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अ लेटरबॉक्स


आज सुबह ठंड काफी ज्यादा थी,
मुझे लग नहीं रहा था कि आज वो आयेगी,
हालांकि मै इन सैकड़ों की भीड़ में
सिर्फ उस एक चेहरे को ही ढूंढ़ रहा था,
जिसका मुझे बेसब्री से इंतजार था
समय तो हो ही चला था
विकास सर्राफ
विकास सर्राफ
लेकिन आज पता नहीं क्यों वो लेट थी,
सामने टी स्टॉल पर लोग ठंड से ठिठुर रहे थे
ठंड के मारे उनके होठ भी नहीं हिल रहे थे..
और जिनके हिल रहे थे,
उनके होठों के बीच से तो भाप ही निकल रहा था..
वैसे ठंड तो मुझे भी काफी लग रही थी...
लेकिन उस खूबसूरत लड़की का इंतजार
तो मानो मेरे लिए अब खुदा की इबादत बन गया हो...
मैं तो उसे बस करीब से, और करीब से देखना चाहता था..
मेरी नजरें हर गुजरने वाले में बस एक ही चेहरा ढूंढती रहती थी..
आज तो उसे कुछ ज्यादा ही लेट हो गया था..
और मेरी उम्मीद भी अब बस टूट ही रही थी..
शायद इस ठंड की वजह से मुझे एक हफ्ते का और इंतजार करना पड़े..
वो हर शुक्रवार को ही घर से निकल पाती थी...
न जाने ऐसी क्या बात थी...
मैं निराश हो ही चला था कि
सामने से उसके पैरों के पायल की आवाज ने मुझे जैसे नींद से जगा दिया..
आखिरकार वो खूबसूरत बला आ ही गयी थी..
उसके कानों की बड़ी – बड़ी बाली,
 उसके वो गुलाबी सुर्ख होंठ,
चमकते लहराते बाल, और मस्तानी आखें ये सब मेरे होश उड़ाये जा रहे थे..
जैसे – जैसे वो मेरे नजदीक आ रही थी मेरी सांसे थमती जा रही थी...
मेरा दिल जैसे... अब धड़कना ही बंद कर देगा...
मैं मदहोश हुआ जा रहा था..
और वो इधर - उधर देखती हुई..घबराते हुए,
जल्दी - जल्दी, मेरी ही ओर बढ़ी आ रही थी..
उसके पास भी शायद समय कुछ कम था..
 वो आयी और मेरे ठीक सामने खड़ी हो गयी..
वो कुछ पल के लिए ठहरी और इधर – उधर देखने के बाद
उसने सीधे मेरी ओर देखा...
मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था..
न दिल धड़क रहा था...न जुबान हिल रही थी...
और मेरी निगाहें तो उसके चेहरे से इतर कुछ और देख ही नहीं पा रही थी...
वो इधर – उधर देखते हुए मेरे थोड़ा और करीब आयी..
जल्दी से उसने अपने पर्स में से एक कागज निकाला और मेरे मुंह में ठूस दिया...
और मुड़ कर वापस जाने लगी..
अब शायद आप ये जानना चाहते होंगे कि मैं हूं कौन.. मेरा नाम क्या है...
तो सुनिये जनाब..
मैं हूं -  आज स्मार्टफोन्स और इमेल्स की दुनिया में भुला दिया गया,
एक लेटरबाक्स ।



- विकास सर्राफ
8808264985

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