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डर लग जाता है


कुछ नही लगता है। बस डर लग जाता है।
कल कहां तुम चले जाओगे।
इन आंखों की खामोशी रह जायेगी,
हमारे वक्त की शादगी रह जायेगी,
कुछ नही मेरी जुबानी है। बस डर लग जाता है।

कल कहां तुम चले जाओगे।
डर लग जाता है
ख्वाबों के जमीं पर तेरे पावों की निशानी है,
सुबह और शाम में तुम्हारी ही रूहानी है,
कुछ नही कुर्बानी है। बस डर लग जाता है।

कल कहां तुम चले जाओगे।
तुम्हारी तब्बुसुम में सूरज की रोशनी है,
कितनें अरमानों चाहत की चांदनी है,
कुछ नही मेहरबानी है। बस डर लग जाता है।

कल कहां तुम चले जाओगे।
तुम्हारी आदत कितना कुछ बयां कर जाती है,
चंदा की चांदनी पर फऩा कर जाती है,
कुछ नही अल्हड़ नदानी है। बस डर लग जाता है।

कल कहां तुम चले जाओगे।
कितनें उम्मींदे रह-रह कर आ जाती है,
तेरे पलकों पर यूहीं ठहर-ठहर जाती है,
कुछ नही भावनाओं की कहानी है। बस डर लग जाता है।

कल कहां तुम चले जाओगे।
तुम कहीं भी रहो हम कहीं भी रहे,
तन्हाई की खिड़कियों में हमारी यादों की हवा आती-जाती रहे,
कुछ नही मोह की तुफ़ानी है। बस डर लग जाता है।

कल कहां तुम चले जाओगे।
तुम आ तो जाते हो माथे की शिकन बनकर,
कभी जन्म लेना अकेले की जीवन बनकर,
कुछ नही राहें अंजानी है। बस डर लग जाता है।

कल कहां तुम चले जाओगे।
मेरे लिए हृदय की गांठ खोल देना,
समय मिले तो मुझे तौल देना,
यह मेरी बाते जानी-पहचानी है। बस डर लग जाता है।
कल कहां तुम चले जाओगे।



यह रचना राहुलदेव गौतम जी द्वारा लिखी गयी है .आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है . आपकी "जलती हुई धूप" नामक काव्य -संग्रह प्रकाशित हो चुका  है .
संपर्क सूत्र - राहुल देव गौतम ,पोस्ट - भीमापर,जिला - गाज़ीपुर,उत्तर प्रदेश, पिन- २३३३०७
मोबाइल - ०८७९५०१०६५४

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