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हालात ए बेवफा



रिश्तों में दोस्ती के हाल ए सफा पर चुप हूँ !
दोस्ती के बदलते हालात ए बेवफा पर चुप हूँ !

हम तो गमगीन है दोस्ती दौलत है कहीं खो न दूँ ..
उनके भूल जाने के आदत ए हर दफा पर चुप हूँ!

हर वक्त क्यो  ढूँढते है दोस्त दोस्ती में फायदे ..
मैं इनके इल्म के  नुकसान ए नफा पर चुप हूँ!

पैगाम पर पैगाम दिए जाते है हम दोस्ती के लिए ..
मिलते है तो दे जाते है नामुरीद ए तोहफा पर चुप हूँ!

हम एहसासों के दरिया में बहे जाते है इकरार करके ..
उनके बेख्याल दोस्ती के नदाँ ए तुफाँ पर चुप हूँ!


बडे अजीब हो तुम

हमसे बढकर कौन लोगो में कैसा ये खुमार है !
लगता है हर चेहरा इस तोहमत से बीमार है !

बडे अजीब हो तुम जवाब देते क्यों नही ..
कैसे कहे खामोश रहना मेरी आदतो में शुमार है !

हम तो जैसे-तैसे गुजार ही लेते है वक्त जैसे...
कहीं के लिए कसक कहीं के लिए दिलदार है !

मुझसे न कहो यारो इल्म की इनायत भरी बातें..
चल दिया तो जिन्दगी वरना सबके लिए बेकार है !

क्या दिलकशी है तकदीर की उसकी रस्मे-रवाते ..
पल में गुलशन ए बहार और पल में सदियों दीदार है !


हम है खुदा के फरिश्ते

इन्सानों के बीच कैसी ये हवा चली है अब !
हम है खुदा के फरिश्ते कैसी ये धूम मची है अब !

आकर जमानें में क्यों वो अपना दस्तूर भूल गए ..
खौफनाक अंधेरो में कैसी शमां जली है अब !

जो था कर्ज हम पर उनका सब चुक्ता हो गया ..
फिर क्यों उनके आँखों में कैसी नमी है अब !

कारवां पाकर वो भूल गए कभी उनके अपने थे...
रिश्तों में अपने लोगों की कैसी कमी है अब !

कहने को तो सारी दुनिया है रौशन दूआयों से ...
अतीमों के घर में फिर कैसी गमी है अब !



बरसात में कोई खिडकी 

बरसात में कोई खिडकी पर खामोश दिखता है !
जैसे किसी के लिए वो मदहोश दिखता है !

कोई किसी के यादों के दर्द से बचना है मुश्किल ..
बन्द आँखों से भी वो अफसोस दिखता है !

इन्सानियत ही क्या खुदाई भी कयामत निकले ..
फिर भी इश्क में जश्न ए जोश दिखता है !

इन्सानों से अच्छा वो तस्वीर जिन्दा है अबतक ..
पत्थरों से आँख मिलाओ तो आगोश दिखता है !


सागर की लहरों से उँचा

सागर की लहरों से उँचा सर उठाना है तुझें !
मुश्किलों की मुस्कुराती तस्वीर मिटाना है तुझें !

टूटनें को हर पर्वत कयामतों में बिखर जाते हैं,
ठोकरों से कभी सम्हलना और टूटना है तुझें !

ये तो रीत है ख्वाब के बनते-बिगडते राहों से चलना,
कयामतों से पास आए मंजर को अपनाना है तुझें !

जिन्दगी की जागीर इतनी आसानी से नही मिलती,
कामयाबी तो जुआ है नकामयाबी पाना है तुझें !

शोहरतों से अपने मुक्द्दर का दाम न कर की मेरा है,
कुछ हिस्से का गम भी यहां चुकता करना है तुझें !



हर पल दिल में 

तुम्हारे तहरीर के तर्ज पर हमनें अंजाम रख्खा है !
सुबह के किरनों में सतरंगी तेरा नाम रख्खा है !

तन्हा-तन्हा सा यह आलम तेरे यादों का मंजर ..
हर पल दिल में मैंने तेरा इन्तकाम रख्खा है !

जो सच है उसे हम छुपा नही सकते गिरेबां में ...
धडकन से निकले सजदे में तेरा इल्जाम रख्खा है !

एक बार आकर तो देखो मेरे सर्द गलियों में आप..
टूटते आशियानें में मैंने तेरा सुबह-शाम रख्खा है !

जब वो आ जाए तो उनसे कहना ए दरों-दीवारो ..
तेरे लिए भूली यादों का शबाब कहीं जाम रख्खा है !



