा रहे हैं , खरीद रहे हैं आदि – आदि |” बिलकुल सही , माता-पिता  पर बच्चों की आर्थिक , सामाजिक , मानसिक आदि हर प्रकार की ज़िम्मेदारी होती है | इसलिए उनके ज्यादातर क्रिया-कलाप बच्चों पर ही केन्द्रित होते हैं  या उनसे सम्बंधित होते हैं | जो ऐसा नहीं करता , उसको समाज में बड़ी हेय दृष्टि से देखा जाता है | उसे लापरवाह , स्वार्थी आदि संज्ञाएँ दे दीं जाती हैं | काफ़ी हद तक यह तथ्य सही है क्योंकि परिवार ही हर बच्चे की विरासत होता है , सम्पत्ति होता है जो उसे जन्म से ही मिल जाती है | अगर वहीं से उसे साथ न मिले तो वह कहाँ जाएगा | स्पष्ट है कि अपने रास्ते से भटक जाएगा | 

अब बात करते हैं व्यावसायिक पक्ष की | सबसे पहला और महत्वपूर्ण तथ्य है-शिक्षा | जो आज सब से ज़्यादा फायदेमंद बिजनेस है | पहले बच्चा पहली कक्षा से विद्यालय जाता था | फिर नर्सरी , के.जी. जैसी कक्षाएँ आ गईं |
बच्चों की परवरिश
बच्चों की परवरिश
जिसमें और भी कम के बच्चे लगभग 3-4 वर्ष के बच्चे भी विद्यालय जाने लगे | यहाँ तक भी स्थिति इतनी भयावह नहीं थी | बच्चे ‘सॉफ्ट टारगेट’ होते हैं | ये बात बार-बार हमारे सामने दोहराई जाती है | जब हम बच्चे को किसी दुर्घटना का शिकार होते देखते हैं |

लेकिन हमने आधुनिकता के नाम पर बच्चों का बचपन छीन लिया | बड़े स्कूलों में एडमिशन कराने की चाह , स्मार्ट बनाने की चाह , चैंपियन बनाने की चाह , स्मार्ट बनाने की चाह आदि कई ऐसे तथ्य हैं | जिनका उचित-अनुचित लाभ उठाने के लिए सबने किसी न किसी दिशा में कदम बढ़ा दिए | फिर आई प्री-स्कूलों की बहार , बच्चे को अच्छे स्कूल में एडमिशन दिलाएँ , स्मार्ट बनाएँ आदि-आदि लुभावने वादों में अभिभावकों की भावनाओं का सौदा किया जाने लगा | अभिभावक अब औपचारिक विद्यालय में पहले अनौपचारिक विद्यालयों की तरफ़ अंधाधुंध भाग रहें हैं | यहाँ हमारा बच्चा स्मार्ट बनेगा , कुछ सिखा देंगे आदि-आदि | इसमें भी वातानुकूलित विद्यालयों को ज़्यादा अच्छा माना जाता है | एक तरह से ठीक भी है , छोटे बच्चों के लिए वातावरण भी अच्छा होना चाहिए | तभी तो वह आज़ादी से , खुश मन से सभी काम कर सकेगा , सीख सकेगा |

और अब आई बहार – एक्टिविटी सेंटर की यानि विभिन्न गतिविधियों का केंद्र | जहाँ पढ़ाने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ भी कराई जाती हैं | अब शिक्षा के क्षेत्र में सबको लाभ दिखा तो उससे संबंधित और भी व्यवसाय सामने आ गए | बच्चों के लिए विभिन्न प्रकार के उत्पाद , चाहे वह खाने के हों या प्रयोग करने करने के , हर क्षेत्र में कहीं बच्चों को उत्पाद बना कर , कहीं बच्चों को उपभोक्ता बना कर , कहीं उत्पादक बना कर प्रयोग किया जाता है | 

इन सब में हमें क्षणिक सुख मिलता है | छोटे-छोटे बच्चों को बड़ों के संवाद बोलते हुए , देखते हुए सब के चेहरों पर एक मुस्कराहट आ जाती है | कंपनी को सस्ते मॉडल मिल जाते हैं और उनकी लागत भी कम हो जाती है | अभिभावक व बच्चे दोनों खुश , आर्थिक लाभ भी है और टी.वी. पर आते हैं तो प्रसिद्धि भी मिल रही है | 
पहले कभी कोई एक या दो बच्चे ऐसे मिलते थे जो बड़ी गंभीरता से या समय से पहले परिपक्व हो जाते थे | पर अब अधिकांशत : बच्चे ऐसे ही मिलते हैं जो अपनी शारीरिक आयु से अधिक मानसिक आयु वाले होते हैं | कहाँ चले गए बच्चे .....? कहाँ खो गया बचपन ....?

हम बच्चों को उम्र से ज़्यादा सिखाने की कोशिश करते हैं | उम्र से ज़्यादा सोचने पर दबाव डालते हैं | सब जानते हैं कि बच्चे तो कोमल मिट्टी की तरह होते हैं , जैसे ढालो वैसे ढल जाते हैं | हम ही तो हैं जो बच्चों को कठोर बनने पर मजबूर करते हैं | बच्चा अपनी स्वाभाविक सोच से जो कहता है ,जो करता है , हम मार्गदर्शन के नाम पर उसमें बदलाव कर देते हैं | फिर जब बच्चा अपनी उम्र से बड़ी बातें करता है तो हम कहते हैं कि आजकल के बच्चे , बच्चे नहीं रह गए हैं | उनके पास एक अलग सोच है , काम करने की शैली है | उनकी कोमलता कहीं खो गई है | उम्र से ज़्यादा गंभीर,परिपक्व बनने के लिए हम ही तो प्रोत्साहित करते हैं | बच्चा सूरज-चाँद देखना चाहता है तो हम सर्दी-गर्मी के नाम पर कमरे में बिठाकर टी.वी. पर दिखा देते हैं | हर चीज़ स्क्रीन पर देख लो बस...|

आजकल की मनोवैज्ञानिक सोच हर चीज़ के पीछे कारण ढूंढती है | हमने बच्चों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से ये सोच दी कि हर बात का विश्लेषण कीजिए | बच्चों ने अंतर करना शुरू कर दिया | अपने अज्ञान और कच्ची सोच में अपने रंग भरने शुरू कर दिए | इन बातों को श्रृंखला बहुत लंबी है ....| 

बच्चा जो भी करता है सही है या गलत ...| इन सब के लिए बच्चों से अधिक बड़े ही उत्तरदायी हैं | समय आने पर जीवन की वास्तविकताएं स्वयं ही पता चल जातीं हैं | जागरूकता के नाम पर बच्चों को सिर्फ उतनी जानकारी दें , प्रशिक्षण दें जितना उनकी शारीरिक व मानसिक आयु के अनुरूप हो | ‘अति सर्वत्र वर्जयते |’ वरना कहीं ऐसा न हो कि हमें बचपन में भी बच्चे नहीं बड़े  ही मिलेंगे जो शरीर से तो छोटे हैं पर मन और बुद्धि में हम से कहीं अधिक बड़े और परिपक्व हैं |       
     




लेखिका-
इलाश्री जायसवाल
नोएडा 
मो-9911542580

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