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जन्माष्टमी पूजा विधि और शुभ मुहूर्त


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कृष्ण जन्माष्टमी पूजन विधि Janmashtami Puja Vidhi & Samagri-
भाद्रपद मास की कृष्ण जन्माष्टमी को इस व्रत को करना चाहिए। इस दिन ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हुए श्रीकृष्ण का स्थापन करना चाहिए। सर्वप्रथम श्रीकृष्ण की मूर्ति स्वर्ण कलश के ऊपर स्थापित कर चंदन, धूप, पुष्प, कमलपुष्प आदि से ऑकूण प्रतिमा कों व से वेष्टित कर विधिपूर्वक अर्चन करें| गुरुचि, टी पीतल और सौंठ को कृण के आगे अलग-अलग रखें। इसके पश्चात भगवान विष्णु के इस रूपों को देवी सहित स्थापित करें।
हरि के सानिध्य में भगवान विष्णु के दस अवतारों, गोपिका, यशोदा, वसुदेंव, नंद, बलदेव, देवकी, गायों, वत्स,
श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण
कालिया, यमुना नदी, गोपगण और गोपपुत्रों का पूजन करें। इसके पश्चात आठवें वर्ष की समाप्ति पर इस महत्वपूर्ण व्रत का उद्यापन कम भी करें।

यथाशक्ति विद्यान द्वारा श्रीकृष्ण की स्वर्ण प्रतिमा बनाएँ। इसके पश्चात 'मत्स्य कूर्म' इस मंत्र द्वारा अर्चनादि करें। आचार्य ब्रह्मा तथा आत विज़ों का वैदिक रीति से वरण करें। प्रतिदिन ब्राह्मण को दक्षिणा और भोजन देकर प्रसन्न करें।

उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएँ। पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि, आकाश, वेंचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मूछ बैठे। इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें- ममधिलपापग्नशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये ॥

अच्च मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकी ज़ी के लिए 'सूतिकागृह' नियत करें। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हों। इसके बाद विद्यविधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम नमशः निर्दिष्ट करना चाहिए। पिर निम्न मंत्र में पुष्पांजलि अर्पण - 'प्रणमें देव जननी वया जातस्तु वामनः। वसुदेवात तथा कृष्णों नमस्तुभ्यं नमो नमः। सुपुत्रा प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।' अंत में प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन करते हुए रतजगा करें।

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा Janmashtami Vrat Katha


देवराज इंद्र  ने कहा- 'हे मुनियों में श्रेष्ठ! इस व्रत को बता जिस व्रत में मनुष्यों को मुक्ति, लाभ प्राप्त हों तथा भोग व मोक्ष भी प्राप्त हो जाए। इंद्र की बातों को सुनकर नारद जी ने कहा- 'जेता युग के अन्त में और द्वापर युग के प्रारंभ समय में निन्दित कर्म को करने वाला कंस नाम का एक भयंत पापी न्य हुआ। इस दुष्ट व दुराचारी कंस की देवकी नाम की एक सुंदर बहन थीं। देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र कंस का वध करेगा।' नारद जी की बातें सुनकर इंद्र ने कहा- 'इस दुराचारी कंस की कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन करने की कृपा कीजिए। इंद्र की सन्देह भरी बातों को सुनकर नाइजी ने कहा - हे अदिति पुत्र इंद्! एक बार इस दुष्ट कंस ने एक ज्योतिषी से पूछा - 'मेरी मृत्यु किस प्रकार और किसके द्वारा होगी।' ज्योतिषी बोले - 'हे दानवों में श्रेष्ठ कंस! वसुदेव की पत्नी देवकीज़ों वाकपटु हैं और आपकी बहन भी है। इसी के गर्भ में 5पन इसका आठवां पुत्र जो कि शत्रुओं को भी पराजित कर इस संसार में 'कृष्ण' के नाम से चियात होगा, वहीं एक समय सूर्योदय काल में आपका वध करेगा।' योनि की बातों को सुनकर कंस ने कहा - 'हे वज़, अब आप यह बताएं कि देवकी का आठवां पुत्र किस मास में किस दिन मेरा वध करेगा।' ज्योतिषी बोले - 'हे महाराज़! माघ मास की शुक्ल पक्ष की तिथि को सोलह कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण से आपका युद्ध होगा। इस युद्ध में वे आपका वध करेंगे। इसलिए है महाराज! आप अपनी रक्षा करने का प्रबन्ध करें।' इतना बताने के पश्चात नारद जी ने इंट्स से कहा- 'ज्योतिषी द्वारा बताए गए समय पर हीं कंस की मृत्यु कृष्ण के हाध निःसंदेह होंगी।' तब इंद्र ने कहा- 'हे मुनि! इस दुराचारी कंस की कथा का वर्णन कीजिए, और बताइए कि कृष्ण का जन्म कैसे होगा तथा कंस का मृत्यु कृष्ण द्वारा किस प्रकार होगी।'