तकदीर की तरह

ये आंसु क्या हम बातों में बदल जाते है !
इबादत क्या हम इरादों में बदल जाते है !

क्यों चले गए इस जीतने वाले शहर से तुम..
तकदीर की तरह हम हाथो में बदल जाते है !

वो अपील ही क्या जो मुझें बेचैन न कर दे ..
आजमाकर देखना हम वादों में बदल जाते है !

बदलकर अपनी खामोशी तन्हा-तन्हा न रह सकोगे..
हर महफिल को हम रातों में बदल जाते है !

मिलकर तो देखो तेरे यादों को कोई शक्ल देंगे ..
हर मुलाकात को हम ख्वाबों में बदल जाते है !



अपनी बस्ती में

अपनी बस्ती में मेरा घर नही था !
जहां मै गया वहां शहर नही था !

ताउम्र बीत गया फिर भी अंजान है दुनिया से ..
शायद इस जिन्दगी का दस्तूर नही था !

अभी तक जो मिला है शराफत में मुझे ...
अभी तक इरादों में असर नही था !

मुझें इल्म से न देखों करीब था करीब हूं..
इन मासूम आँखों में तेरे नजर नही था !

हमनें ढूँढा तो मिला हर जगह हर गली इन्सान ..
मगर किसी के पास तहरीर ए घर नही था !



अब मेरी जरूरत नही

मेरे हस्ती को झूठा नाम बताता है कोई ..
मेरे नाम के कई सिक्के चलाता है कोई !
राहुलदेव गौतम
राहुलदेव गौतम

वह कहता है तू पल में है पल भर में नही ..
जैसे खिचकर लकीर रेत पर मिटाता है कोई !

हम हारते ही कब रस्म-रिवाजों के दुश्मनों से ..
मेरे खिलाफ अपनों को मोहरा बनाता है कोई !

अब मेरी जरूरत नही उनकी तन्हाईयों में ..
उनके घर के चिरागों को जलाता है कोई !

यह मन्दिर भी मेरा है यह मस्जिद गिरजे-दवार भी ..
इस तरह इन्सानियत पर हक जताता है कोई !



लोग सुना जाते है

अक्सर याद आता है तेरे आँखों का पानी !
जिसमें ढूँबी रहती है मेरी शाम दीवानी !

आज भी हम अपनों में रहकर बेगानों से है..
क्या यही इश्क की सजा सदियों पुरानी !

तेरा होकर भी नही तेरा मैं इल्जाम है मुझपर ..
यही सुनाता-फिरता हूँ मैं अपनी जुबानी !

हम तो कब के इस सियासत के शहर में मर जाते ..
गर जीनें के लिए न होती तेरी अश्क की मेहरबानी !

लोग सुना जाते है अपनें अरमान हमें हरपल..
लोगो को समझ नही आती मेरी अपनी कहानी !


हम आज भी नही थे

तेरी-मेरी हसरतों की अभी रात अधूरी थी !
तेरी-मेरी जज्बातों की अभी बात अधूरी थी !

हम आज भी नही थे और कल भी नही थे तेरे ..
ख्वाहिशो ख्वाबों की अभी बारात अधूरी थी !

कैसे दिखाते अपनें वफाओं का सबूत लोगो को ...
मोहब्बत ए सुरागों की अभी कागजात अधूरी थी !

अब सामने आना इन रिवाजों को पीछे छोडकर..
क्या बताये मेरे रश्मों की अभी वारदात अधूरी थी !

हम भले ही गुमनाम है इन कायनातों की जानीब से...
तुम्हें क्या मेरे कश्मकशों की अभी हालात अधूरी थी !



तेरे तन्हाई के रंज में

तेरे तन्हाई के रंज में हम शाम बनके आयेंगें..
तेरे हरेक दर्द का हम नाम बनके आयेगें !

कैसे दूर रहोगे मेरे मोहब्बत के जूनू से ..
तेरे लफ्जों के घूँट में हम जाम बनके आयेगें !

जब करोगे तुम किसी पर उम्मींद अपने लिए ...
लोगों के होठों पर हम शरेआम बनके आयेगें !

कभी देखोगे किसी एक को उदास दुनिया में ..
तेरे खामोश आँखों में हम अंजाम बनके आयेगें !



जरा देर लगेगी

जरा देर लगेगी तेरे गलियों में घर बनाना !
बुनियाद है सर्द सदियों को बनाना !

तुम लाख छूपा लो अपनी हकीकत बद्नसीब ..
मुश्किल भी नही इस सच को पहचानना !

सुनकर देखे दुनिया का हरम क्या मर्ज क्या ..
कुछ ग़लत भी नही ग़लत को सुनना-सुनाना !

