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सभा समिति


आजकल किसी भी सभा-समिति में लोगों की कम भीड़ देखने को मिलती है । मैं राजनीतिक दल द्वारा आयोजित सभा-समितियों की बात नहीं कर रहा । उसमें तो कई सालों से लोगों ने अपनी इच्छा से जाना बंद कर दिया है । इसीलिए राजनीतिक दल गांव से लोगों को ट्रक, बस आदि में भर कर लाते हैं । खानेपीने के अलावा कुछ पैसे भी देते हैं । कुछ लोगों ने इसे पेशा तक बना लिया है । जिस किसी दल से भी बुलावा आए यह लोग चले जाते हैं । उसी दल का झंडा लेकर जिंदाबाद के नारे लगाते हैं । शाम को मजदूरी लेकर घर लौटते हैं ।
सभा-समिति
सभा-समिति

मैं दुसरी तरह की सभा-समितियों की बात कर रहा हूं । वहां लोगों को बुलाने की बात छोड़िए, चाय पानी देने पर भी कोई नहीं आता । लोग चाय-नाश्ता कर निकल जाते हैं । इसीलिए आजकल इन सभा-समितियों में कब चाय-नाश्ता परोसा जाएगा यह कोई नहीं बताता ताकि लोग खाकर भाग न जाएं ।
इन सभा-समितियों में न आने के कारण क्या हैं ? रिसर्च के बाद मैंने जो आविष्कार किया,  आपके सामने परोसता हूं ।


आरम्भ में देरी - 

कभी भी सही समय पर सभा शुरू नहीं होती । क्यों ? बहुत सारे कारण हैं । हालांकि बहुत बार अतिथि आने में देरी कर देते हैं । ज्यादातर सभाओं में राजनेता, मंत्री आदि को बतौर अतिथि बुलाया जाता है । उनमें से ज्यादातर लोग सही समय पर जाना अपने शान के खिलाफ समझते हैं । उनकी यह धारणा है कि सही समय पर जाने से इज्जत कम हो जाती है । लोग प्रतीक्षा करें तो अच्छी बात है । चूंकि अथिति देर से आते हैं इसीलिए लोग भी देरी से ही आते हैं । छह बजे की सभा नौ बजे शुरू होती है । इसीलिए जिन सभाओं में जाना जरूरी नहीं वहा लोग नहीं जाते ।

अतिथियों का परिचय - 

सभा प्रारंभ में जो देरी होती है सो देरी होती है, उसके बाद अतिथियों का परिचय कराने में घंटों लग जाते हैं । अतिथियों के बारे में इतनी बातें बताने की क्या जरूरत यह मुझे आजतक समझ नहीं आया । अगर अतिथि इतने ही गुणी हैं तो उनके गुणों के बारे में सभी को पता होगा तो फिर इतनी प्रशंसा क्यों....लोगों को उनके बारे में याद भी नहीं रहता ।

सम्बोधन - 

परिचय के बाद अतिथियों का भाषण । प्रत्येक अतिथि सम्बोधन में ही इतना समय लगाते हैं कि पांच मिनिट पार हो जाता है । मान लीजिए एक मंच पर दस लोग हैं, अगर दस लोग पांच-पांच मिनट तक अन्य अतिथियों को सम्बोधन करते रहें तो पचास मिनट शेष ।

अति भाषण - 

कुछ वक्ताओं के हाथ माइक लगते ही वह आक्रामक हो उठते हैं । तभी उन्हें सारी बातें याद आती हैं ।  सभी तत्व, सभी ज्ञान । घंटों तक उनकी बातें चलती रहती है । इसी चक्कर में वह समय का ध्यान नहीं रख पाते ।

बिना मुद्दे का भाषण - 

नवघन एक अच्छा वक्ता है । बहुत लोग उसे सभाओं में भाषणबाजी के लिए बुलाते हैं । उसदिन कुछ लोग उसके घर आए । उन्होंने कहा- हमारी सभा में आइए, आप एक अच्छे वक्ता बन जाएंगे । नवघन ने पूछा, मुझे कितना समय बोलना पड़ेगा ? उन्होंने कहा-जितनी मर्जी बोल लीजिए ! नवघन ने कहा अगर पांच मिनट बोलना है तो तैयारी के लिए मुझे पांच मिनट चाहिए । अगर दस तो दस मिनट का वक्त जरूरी है और अगर दो घंटे बोलने हैं तो चलिए मैं अभी आपके साथ चलता हूं ।
यहां बोलने का मतलब यह है कि जो लोग तैयारी नहीं करते वह लोग ज्यादा बोल पाते हैं । क्योंकि उनके पास बोलने के लिए कोई खास मुद्दा नहीं होता । कहीं से कुछ भी उठाकर बोलने में माहिर होते हैं यह लोग । लोग क्यों एेसी बातों को सुने जो बेमतलबी हो ?

धन्यवाद ज्ञापन - 

सभा-समितियों में धन्यवाद ज्ञापन अथवा आभार व्यक्त करने की परंपरा किसने शुरू की थी यह मैं नहीं बता सकता लेकिन अब इसकी क्या जरूरत है मुझे समझ नहीं आता । समय नष्ट करना तथा धन्यवाद ज्ञापनकर्ता का माइक लेकर खड़े होने के अलावा क्या मायने हैं  पता नहीं !

आम तौर पर धन्यवाद ज्ञापनकर्ता क्या कहता है ? आप लोगों ने मुख्य अतिथि के मुंह से बहुत कुछ सुना  । (आप खुद बताइए मुंह के अलावा किसी अन्य अंग के सहारे कोई बात कर सकता है क्या ? हां आंखों से बात हो सकती है लेकिन क्या मुख्य अतिथि आंखों से बातें करें यह कभी संभव है ?)....अपना बहुमूल्य समय नष्ट कर अतिथि यहां आए ....(अरे ! अगर अतिथियों का समय बहुमूल्य है तो क्या हमारे समय का कोई मूल्य नहीं ? और अगर यहां आने का मतलब ही बहुमूल्य समय नष्ट करना है तो एेसे गैरजरूरी सभाओं का आयोजन करने की क्या आवश्यकता थी ?


-मृणाल चटर्जी
अनुवाद- इतिश्री सिंह राठौर



मृणाल चटर्जी ओडिशा के जानेमाने लेखक और प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं । मृणाल ने अपने स्तम्भ 'जगते थिबा जेते दिन' ( संसार में रहने तक) से ओड़िया व्यंग्य लेखन क्षेत्र को एक मोड़ दिया । इनका एक नाटक संकलन प्रकाशित होने वाला है। 

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