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अनुवाद का कचरा और शब्दों की एकरूपता


केंद्रीय हिंदी निदेशालय में शब्दावली समन्वय के लिए अखिल भारतीय स्तर पर एक शब्दावली समन्वय समिति बनाई गई थी और उन्होंने एक सूची जारी भी की थी।प्रशासन की बात छोड़ भी दें तो अभी हाल में मुझे शिक्षा शास्त्र अर्थात B.Ed की कुछ पुस्तकें देखने का अवसर मिला। कुछ शब्दों के हिंदी पर्याय तो इतने चौंकाने वाले थे जैसे फाइन आर्ट्स के लिए उदार कलाएं और परफॉर्मिंग आर्ट्स के लिए निष्पादन कला। निष्पादन तो हम
अनुवाद
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डिस्पोजल के लिए स्वीकृत कर चुकेहै ।यद्यपि अगर यह परफॉर्मिंग कल्चर के सेंस में है तो निष्पादन भी उचित है अगर यह नृत्य और नाटक के संबंध में है तो मंचन ठीक है अगर यह म्यूजियम के संबंध में है तो प्रदर्शन ठीक है।हमें चाहिए कि हम अनुवाद का ऐसा कचरा इधर-उधर न एकत्र करें जिससे राज्यों के बीच आपसी समन्वय में भी बाधा उत्पन्न हो ।

राज्य सरकारों ने भी अपने अपने भाषा विभागों में ऐसी शब्दावली समन्वय समितियां अवश्य बनाई होंगी और मेरे निष्कर्ष आगरा विश्वविद्यालय की परीक्षा के लिए तैयार की गई पाठ्य पुस्तकों और गाइड नोट्स को देखने के बाद आपके समक्ष है.भाषा हमारी समाज और संस्कृति से जुड़ी हुई एक अनमोल धरोहर है मैं तो इसमें संदेह  न होना चाहिए और ना इस का पतन होना चाहिए। हमारी बोलचाल में भी शालीनता और अच्छे शब्द ही व्यक्त होने चाहिए।शब्दावली समन्वय के कार्य को उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक करने के लिए एक समन्वित अखिल भारतीय प्रयास की जरूरत है जो साइंस तकनीक और अन्य कला विषयों पर पदबंध होके समुचित और सही पर्याय दे सके ।

 सरकारी और गैर सरकारी वेबसाइटों पर डिस्क्लेमर का भी हिंदी अनुवाद भिन्न भिन्न रूप से देखने को मिला है । क्या ही अच्छा हो की अखिल भारतीय रूप से हिंदी के शब्दों के सही पर्याय और समुचित पर्याय जो प्रशासन अध्यापक और रोजमर्रा के लिए जनता के लिए सुलभ हो वह सर्व स्वीकृत हो ऐसा प्रयास अवश्य किया जाना चाहिए जिसकी अब अति आवश्यकता है।ललित कलाओं में तो पात्र के अभिनय वेशभूषा और चेहरे की भाव भंगिमा और संवाद अदायगी में रूप और नायक नायिका की चाल पर अनेक ऐसे शब्द हो सकते हैं जिन्हें एक कला पारखी व्यक्ति ही समझ सकता है इनसे जनसाधारण और कला प्रेमियों में शब्दों के प्रति एक जैसी रुचि उत्पन्न करने की भी जरूरत है।

केंद्र सरकार के इस संबंधित निर्देश केवल भाषा विभाग तक ही सीमित नहीं रहने चाहिए बल्कि वह राज्य सरकारों के विभिन्न संबंधित विभागों जैसे पाठ्य पुस्तक तैयार करने वाली समितियों तक भी पहुंचने चाहिए और इन समितियों के सदस्य भी ऐसे होने चाहिए कि जिन्हें शब्दों की एकरूपता की बखूबी समझ हो।




संपर्क  - क्षेत्रपाल शर्मा
म.सं 19/17  शांतिपुरम, सासनी गेट ,आगरा रोड अलीगढ 202001
मो  9411858774    ( kpsharma05@gmail.com )

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