नारदजी ने पुनः कहना प्रारंभ किया- 'इस दुराचारी कंस ने अपने एक द्वारपाल से कहा- 'मेरी इस प्राणों में प्रिय
श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण
बहन की पूर्ण सुरक्षा करना।' द्वारपाल ने कहा- 'ऐसा ही होगा। कंस के जाने के पश्चात इसकी छोटी बहन दुःवित होते हुए जान लेने के बहाने घड़ा लेकर तालाब पर गई। इस तालाब के किनारे एक वृक्ष के नीचे बैठकर देवकी रोने लगी। उसी समय यशोदा नामक एक सुंदर स्त्री ने देवकी में भय वाणी में कहा- 'हे देवी! इस प्रकार तुम क्यों विलाप कर रही हों।' तब दुची देवी ने यशोदा में कहा- हे बहन! नीच कर्मों में आसक्त दुराचारी मेरा ज्येष्ठ भ्राता कंस हैं। इस दुष्ट माता ने मेरे कई पुत्रों का वध कर दिया। इस समय मेरे गर्भ में आयाँ पुत्र है। वह इसका भी वध कर डालेगा, क्योंकि मेरे ज्येष्ठ भ्राता को यह भय है कि मेरे अष्टम पुत्र में उसकी मृत्यु अवश्य होगी।'

यशोदा ने कहा- 'हे बहन! विलाप मत करो। मैं भी गर्भवती हैं। यदि मुझे कन्या हुई तो तुम अपने पुत्र के बदले इस कन्या को ले लेना। इस प्रकार तुम्हारा पुत्र संस के हाथों मारा नहीं जाएगा।'
तदनन्तर कंस ने अपने द्वारपाल से पूछा- 'देवकी कहाँ है? इस समय वह दिखाई नहीं दे रहीं हैं।' तब द्वारपाल ने संस में नमवाणी में नहा- 'हे महाराज! आपका बहन जल लेने तालाब पर गई हुई हैं। यह सुनते ही कंस क्वचित हों 5ळा और उसने द्वारपाल को इसी स्थान पर जाने को कहा जहां वह गई हुई हैं। द्वारपाल की दृष्टि तालाब के पास देवकी पर पड़ीं। तब उसने कहा कि 'आप किस कारण से यहाँ आई हैं। इसी बातें सुनकर देवकी ने कहा कि 'मेरे घर में जल नहीं था, मैं जल लेने जलाशय पर आई हैं। इसके पश्चात देवकी अपने घर की और चली गई। कंस ने पुनः द्वारपाल से कहा कि इस घर में मेरी बहन की तुम पूर्णतः रक्षा करो। अब कंस को इतना भय लगने लगा कि घर के भीतर दरवाज़ों में विशाल ताने बंद करवा दिए और दरवाजे के बाहर इयों और राक्षसों को पहरेदारी के लिए नियुक्त कर दिया। मंस हर प्रकार से अपने प्राणों को बचाने के प्रयास कर रहा था। एक समय सिंह राशि में सूर्य में आकाश मंडल में जलाधा मंचों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया। भादों मास की कृणपक्ष की अष्टमी तिथि को घनघोर अद्धरात्रि थी। इस समय चंद्रमा भी वृष राशि में था, हिणी नक्षत्र बुधवार के दिन सौभाग्ययोग से संयुक्त चंद्रमा के आधी रात में उदय होने पर आधी रात के उत्तर एक घड़ी ज़ब हो जाए तो अति-स्मृति पुराणोक्त फल निःसंदेह प्राप्त होता हैं।