वो रंज है तेरे ईमान को लोग गुनाह मान बैठे..
क्या-क्या नही झेले है सुनकर तेरा फसाना !

जो अपनें इल्जामों को शरे बाजार कर दे ..
कुछ ठीक तो नही ऐसे लोगों को मनाना !



मेरी भी जिद है

तेरी उल्फत को समझनें में जमाना लग गया !
क्या करे हर जगह मेरा आना-जाना लग गया !

ये तो जिन्दगी की रस्म है जो सबको निभाना है,
मुझ पर भी मोहब्बत का जुर्माना लग गया !

जैसे हकीकत को देखकर शक्स चुप है शहर में ,
मुझे भी एक बूरी आदत ए शरमाना लग गया !

तुम मोहब्बत की जुस्तुजू में कहां से कहां आ गए ,
किसी को हाशिल करने में वक्त माना लग गया !

मेरी भी जिद है उसकी भी जिद है मयखाने में ,
बातों ही बातों में जामों से आजमाना लग गया !



हमारे जिन्दगी के हिस्से होते है

सबक पाके भी कुछ लोग बच्चे होते है !
वो रिश्ता ही क्या जो कच्चे होते है !

मैंने जिनको भी आजतक अपनें खिलाफ देखा,
असल में वही हमारे लिए सच्चे होते है !

मैंने जितना ही भागा है जिस वक्त से,
वही हमारे जिन्दगी के हिस्से होते है !

दूर रहकर भी जो हमारे कमियों को ढूँढ लें,
वो शक्स ही हमारे दिल के अच्छे होते है !

रिश्तों का अब तो लगता है बाजार हमदम ,
लहू के रिश्ते भी आजकल सस्ते होते है !



हम आज भी कह ना सके

ना जाने क्या है उनके दिल की आरजू..
फिर भी कहे जा रहे है जमानें की गुप्तगू !

वो आज भी मिलते है तो कह जाते है अफसानें..
हम आज भी कह ना सके अपनें दिल की जुस्तजू !

कहां गए कहां खो गए दुनिया के महफिल में वो..
दोस्त वादा करके हो ना सके मुझसे कभी रूबरू !

मेरी तबीयत अब गवाही नही देते की सजदे करे..
उनके चोट के दांस्ताँ ए दिल मेरे जिगर के बालहू !

हम चाहते तो कह देते जमानें से उनकी हकीकत..
मेरे जुबां की खामोशी है उनकी मोहब्बत की आबरू !



हमे लूटनें का गम नही

डूबकर बच गए हम कस्तियाँ है तेरी आँखों में !
आज भी समंदर की आँधियां है तेरी आँखों में !

हमे लूटनें का गम नही इस शहर में अब ..
बस जायेगें एक रोज बस्तियाँ है तेरी आँखों में !

तुम हमें खत लिखना नही बस रूबरू हो जाना..
हम पढ लेगें हर बात चिट्टीयाँ है तेरी आँखों में !

जिन्दगी में कितनी इनायत भरी है रंज ए वफा ..
कभी गम कभी खुशियों की मस्तियाँ है तेरी आँखों में !

चाहकर बच नही पाते यादों के मौजों में हम..
कितने बहते अल्फाज ए दरिया है तेरी आँखों में !



हम किससे कहे

अल्फाज ए रंग का असलियत दिखाई देती है ..
जिसमें तेरी आँखों की मासूमियत दिखाई देती है !

जब भी महसूस करता हूँ तेरे गम के सन्नाटे..
मुझे दुनिया की झूठी बहसियत दिखाई देती है !

हम किससे कहे तेरे हालात ए बयां अजनबी ..
हमें हुक्मरानों की नदाँ ए नियत दिखाई देती है !

आज भी बेचैन कर देती है उस शक्स की यादें ..
मुझे उसकी दुश्मनी में इन्सानियत दिखाई देती है !

मैंने उस पल को अपनें जिस्म में छुपा लिया ...
जिसमें बेरूख जिन्दगी की जहुन्नियत दिखाई देती है !



जाने कितने नजरानें

वो अपने अफसानें सुनाकर हँस दिए !
जाने कितने नजरानें सुनाकर हँस दिए !

हमें उनके हालात पर खामोशी आ गई ,
वो हमें अनजानें बनाकर हँस दिए !

मैंने पुछा क्या है आपकी बेबसी का सबब ,
वो हमें जमानें दिखाकर हँस दिए !

हमें क्या मालूम कितनें किस्से है दुनिया के ,
वो हमें तरानें सुनाकर हँस दिए !

