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त्याग का सुख
Tyag Ka Sukh

त्याग का सुख Tyag Ka Sukh - आज के युग में चोरी ,डकैती और छीना - झपटी का बोलबाला है .बिना परिश्रम के ही लोग धनवान हो जाना चाहते हैं .हमारे देश में ऐसी भी महान त्यागी हुए ,जिन्होंने त्याग का इतिहास प्रस्तुत किया हैं  और आज कुछ लोग इस प्रकार के होते हैं ,जो सर्वथा निर्लोभी और निस्पृह होते हैं . 

 श्रीराम
 श्रीराम 
प्राचीन काल की बात है ,अयोध्या के राजकुमार श्रीराम अपने पिता की आज्ञा से अवध का राज्य छोड़कर वन में चले गए .उनके सौतेले भाई भरत ने भी राजा बनने से इनकार कर दिया कि राज्य पर अधिकार बड़े भाई श्री राम का ही है .बहुत समझाने - बुझाने पर वे धरोहर के रूप में राज सँभालने के लिए तैयार हुए किन्तु राज सिंहासन पर बड़े भाई की चरण - पादुका रखने की शर्त राखी .इतना ही नहीं ,माताओं का त्याग इसे भी बढ़कर है . 

राम और सीता के साथ छोटे भाई लक्षमन भी उनकी सेवा करने के लिए वन में गए .वे श्रीराम की छोटी माता सुमित्रा के पुत्र थे .वन में राम की पत्नी सीता को रावन छल से हर ले गया .सीता को खोजते हुए राम और लक्षमन हनुमान जी जी वानर सेना के साथ लंका पहुँच गए और लंका पर चढ़ाई कर दी .युद्ध में लक्ष्मण अमोघ शक्ति से मूर्क्षित हो गए .उनके प्राण बचाने के लिए हिमालय पर द्रोनाचल पर्वत पर गए .रात में पूरा पहाड़ बूटी से जगमगा रहा था .अतः उन्होंने एक शिखर ही उखाड़ लिया और वायुमार्ग से लंका के लिए चल पड़े. 

रास्ते में अयोध्या पड़ती थी पर्वत लेकर जाते हुए उन्हें देखकर भरत को शंका हुई कि कोई उपद्रवी राक्षस पहाड़ लिए जा रहा है .उन्होंने एक वाण से पर्वत सहित हनुमान जी को नीचे गिरा दिया .नीचे गिरते ही हनुमान राम - राम पुकार उठे .पुकार सुनकर भरतजी वहाँ पहुंचे .हनुमान ने सारा वृत्तांत उन्हें बताया कि किस प्रकार लक्ष्मन मूर्क्षित हुए और उनके प्राण बचाने के लिए वे संजीवनी बूटी लेकर जा रहे हैं . 

यह खबर रनिवास में भी पहुँची और श्रीराम की माता कौशल्या तथा लक्ष्मन की माता सुमित्रा भी वहाँ आ पहुँची .सुमित्रा बड़े भाई की सेवा में अपने बेटे के बलिदान की बात सुनकर खुश हुई और अपने दूसरे पुत्र शत्रुघ्न को भी राम की सेवा में जाने का आदेश दिया .इतने में कौशल्या बोल उठी - " हनुमान ! राम से कहना कि वह लक्ष्मण को साथ लेकर ही अयोध्या लौटे ,अन्यथा आने की जरुरत नहीं हैं . 

यह है भारत के राजकुमारों और राजमातों के त्याग की गौरवगाथा ,जिसे सुनकर मस्तक गर्व से ऊँचा उठ जाता है .इससे यह सीख मिलती हैं कि त्याग और बलिदान में जो सुख हैं ,वह लिप्सा और संचय में कहाँ ?


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