नारदजी ने पुनः इंट्स से कहा- 'ऐसे 'विजय' नामक शुभ मुहूर्त में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और श्रीकृष्ण के प्रभाव में ही इसी क्षण बन्दीगृह के दरवाजे स्वयं खुल गए। द्वार पर पहरा देने वाले पहरेदार राक्षस सभी मूर्छित हो गए। देवकों ने उसी क्षण अपने पति वसुदेव से कहा-'हे स्वामी! आप निद्रा का त्याग करें और मेरे इस पुत्र को गोकुल में ले जाएँ, वहाँ इस पुत्र को नंद गोप को धर्मपत्नी यशोदा कों में हैं। इस समय यमुनाज़ी पूर्णरूप से बाढ़ग्रस्त , किन्तु जब वसुदेवज़ी बालक कृष्ण को सूप में लेकर यमुनाजी को पार करने के लिए उतरे उसी क्षण बालक के चरणों का स्पर्श होते ही यमुनाज़ी अपने पूर्व स्थिर रूप में आ गईं। किसी प्रकार वसुदेवजी गोकुल पहुंचे और नंद के
घर में प्रवेश कर उन्होंने अपना मुत्र तत्काल हें दे दिया और इसके बदले में उनकी कन्या ले ली। वें तत्काल वहां से वापस आकर कंस के बंदी गृह में पहुंच गए।
प्रातःकाल ज़ब सभी राक्षस पहरेदार निद्रा से जागे तो कंस ने द्वारपाल से पूछा कि अब देवी के गर्भ में क्या हुआ? इस बात का पता लगार मुझे बताओं द्वारपालों ने महाराज की आज्ञा को मानते हुए कारागार में जाकर देखा तो वहाँ देवकी की गोद में एक कन्या थी। जिसे देखकर द्वारपालों ने कंस को सूचित किया, किंतु कंस को तो इस कन्या में भय होने लगा। अतः वह स्वयं कारागार में गया और 5सने देवकी की गोद में कन्या को झपट लिया और उसे क पत्थर की चट्टान पर पटक दिया किन्तु वह कन्या विगु की माया में आकाश की और चली गई और अंतरिक्ष में अहय हो गई।
सर्ने आकाशवाणी कर कंस में कहा कि 'हे दुष्ट! तुझे मारने वाला गोकुल में नंद के घर में 5-पन्न हो चुका है और इसी में तेरी मृत्यु सुनिश्चित है। मेरा नाम तो वैष्णवी हैं, मैं संसार के कर्ता भगवान विष्णु का माया में पन हुई हैं।' इस आकाशवाणी को सुनकर स क्रोधित हो उठा। उसने नंद के घर में पूतना राक्षसी को कुण का वध करने के लिए भेजा किन्तु जब वह राक्षसी कृण को स्तनपान कराने लगी तो कृष्ण ने उसके स्तन से इसके प्राणों कों च लिया और वह राक्षसी कृष्णकृष्ण कहते हुए मृत्यु को प्राप्त हुई।
जब कंस को पूतना की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ तो उसने कृष्ण का वध करने के कई दैयों को भेजा, किन्तु सभी कृष्ण के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुए। इसके पश्चात कंस ने काल्याय नामक दैन्य कों कॉों के रूप में भेजा, किन्तु वह भी कृण के हाथों मारा गया। अपने बलवान राक्षसों की मृत्यु के आघात से कंस अत्यधिक भयभीत हो गया। उसने द्वारपालों को आज्ञा दी कि नंद को तत्काल मेरे समक्ष उपस्थित करो। द्वारपाल नंद को लेकर ज़ब उपस्थित हुए तब कंस ने नंद से कहा कि यदि तुम्हें अपने प्राणों को बचाना है तो पारिजात के पुष्प ले लाभ। यदि तुम नहीं ला पाए तो तुम्हारा वध निश्चित है।
कंस की बातों को सुनकर नंद ने ऐसा ही होगा' कहा और अपने घर की और चले गए। घर आकर उन्होंने संपूर्ण वृत्तांत अपनी पत्नी यशोदा को सुनाया, जिसे श्रीकृष्ण भी सुन रहे थे। एक दिन श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ यमुना नदी के किनारे गेंद चेल रहे थे और अचानक स्वयं ने ही गेंद को यमुना में फेंक दिया। यमुना में गेंद फेंकने का मुख्य उद्देश्य यहीं था कि वे किसी प्रकार पारिजात पुष्पों को ले आएँ। अतः वे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़कर यमुना में कूद पड़े।
यह समाचार 'धर' नामक गोपाल ने यशोदा को सुनाया। यह सुनकर यशोदा भागती हुई यमुना नदी के किनारें आ पहुंची और उसने यमुना नदी की प्रार्थना करते हुए कहा- 'हे यमुना! यदि मैं बालक को देगी तो भाद्रपद मास की रोहिणी युक्त अष्टमी का व्रत अवश्य करेंगी। हज़ारों अश्वमेध यज्ञ, सहस्रों राजसूय यज्ञ, दान तीर्थ और व्रत करने से जो फल प्राप्त होता है, वह सब कृष्णाष्टमी के व्रत को करने से प्राप्त हो जाता है। यह बात नारद ऋषि ने इंद्र से कहीं। इंद्र ने कहा- 'हे मुनियों में श्रेष्ठ नारद! यमुना नदी में कूदने के बाद इस बालपी कृष्ण ने पाताल में ज़ार क्या किया?" नारद ने कहा- 'हे इंद! पाताल में इस बालक से नाराज़ की पत्नी ने कहा कि तुम यहाँ क्या कर रहे हो, कहाँ से आए हों और यहाँ आने का क्या प्रयोजन है।
नागपत्नी बोली- 'हे कृष्ण! क्या तूने चूतड़ा की है, जिसमें अपना समस्त धन हार गया है। यदि यह बात ठीक हैं तो कंकड़, मुकुट और मणियों का हार लेकर अपने घर में चले जाओं क्योंकि इस समय मेरे स्वामी शयन कर रहे हैं। यदि वें गए तो वें तुम्हारा भक्षण कर जाएँगे।' नागपत्नी की बातें सुनकर कृष्ण ने कहा- 'हे काते! मैं किस प्रयोजन से यहाँ आया है, वह वृत्तांत मैं तुम्हें बताता हैं। समझ लो मैं कालिय नाग के मस्तक को कंस के साथ चूत में हार चुका हूं और वहीं लेने में यहाँ आया हूँ।' बालक कृष्ण की इस बात को सुनकर नागपत्नी अत्यंत क्रोधित हो उठीं और अपने सोए हुए पति को उठाते हुए उसने कहा- 'हे स्वामी! आपके घर यह शत्रु आया है। अतः आप इसका हनन कीजिए।' अपनी स्वामिनी की बातों को सुनकर कालिया नाग निन्द्रावस्था से जाग पड़ा और बालक कृष्ण से युद्ध करने लगा। इस युद्ध में कृष्ण को मृE आ गई, इसी मूी को दूर करने के लिए उन्होंने गाका स्मरण किया। स्मरण होते ही गाड़ वहाँ आ गए। श्रीकृष्ण अब गरुड़ पर चढ़कर कालिया नाग में युद्ध करने लगे और उन्होंने कालिय नाग को युद्ध में पराजित कर दिया।

