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बैठी थी ओस


ओस बैठी थी
गेहूँ की बालियों पर
पत्तियों पर
ड़ालियों पर
ओस
ओस
दौड़ती मस्तमौला सी
करती क्रीडा़एँ
बच्चों सी।
खुश थी
ओस
मगन सुबह-शाम
किंतु रवि गुस्साया
जला देता
उन्हें
गहन जख्म उड़ेलकर।
ओस रोती बिलखती  सी
दूर चली जाती
न जाने कहाँ?
किस ओर?



- अशोक बाबू माहौर 
मो - 8802706980

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