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मंकी  कैप 


भारत में मंकी  कैप बहुत ही लोकप्रिय है । यह एक प्रकार की टोपी है जिससे सिर से लेकर गर्दन तक ढका जा सकता है । ठंड में वृ्द्ध व्यक्ति इसे पहनते हैं । इस प्रकार की टोपी को मंकी कैप क्यों कहते हैं यह कहना मुश्किल है । या तो पहले बंदर इस तरह की टोपी पहनते थे या फिर इसे पहनने के बाद आदमी बंदर जैसा लगता
मंकी  कैप
मंकी  कैप 
है । मेरे एक दोस्त ने कहा कि इसे मंकी कैप न कह कर गोरिल्ला कैप कहना चाहिए । क्योंकि इस तरह की टोपी पहनने के बाद इंसान बंदर जैसा न दिखकर गोरिल्ला जैसा नजर आता है । खास कर मोटे लोग इसे पहनने के बाद किंगकांग की तरह लगते हैं ।
सवाल - इस तरह का खराब दिखने वाला टोपी इंसान क्यों पहनता है ?
इस प्रकार की टोपी पहनने वाले लोग बताते हैं, यह टोपी पहन कर फायदा हुआ है...यह कान और गले को ढक कर रखता है इसीलिए कान में ठंडी हवाओं का प्रवेश नहीं होता । गर्दन भी सुरक्षित रहता है । जिन्हें ज्यादा सर्दी लगती है उनके लिए यह बहुत फायदेमंद है । 
 ठंड शुरू होते ही मेरे पूजनीय ससुर इसे पहनते हैं । ठंड के दिनों में हमेशा ठंड लगती है । इसीलिए वह हमेशा टोपी पहने रहते हैं । उनकी टोपी का रंग भूरा है । इस विषय में मैंने अपनी पत्नी से कई बार बातचीत की है : तुम्हारे पिताजी क्यों दिनरात मंकी कैप पहनकर घूमते रहते हैं ? वह क्या अच्छा दिखता है ? उसे पहनकर तुम्हारे पिता टोपी का नाम सार्थक कर रहे हैं । मेरी पत्नी ने मुझे बारबार कहा है कि जो पूजनीय हैं उनका मजाक नहीं उड़ाना चाहिए । यह सब करना तुम्हें शोभा नहीं देता । अखबार में कुछ साल काम करने के बाद तुम्हारी आदत खराब हो गई है । सभी पूजनीय व्यक्तियों का मजाक उड़ाना मीडियावालों का पेशा है । तुम ओबामा का मजाक उड़ाते हो । मनमोहन सिंह की खिल्ली उड़ाते हो । ममता दिदी भी परिहास का शिकार बनती है । मायावती देवी की भी मूर्तियों को लेकर उपहास करते हो । यह सब अच्छी बात नहीं । 
मैंने कहा देखो मैं उपहास नहीं कर रहा । लेकिन क्या मंकी कैप हमेशा पहने रहने वाली वस्तु है ? यह टोपी पहनने के बाद बाल, कान, गर्दन सब ढक जाता है । इंसान अजीब  दिखता है । 
-इंसान अजीब दिखता है ! मतलब मेरे पिताजी अजीब हैं ? तुमने मेरे पिताजी के बारे में इतनी बड़ी बात कही । मेरे पिताजी मंकी कैप पहन कर मंकी जैसे लग रहे हैं इसका मतलब है मैं बंदर की बेटी बंदरिया हूं ?
-अरे इतनी छोटी सी बात को राई का पहाड़ क्यों बना रही हो ? मैंने कुछ सोच कर नहीं कहा था ।
-सोच कर नहीं कहा । क्या मैं तुम्हें नहीं पहचानती ! मजाक करते करते बहुत बड़ी बात कह देते हो तुम । ठीक है मैं बंदरिया हूं । जाओ कौन सी अप्सरा के पास जाना चाहते हो जाओ । आज से मेरे साथ तुम्हारी बातचीत बंद । 
यह पत्नियां किसी भी बात को किस तरफ मोड़ लेंगी  यह कहना मुश्किल है और मेरी पत्नी को इसमें महारत हासिल है । हालत एेसी हुई कि...छोड़िए घर की बात है ।
इस घटना के पंद्रह सालों बाद ।
ठंड के कारण मेरे गले और गर्दन में दर्द हो रहा था । नाक भी बहने लगा । डाक्टर के पास गया । उन्होंने मेरी नस, आंख, जीभ और मुंह देख कर कईं टेस्ट किए । उसके बाद कहा-आप एक काम कीजिए...
-क्या ?
-मंकी कैप पहनिए । रात को भी मंकी कैप पहन कर सोइये  । 
-मंकी कैप ?
-हां । मंकी कैप । देखिए दस तरह की दवाइयां लेने से अच्छा है मंकी कैप पहने रहना । आजकल मैं  दिनरात मंकी कैप पहनता हूं और मेरा 18साल का बेटा मेरा मजाक उड़ाता है । कहता है- पिताजी बूढ़े हो गए । हमेशा मंकी कैप पहने रहते हैं । अजीब दिखता हैं वह । 

- मृणाल चटर्जी
अनुवाद- इतिश्री सिंह राठौर



मृणाल चटर्जी ओडिशा के जानेमाने लेखक और प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं । मृणाल ने अपने स्तम्भ 'जगते थिबा जेते दिन' ( संसार में रहने तक) से ओड़िया व्यंग्य लेखन क्षेत्र को एक मोड़ दिया । इनका एक नाटक संकलन प्रकाशित होने वाला है। 

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