कालिया को यह ज्ञात हो गया की श्रीकृष्ण भगवान विष्णु का ही अवतार हैं। अतः उन्होंने कृष्ण के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और पारिजात से इन्पन्न बहुत से पुष्पों को मुकुट में रखकर कृष्ण को भेंट किया। जब कृष्ण चलने को हुए तब कालिया नाग की पत्नी ने कहा- 'हे स्वामी! मैं कृष्ण को नहीं जान पाई। हे जनाईन मंत्र रहित, क्रिया रहित, भक्तिभाव रहित मेरी रक्षा कीजिए। हे प्रभु! मेरे स्वामी मुझे वापस ३ ।' तब श्रीकृण ने वहा- 'हे सर्पिणी! -यों में जो सबसे बलवान हैं, इस मंस के सामने मैं तेरे पति को ले जाकर छोड़ दूंगा अन्यथा तुम अपने घर को चली जाओ।' भद्म श्रीकृष्ण कालिया नाग के फन पर नृत्य करते हुए यमुना के ऊपर आ गए।
तदनन्तर कालिया की कार से तीनों लोक कम्पायमान हो गए। अब कृष्ण कंस की मथुरा नगरी को चल दिए। वहां कमलपुष्पों को देखकर यमुना के मध्य जलाशय में वह कालिया सर्प भी चला गया।

