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गायत्री मंत्र 
Gayatri Mantra 




ओ३म् ॥ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
-यजु० ३६ |

गायत्री मंत्र Gayatri Mantra गायत्री मंत्र अर्थ सहित - 


गायत्री मंत्र
गायत्री मंत्र
  • ओ३म  - सबकी रक्षा करने वाला
  • भूः  -जो सब जगत् के जीवन का आधार, प्राण से भी प्रिय और स्वयंभू है। 
  • र्भुवः -जो सब दुःखों से रहित, जिसके संग से जीव सब दुःखों से छूट जाते हैं।
  • स्वः - जो नानाविध जगत् में व्यापक होके सबका धारण करता है। 
  • सवितुः - जो सब जगत् का उत्पादक और सब ऐश्वर्य का दाता है। 
  • देवस्य - जो सब सुखों का देनेहारा और जिसकी प्राप्ति की कामना सब करते हैं। 
  • वरेण्यम् - जो स्वीकार करने योग्य अतिश्रेष्ठ 
  • भर्गः - शुद्धस्वरूप और पवित्र करने वाला चेतन ब्रह्मस्वरूप है। 
  • तत् - उसी परमात्मा के स्वरूप को हम लोग। 
  • धीमहि - धारण करें। किस प्रयोजन के लिये कि 
  • यः - जो सविता देव परमात्मा 
  • नः - हमारी । 
  • धियः - बुद्धियों को 
  • प्रचोदयात् - प्रेरणा करे अर्थात् बुरे कामों से छुड़ा कर अच्छे कामों में प्रवृत करें। ।







गायत्री मंत्र का अर्थ / भावार्थ 

तूने हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू। 
तुझसे ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता तू॥ 
तेरा महान् तेज है, छाया हुआ सभी स्थान।
सृष्टि की वैस्तु-वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान ॥ 
तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया। 
ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला ॥


विडियो के रूप में देखें - 



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