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तू क्या जाने रे मुसाफ़िर 



तू क्या जाने रे मुसाफ़िर, बिन तेरे
         हम कितने रोये होंगे
 न जाने कितनी राते
              हम सोये नहीं होंगे

आँखे आज भी राह
मुसाफ़िर
मुसाफ़िर
         तकती हैं तेरी
चल बता क्या
            खता थी मेरी

जख्म जिन्दगी के न जाने
                     कितनी सहे होंगे
तू क्या जाने रे मुसाफ़िर बिन तेरे
         हम कितने रोये होंगे

सावन न जाने क्यों
        सूखा सा लगता है
संगीत न जाने क्यों
           बेमतलब सा लगता है

न जाने कितने नाम तेरे
           सीने पे कुरेदे होंगे
तू क्या जाने रे, मुसाफ़िर बिन तेरे
      हम कितने रोये होंगे

कितनी मन्नतो से
    रब से माँगा था तुझे
ये तो नहीं सोचा था
       तूं इतनी सजा दे मुझे

न जाने कितने गुमनामी
     के दर्द सहे होंगे
 तू क्या जाने रे मुसाफ़िर बिन तेरे
         हम कितने रोये होंगे
                                  


  - राजेन्द्र कुमार शास्त्री ( गुरु )

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