इधर कंस भी विस्मित हो गया तथा कृष्ण प्रसन्नचित्त होकर गोकुल लौट आए। उनके गोकुल आने पर उनकी माता यशोदा ने विभिन्न प्रकार के उत्सव किए। अब इंद्र ने नारदजी से पूछा- 'हे महामुनें! संसार के प्राणी बालक कृण के आने पर अत्यधैिक आनंदित हुए। आखिर श्रीकृष्ण ने क्या-क्या चरित्र विया? वह सभी आप मुझे बताने की कृपा करें।' नारद ने इंद्र में कहा- 'मन को हरने वाला मथुरा नगर यमुना नदी के दक्षिण भाग में स्थित हैं। वहां कंस का महाबलशानीं भाई चाणूर रहता था। इस चाणूर से आकृण के मलयुद्ध की घोषणा की गई। हे इं! कृण एवं चाणूर का मनयुद्ध अत्यंत आश्चर्यजनक था। चाणूर की अपेक्षा कृष्ण बालरूप में थे। भेरी, शंघ और मृदंग के शब्दों के साथ कंस और केशी इस युद्ध को मथुरा की जनसभा के मध्य में देख रहे थे। रंगशाला में अघाड़े में चाणूर, मुश्कि, शल, तोषन आदि बड़े-बड़े भयंकर पहलवान दंगल के लिए प्रस्तुत । महाराज़ वंस अपने बड़े-बड़े नागरिकों तथा मित्रों के साथ उच्च मञ्च पर विराजमान यह सब दृश्य देब रहा था।

रंगशाला में प्रवेश करते ही आण ने अनायास ही धनुष को अपने बायें हाथ में उठा लिया। पल झपकते ही सबके सामने इसकी डोरी चढ़ा दी तथा डोरी को ऐसे बचा कि वह धनुष भयंकर शब्द करते हुए टूट गया। धनुष की रक्षा
श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण
करने वाले सारे सैनिकों को दोनों भाईयों ने ही मार गिराया। कुवलयापड़ का वध कर श्रीकृष्ण ने इसके दोनों दांतों को बाड़ लिया और उससे महावत एवं भनेक दुष्टों का संहार किया। कुछ सनिक भाग खड़े हुए और महाराज कंस को सारी सूचनाएँ दी, तो कंस ने क्रोध से दांत पीसते हुए चाणूर मुष्ट्रिक को शीघ्र ही दोनों बालकों का वध करने के लिए कहा। इतने में ऑकृण एवं बलदेव अपनें अंगों पर खून के कुछ टे धारण किये हुए हाथी के विशाल दातों को अपने कंधे पर धारण कर मुसकुराते हुए भाड़े के समीप पहुंचे। चाणूर और मुश्कि ने इन दोनों भाईयों को मल्लयुद्ध के लिए ललकारा। नीति विचारक ऑकृष्ण ने अपने समान आयु वाले मलों से लड़ने की बात कही। किंतु चाणूर ने श्रीकृष्ण को और मुष्ट्रिक ने बलराम जी को बड़े पे में, महाराज़ कंस का मनोरंजन करने के लिए ललकारा। श्रीकृष्ण-बलराम तो ऐसा चाहते ही थे। इस प्रकार मनयुद्ध आरम्भ हो गया।

