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सारा आकाश उपन्यास में संयुक्त परिवार व्यवस्था


सारा आकाश उपन्यास
सारा आकाश उपन्यास
सारा आकाश उपन्यास में संयुक्त परिवार व्यवस्था - सारा आकाश मध्यवर्गीय परिवार का यथार्थ दर्पण हैं .उपन्यासकार श्री राजेन्द्र यादव ने कथा नायक समर के संयुक्त परिवार व्यवस्था को अपनी लेखनी का विषय बनाया है .समर का परिवार लगभग १० सदस्यों का है .इस बड़े परिवार का भरण पोषण करने वाला मात्र एक व्यक्ति धीरज है ,जो नौकरी में ९९ रुपये प्रतिमाह वेतन पाता है .परिवार की आय का दूसरा स्रोत ठाकुर साहब की २५ रुपये का पेंशन है .इस अर्थ प्रधान युग में वह निरंतर जर्जर होते जा रहे हैं . इसी कारण वह चाहते हैं कि समर भी नौकरी कर ले .संयुक्त परिवार व्यवस्था में वह परिवार के स्वामी है .उनका दायित्व है कि वह परिवार के सभी सदस्यों के हितों का ध्यान रखें ,परन्तु उनके पास इस बड़े परिवार को चलाने का कोई ठोस आर्थिक आधार नहीं हैं .यह स्थिति मध्यवर्गीय व्यवस्था में हर जगह  है .फलतः वर्तमान आर्थिक स्थिति में संयुक्त परिवार चल नहीं सकती है .यह पुरानी व्यवस्था है .यद्दपि आज यह व्यवस्था निरर्थक और खोखली बन गयी है .परन्तु गृहस्वामी की इज्जत एकता में रहने के पागलपन ,पृथक चूल्हा जलाने के हठ के कारण यह आज भी जीवित है .

उपरी भावुकता तथा आरोपित इज्जत के कारण चाहे भले ही संयुक्त परिवार व्यवस्था चलती रहती है ,परन्तु वास्तविकता है कि अन्दर ही अन्दर कई इकाइयों इसमें जीवित रहती हैं . वह आर्थिक खींचा तानी में चूर चूर हो जाता है .अच्छे से अच्छी प्रतिभाएँ भी अपना विवेक और अपनी बुद्धि का सही उपयोग नहीं कर पाते हैं .परिवार का पूरा पूरा वातावरण ही दमघोटू और विषाक्त बन जाता है .ऐसी स्थिति में जो असंतोष उभरता है उसका परिणाम बड़ा भयानक होता है .गृह स्वामी का निर्णय ही सभी सदस्यों को मान्य करने पड़ते हैं .गृह स्वामी का निर्णय अदूरदर्शी भी हो सकता है .किन्तु उससे सदस्य का प्रभावित होना निश्चित है .इस कारण यह व्यवस्था आज के आर्थिक समाज के लिए अनपयुक्त और बोझ है . 

उपन्यासकार ने शिरीष के माध्यम से संयुक्त परिवार व्यवस्था का कड़ा प्रहार किया है .शिरीष उपन्यासकार का माउथ पीस है .उसकी मान्यता ही लेखक की मान्यता है .शिरीष का दृष्टिकोण पूरी तरह तरह यथार्थवादी है .जब तक सभी सदस्य मिलकर आर्थिक स्थितियों का सामना नहीं करेंगे तब तक आर्थिक पंगुता से छुटकारा नहीं मिल सकता है . 

इन्ही कारणों से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इस आर्थिक युग में संत्युक्त परिवार व्यवस्था अनुपयोगी सिद्ध हो चुकी है .व्यक्ति के विकास में इसे वांछनीय नहीं कहा जा सकता है .जीवन जीने के लिए इसे तोड़ने की आवश्यकता है .अन्यथा दमघोटूं वातावरण में बराबर आत्महत्याएँ होती रहेंगी .निष्कर्ष के रूप में हम शिरीष के शब्दों को उधृत कर सकते हैं - 

"अगर आप जिन्दा रहना चाहते हैं ,या चाहते हैं कि आपकी पत्नी भी जिन्दा रहे इसके सिवा कोई रास्ता नहीं है कि अलग रहिये .जैसा भी हो अलग रहिये ....


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