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भलाई का पाठ 
Bhalai Ka Paath


भलाई का पाठ Bhalai Ka Paath - एक तालाब में एक कछुआ रहता था .वह तालाब में रह रहे अन्य जीव - जंतुओं को बुराई का पाठ पढ़ाता था .वह कहता था ,"झूठ बोला करो ,चोरी किया करो और किसी का सहयोग न किया करो ." एक दिन एक मछली  ने कछुए से कहा ," अबी अभी मैंने एक आदमी के मुँह से यह कहते सुना है कि यहाँ से एक किलोमीटर की दूरी पर एक नदी बनी है और उसमें खूब पानी बह रहा है ."

यह जानकार कछुआ बड़ा खुश हुआ .सोचा ,"क्यों न अब मैं उस नदी में जाकर मज़े से रहूँ .इस छोटे से तालाब का क्या भरोसा कब सूख जाए ."

दूसरे दिन कछुआ अपना कुछ खाने पीने का सामान लेकर मछली की बताई हुई जगह की ओर चल पड़ा. 

काफी दूर जाने उसे तालाब का ही एक मेढ़क मिला .उसका साथ पाकर कछुआ और जल्दी - जल्दी चलने लगा . 
कछुआ
कछुआ
रास्ते में मौका पाकर मेढ़क ने कछुए के खाने - पीने के सामान को चुराकर खा डाला. जब कछुए को भूख लगी तो उसने सामान को चुराकर खा डाला .जब कछुए को भूख लगी तो उसने सामान को उतारने के लिए अपना हाथ ऊपर की तरफ बढ़ाया लेकिन उसे सामान न मिला . 

इस पर हैरानी से उसने अपनी पीठ की तरफ देखा .सामान गायब था .उसने सामान के बारे में मेढ़क से जानना चाहा तो उसने कहा ," मै आपके सामान के बारे में कुछ नहीं जानता . "

इस पर कछुए ने गुस्साते हुए कहा ,"तुम झूठ बोलते हो ."

आपने ही तो कहा था कि झूठ बोला करो .मेढ़क बोला . 

इस पर कछुआ बोला , "अच्छा अब सच बताओ और बोलो कि मेरे सामान का क्या हुआ ?

मेढ़क ने जबाब दिया ," मैंने उसे चुराकर खा डाला ."

कछुआ और गुस्सा हो गया ,"तुमने ऐसा क्यों किया ?"उसने पूछा . "आपने ही तो कहा था ,"चोरी किया करो ."मेढ़क ने भोलेपन से जबाब दिया . 

कछुआ सिर पीटकर रह गया .वह अपने ही पढ़ाये हुए पाठ में फँस गया .भूख के मारे उसका बुरा हाल था .कुछ देर के बाद वह मेढ़क से बोला ,"मेरा एक सहयोग कर दो .कहीं से जाकर मुझे कुछ खाने के लिए ले आओ ?
मेढ़क बोला ,"नहीं ,मैं आपका सहयोग नहीं करूँगा ."
कछुए ने हैरानी से पूछा - क्यों ? सहयोग क्यों नहीं करोगे ? मेढ़क बोला ," यह भी बताना पड़ेगा ?अरे आपने ही कहा था कि किसी का सहयोग न किया करो फिर भी आप बार - बार पूछते हैं हबकी मैंने कोई भी कार्य करता हूँ ,आपके कहें अनुसार ही करता हूँ . 

मेढ़क रूठकर बोला ," न जाने कैसे गुरु हैं आप जो अपने विचारों को उलटते - पलटते रहते हैं .जाइए ,नहीं रहना है मुझे आपके साथ . कहते हुए मेढ़क उसको अकेला छोड़कर दूसरी तरफ चला गया . 

कछुआ विचित्र मुसीबत में फँस गया .रेंगते - रेंगते जब किसी तरह मछली के बताये हुए स्थान की तरफ बढ़ा तो देखा ,वहाँ नदी नहीं पहाड़ है . उसे समझते देर न लगी कि मछली ने भी उससे झूठ बोला है लेकिन इसमें उस बेचारी का क्या दोष है ? यह तो उसने पढाया था कि झूठ बोला करो . यह उसके पढ़ाये हुए बुराई के पाठों का परिणाम है .
अंत में कछुए की आँखों से आँसू बहने लगे . वह अपनी करनी पर रोने लगा . उसे महसूस हुआ कि भूख और प्यास के कारण अब वह तड़प - तड़प के मर जाएगा तो उसने सच्चे दिल से ईश्वर को पुकारा और कहा , " हे ईश्वर मुझे क्षमा कर दो ? अब मैं बुराई का पाठ न पढ़ाकर अच्छाई का पाठ पढ़ाऊँगा .कृपा करके आप मेरे प्राण बचा लीजिये . ?
उसके इतना कहते ही ईश्वर एक बालक का रूप धारण कर उसे उठाकर फिर उसी तालाब में छोड़ आये .अब वह सभी को भलाई का पाठ पढ़ाता था . 

कहानी से शिक्षा - 
  • सभी को भलाई का पाठ पढ़ाना चाहिए . 
  • बुरे काम का बुरा परिणाम होता है . 


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