श्रीकृष्ण ने चाणूर और बलरामजी ने मुष्ट्रिक को पाकर उनका वध कर दिया। तदनन्तर कुट, शल, तोषल आदि भी मारे गये। इतने में कंस ने क्रोधित होकर श्रीकृष्ण-बलदेव और नन्द-वसुदेव सबको बंदी बनाने के लिए आदेश दिया। किन्तु, सबके देखते ही देखते बड़े वेग से इनकार कृष्ण इसके मञ्च पर पहुँच गये और उसकी चोटी पकड़कर नीचे गिरा दिया तथा उसकी छाती के ऊपर कूद गये, जिससे इसके प्राण पखेरू उड़ गये। इस प्रकार कंस मारा गया। श्रीकृष्ण ने रंगशाला में अनुचरों के साथ संस का उद्धार दिया। वंस मैं पूजित शंवर जी इस रंग को घर कृत-न्य हों गये। इसलिए उनका नाम आरंभ हुआ। यह स्थान आज़ भी कुण की इस रंगमग्री लीला की पताका फहरा रहा है। श्रीमद्भागवत के अनुसार तथा विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद के विचार से कंस का वध शिवरात्रि के दिन हुआ था। क्योंकि कंस ने भन्नूर को एकादशी की रात अपने घर बुलाया तथा इससे मन्त्रणा की थी।

श्रीकृष्ण ने अपने पैरों को चाणूर के गले में फंसाकर उसका वध कर दिया। चाणूर की मृत्यु के पश्चात 5नका मल्लयुद्ध कंश  के साथ हुआ।

हे इंद! इसी क्षण श्रीकृष्ण ने गरुड, बलराम तथा सुदर्शन चक्र का ध्यान किया, जिसके परिणामस्वरूप बलदेवज़ी सुदर्शन चक्न लेकर गरुड़ पर आरूढ़ होकर आए। उन्हें आता इंघ बालक कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को उनसे लेकर स्वयं गरुड़ की पीठ पर बैठकर न जाने कितने ही राक्षसों और दैत्यों का वध कर दिया, कितनों के शरीर अंग-भंग कर दिए। बलरामजी ने अपने आयुध शस्त्र हल से और कृष्ण ने सुदर्शन चक्र में माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को विशाल न्यों के समूह का सर्वनाश किया।

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत पूजन फल

जों व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को करता है, वह ऐश्वर्य और मुक्ति को प्राप्त करता है। आयु, कीर्ति, यश, लाभ, पुत्र व पौत्र को प्राप्त कर इस जन्म में सभी प्रकार के सुखों को भोग कर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तिभाव से श्रीकृष्ण की कथा को सुनते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। वे उत्तम गति को प्राप्त करते हैं।


श्रीकृष्ण आरती


आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की

श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली;
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक;
ललित छवि श्यामा प्यारी की॥
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥


कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै;
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;
अतुल रति गोप कुमारी की॥
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥


जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा;
बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;
चरन छवि श्रीबनवारी की॥
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥


चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू;
हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद;
टेर सुन दीन भिखारी की॥
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥



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