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चालाक नाई


बहुत पुरानी बात है .किसी रियासत में एक राजा ,राज करते थे . उनमें अनेक सनक थी .जिस समय राजा को हजामत बनवानी होती उस दिन सुबह सुबह नगर के ५- १० नाई अपने औजारों के साथ महल में उपस्थित होते .जब राजा हजामत बनवाने आते .तब उनके साथ महामंत्री ,सेनापति और कुछ सैनिक भी रहते .पलटन को देखकर बेचारे नाइयों को तो वैसे ही पसीना छूटता था क्योंकि थोड़ी गलती हुई नहीं कि कोड़े पड़ने शुरू .

चालाक नाई
चालाक नाई
राजा भी कम न थे ,न जाने उन्हें क्या मज़ा आता कि एक नाई से सामने के बाल तो दूसरे से बाएँ के ,तीसरे से दाएँ के बाल कटवाते थे ,परन्तु चौथे से पीछे के बाल कटवाते तो उस बेचारे नाई की शामत आ जाती .एक बार एक नाई नया नया ही उनके राज्य में आया था .उसे राजा की हजामत के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी .संयोग से राजा ने उसे पीछे के बाल कटवाने को कहा .नया नाई बड़ी उलझन में पड़ गया .उसने बड़ी हिम्मत करके नम्रता के साथ कहा - महाराज ! मुझे आपके सर के पीछे के बाल काटने हैं तो जरा ...!
"जरा क्या ?"
"थोड़ा हुजुर क्या ."
"अब हुजुर क्या ?"
"थोड़ा हुजुर ...सर झुकाइएगा न "
"क्या कहा ? राजा ने लाल - लाल आँखें दिखाते हुए कहा - "मेरा सर और उस पर तेरा अधिकार ?
बेवकूफ राजा तू है कि मैं ? एक तरफ तो तू मुझे महाराज कहता है और दूसरी तरफ सर झुकाने के लिए भी कहता है ?
सेनापति ,इस बदतमीज़ को २५ कोड़े मारे जायेंगे ."
नाई २५ कोड़े की मार के डर से भाग खड़ा हुआ .आगे - गाए नाई ,उसके पीछे राजा ,राजा के पीछे महामंत्री ,महामंत्री के पीछे सैनिक .नगरवासी यह अनोखा नज़ारा देखकर हंसने लगे .किसी तरह नाई को पकड़ा गया .उसने राजा के बाल बनाये .उसके बाद राजा ने बड़े प्रेम से उसे २५ कोड़े लगाने के एक सैनिक से कहा .२५ कोड़े की मार के बाद वह नाई कराहते हुए जोर - जोर से रोने लगा . राजा भी आश्चर्यचकित होकर नाई से बोले - आज तक कोई भी नाई २५ कोड़े की सजा के बाद नहीं रोया ,जितना तू चिल्ला रहा है ."
"महाराज ,आपने तो इस सैनिक  को हल्के से कोड़े मारने के लिए कहा था लेकिन यह तो जोर - जोर से कोड़े मारकर अपनी जाती -दुश्मनी निकाल रहा है ."
"कैसी जाती दुश्मनी ?"
"महाराज कुछ दिन पहले इस बकरी मेरे बाड़े की सारी सब्जी खा गयी थी .मैंने इसकी बकरी की पिटाई की और आज यह उसका बदला इस तरह निकाल रहा है . "
"सेनापति ,इस सैनिक को सैनिक विधि के अनुसार जो दंड दे सको दे दो .अगर नाइयों को इस तरह पीटा जाएगा तो कल तो मेरे राज्य में कोई भी नहीं रहेगा .महामंत्री ,नाई को ५ रजतमुद्राएँ और १ स्वर्ण मुद्रा दी जाए . 
जो आज्ञा महाराज ! महामंत्री ने कहा . 
"महाराज ,मेरी समझ में नहीं आता कि सजा के साथ यह ईनाम कैसा ?"
राजा बोले - "तू मेरे राज्य में नया -नया आया है .तूने अपने राजा का सर झुकाया ,इसीलिए तुझे इसकी सजा तो मिलनी ही चाहिए .यह सजा तो यहाँ हमेशा दी जाती है .मूर्ख ,मैं नहीं जानता था कि इतने कोड़े खाने के बाद कुछ दिन तू काम करने योग्य न रहेगा .मैं तेरा राजा हूँ .प्रजापालक हूँ .मैं जब सजा दे सकता हूँ तो ईनाम भी दे सकता हूँ फिर मेरे कारण तेरे बाल -बच्चे क्यों भूखें मरे ?" इसीलिए आर्थिक सहायता कि रूप में तुझे ईनाम भी दिया जा रहा है .सैनिकों ,इसे उठाकर राजकीय दवाखाने ले जाओ ."
और इस तरह उस चतुर नाई को सजा के साथ - साथ ईनाम भी मिल गया . 

कहानी से शिक्षा - 
  • अपनी बुद्धि का सदुपयोग करना चाहिए।  
  • राजा को प्रजापालक होना चाहिए।  

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