हमनें चाहा वो अपना हकीकत बता दें,
वो हमें बहानें बताकर हँस दिए !



ये कैसी मोहब्बत है
हम तो निकले है बेगुनाहों की ख़बर बनकर ..
जिधर भी जायेगें सुबहों की ख़बर बनकर !

धुन्ध हो रास्तों की चमक हर मुसाफिर से ..
हम तो निकले है राहों की ख़बर बनकर !

ये कैसी मोहब्बत है जो तुम जुदा हो गए ..
कितने कमजोर है तेरी बाहों की ख़बर बनकर !

हमारी भूल थी की तुम्हारा आसरा मिला मुझे..
फिर भी निकले है हम पनाहों ख़बर बनकर !

अब यह रंज रहेगा हम किसी के ना हुए..
हम मशहूर है तेरी निगाहों की ख़बर बनकर !



मोहब्बत के रास्तों में

तुम्हारे गुनाहों का सबूत आयेगें जरूर !
तो हम भी कटघरे में जायेगें जरूर !

अब सजा ए उम्रकैद हो या मौत का फरमान,
फिर भी इश्क की परम्परा निभायेगें जरूर !

मोहब्बत के रास्तों में जितना ही सम्हलकर चलो,
हरहाल में इन्सान को आजमायेगें जरूर !

हम-तुम रहे या ना रहे इस जहाँ में ,
लेकिन वक्त अफसानें सुनायेगें जरूर !



हर गली में खामोश

कारवां के राहों में आमिर बदलते देखा है ..
कैसे यकीन में हमनें ताबीर बदलते देखा है !

यों जो मोहबब्त का गुमान है तुझे मेरे अपने है ..
सदियों से तेरे घर की जागीर बदलते देखा है !

बदनाम ही सही कुछ तो हसरत है मेरी भी ..
वक्त के हमसफर में काफीर बदलते देखा है !

जिस गम के राहों में तुम अकेले चलो हो ..
उन राहों पर हमनें मुसाफिर बदलते देखा है !

बस फन की इबादत रह जाती है फनकार की ..
हर गली में खामोश तमाशगीर बदलते देखा है !



दर्द कुछ ऐसा है

यह इल्म है ऐसा की बता भी ना सके!
दर्द कुछ ऐसा है की जता भी ना सके !

हर रोज की दुनिया कुछ अजीब सी है ,
किसी एक को दोस्त बना भी ना सके !

मेरे गम के मोतियों में चमकते है तेरी तस्वीर,
फिर भी हाथों से हर मोती उठा भी ना सके !

रूखसत तो होते हो बार-बार मुझसे तुम,
लेकिन इन आँखों में तुम्हे बसा भी ना सके !

तेरी सासों की तपीस में हम जलते रहे ,
फिर भी घर का चिराग जला भी न सके !



दुनिया की इबादत में

दुनिया की इबादत में जुर्माना तो है ..
मगर जीने में यह जगह मस्ताना तो है !

हम-तुम भले ही अनजान है एक-दूसरे से..
फिर भी हमारी नजरों में दोस्ताना तो है !

हम भले ही अकेले है इस गम के शहर में..
ये क्या कम है तेरे इश्क का नजराना तो है !

जब तन्हाई से दिलभर जाए तेरा तो कहना..
तुझे अपनों से सजाने मेरा घराना तो है !

कभी मेरा वक्त होगा तुम भी और यह उम्र भी..
वरना तेरे ख्वाबों में मेरा आना रोजाना तो है !



एक जिन्दगी को जीना

ना चाहते हुए तेरे घर से गुजरना हो गया,
फिर भी लडखडाते हुए सम्हलना हो गया !

तुम्हें देखकर बस यही ख्याल आता है ..
अपनी किस्मत को हर हाल में बदलना हो गया !

रंज क्या करे दुनिया भर के कवायद पर ..
यहाँ तुफानों को भी बेचना खरीदना हो गया !

कितनी सजा है एक जिन्दगी को जीना ..
हर मुस्कुराहट से आजकल थरथराना हो गया !

मकान की तरह बन्द है मुकद्दर का दरवाजा..
जिद बच्चे की तरह मेरा खटखटाना हो गया !




यह रचना राहुलदेव गौतम जी द्वारा लिखी गयी है .आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है . आपकी "जलती हुई धूप" नामक काव्य -संग्रह प्रकाशित हो चुका  है .
संपर्क सूत्र - राहुल देव गौतम ,पोस्ट - भीमापर,जिला - गाज़ीपुर,उत्तर प्रदेश, पिन- २३३३०७
मोबाइल - ०८७९५०१०६५४

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