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करूणा


तुमनें जो कहा था।
वो याद है मुझे,
कुछ दु:ख की तरह
कुछ सुख की तरह,
कुछ मुस्कुराहट की तरह
कुछ खामोश लफ्जो़ की तरह।
एक बात बताओ करूणा,
करूणा
तुम कहां रहते हो?
तुम क्या करते हो?
मुझे क्यों छुपके से टटोल जाते हो,
मैं पानी की तरह झंझना जाता हूं।
मुझे किसी लोहे की तरह फेंक देते हो,
मैं किसी तरह धरती में गड़ जाता हूं।
मगर उसकी गहराई की छाप,
दिल में सुराख़ बनकर निखर जाता है।
तुम धूल भी उठाते हो तो,
मुझे लगता है मेरे ईर्द-गिर्द ख्वाबों को उठा लिया है,
जिसे तुम हवा में बिखेर देते हो,
और मैं कहां-कहां उड़ जाता हूं।
इसके बावजूद भी मुझे दु:ख है,
कि तुम दीवार हो जिसे मैं तोड़ नही पाता हूं।
तुम गहरे सागर में वो मोती हो,
जिसे मैं पाना चाहता हूं,
लेकिन उस गहराई में मेरी सांसे थक जाती है।
काश तुम वो होते तो कितना अच्छा होता,
काश तुम गीत होते तो,
मैं उसे जीवन भर के लिए याद कर लेता।
काश तुम सिर्फ लहू होते तो,
मैं उसे अपनें नसों में सजा लेता।
काश तुम पानी होते तो,
मैं बहुत देर तक प्यासा रह लेता।
काश तुम आग होते तो,
मैं अपना पूरा जिस्म जला लेता।
मगर तुम तो सिर्फ एहसास हो,
जो रह-रह कर आ जाते हो किसी वक्त में।
और मुझे नि:शब्द रात की तरह छोड़ जाते हो,
मैं फिर से सुबह का इन्तजार करता हूं।
कि मैं तुम्हें फिर से महसूस कर सकू,
करूणा.....!

                 


राहुलदेव गौतम

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