0
Advertisement

द्रौपदी का आर्तनाद 



हार गए सब दांव जुएं में ,नहीं और कुछ शेष बचा।
शकुनि की चालों ने देखो, नाटक बड़ा विशेष रचा।

और लगाओ दांव युधिष्ठिर, अभी द्रौपदी बाकी है।
दुर्योधन की उन आँखों में कटु क्रूरता झांकी है।

व्यग्र बहुत थे पांडव मन में ,लेकिन क्षत्रियता भारी थी।
शकुनि ने जो पांसे फेंके ,वहीँ द्रौपदी हारी थी।

सभा खचाखच भरी हुई थी,सन्नाटा सब ओर था।
चेहरे मूक आँख थीं गीली ,हृदय कष्ट घनघोर था।

भीष्म, द्रोण ,धृतराष्ट्र ,सबकी नजरें नीचीं थीं।
द्रौपदी का आर्तनाद
पांडव चेहरे क्रोध भरे थे ,और मुठ्ठियाँ भींचीं थीं।

जाओ  दु:शासन जल्दी से ,उस कुलटा को ले आओ।
नग्न करो उस द्रुपदसुता को, मेरी जांघ पर बैठाओ।

निर्मल देह सुकोमल हिरणी ,सौन्दर्यगर्विता नारी थी।
द्रुपद सुता का शील हरण, करने की पूरी तैयारी थी।


गौरवर्ण सुकुमार सी सुन्दर ,कृष्ण की परम सहेली थी।
लेकिन इस द्यूत सभा में ,वह असहाय अकेली थी।

केश पकड़कर दु:शासन  ने, सभा के मध्य घसीटा था।
उस  रजस्वला नारी को ,भरी सभा में पीटा था।


केश राशियाँ बिखर रहीं थी,उस अनिंद्य अभिमान की।
सरे आम इज़्ज़त बिखरी थी ,कुरुवंश की शान की।

कातर दृष्टी से उसने जब अपने पतियों को देखा।
अश्रुपूरित दीन नेत्र थे ,आँखों में चिंता की रेखा।

नहीं मिला जब कोई सहारा आँख बंद उसने कर लीं।
कृष्ण सखा को याद किया ,आँखे आंसू से भर लीं।

कहाँ गए गोकुल के वासी  कहाँ गए राधा के स्वामी।
कहाँ गए हे गोपी वल्लभ कहाँ गए तुम अन्तर्यामी।

हे अर्तिनाषन हे जनार्दन,हे सर्वस्वरूप सुख दाता।
हे व्रजनाथ ,द्वारका वासी ,हे जीवों के जीवनदाता।

संकट बहुत पड़ा है भारी, सब कुछ लुटने की तैयारी।
अब तो आ जाओ कन्हैया ,मेरी सुध ले लो बनवारी।

आर्तनाद तुम सुनो कन्हाई ,  हे सच्चिदानंद तम्हे दुहाई।
तेरे बिना अब कोई नहीं है ,द्रुपद सुता ने टेर लगाई।

एक वस्त्र में अबला नारी ,आर्तनाद करती बेचारी।
पाषाणों की उस दुनिया में ,कृष्ण सखी सब कुछ थी हारी।

भक्त अगर दुःख में होता है, तो भगवान कहाँ सोते हैं।
भक्त के पैरों के छालों को ,अपने अँसुअन से धोते हैं।

वस्त्ररूप ले कृष्ण पधारे ,मुस्काते पीताम्बर धारे।
भक्त की लाज नहीं लुटने दी द्रुपदसुता के कष्ट निवारे।

इक रेशा न उतरा तन से, दु:शासन हारा कुलघालक ।
बेदम होकर गिरा जमीं पर ,जैसे हो छोटा सा बालक।

अपनी सखी की लाज बचाने ,कृष्ण आज खुद चीर बने।
द्रुपद सुता की लाज बचाकर कृष्ण महा रणधीर बने।

अंतर्मन में कृष्ण कन्हैया ,सबकी आँखों के तारे।
अब तो भगवन आन मिलो तुम ,कष्ट हरो मेरे सारे।




- सुशील शर्मा 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top