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फुसफ़ुसाहट 



बहुत कुछ है इस अंतर्मन में
पर ना जाने क्यों?
राजीव डोगरा
राजीव डोगरा
कुछ भी कहा नहीं जाता।
सोचती हूँ लिख डालू
कागज़ के पन्नों पर,
पर न जाने क्यों?
कुछ भी लिखा नहीं जाता।
न जाने अन्तर्मन में,
एक प्रश्न चिन्ह्र सा गूँजता है।
बदलती हुई तेरी सोच,
न जाने बदलाव लाएगी
या फिर एक अलगाव
पर न जाने क्यों?
कुछ भी समझ सा नहीँ आता।
रोज़ मरते हुए
लोगों के ज़मीर को देखती हूँ।
किसी मासूम की
दर्द से तड़पती रूह दिखती हूँ।
पर न जाने क्यों?
कुछ भी कहाँ नहीं जाता।
फुसफ़ुसाहट सी होती है,
हर घड़ी, हर क्षण
अन्तर्मन के भीतर
पर न जाने क्यों?
कुछ भी कहा नहीँ जाता।
कब तक अन्तर्मन की
इस फुसफ़ुसाहट को
दबा के यूँ ही रखूं
पर न जाने क्यों?
कुछ भी समझ सा नहीँ जाता।


              

-राजीव डोगरा
               मोबाइल 9876777233
        ईमेल rajivdogra1@gmail.com

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