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 टिप-टिप बरसा पानी  वाली लड़की 


                            


               " टिप -टिप बरसा पानी 
                  पानी ने आग लगाई 
                  आग लगी दिल में तो 
                  दिल को तेरी याद आई ... " 

जितनी बार मैं इस गीत को बजते हुए सुनता हूँ , मेरी स्मृति में भी एक लड़की चहलक़दमी करने लगती है । बरसों पहले 1994 में भी यही होता था । आज 2018 में भी यही होता है । लेकिन मेरे ज़हन में मौजूद अपनी छवि में सुरक्षित वह लड़की समय के अथाह समुद्र में तैरती-उतराती रहती है । उस छवि में वह अठारह-उन्नीस साल की पतली , लम्बी , सलोनी लड़की है जिसके बालों की पोनी-टेऽल आकर्षक अंदाज में इधर-उधर थिरकती रहती है । मेरी स्मृति में वह आज भी अठारह-उन्नीस साल की चिर-युवा ही है । 

               मैं आज तक यह नहीं समझ पाया कि कि यह गीत ' टिप-टिप बरसा पानी ... ' मुझे उस 1994/2018 वाली लड़की की याद क्यों दिलाता है । उसका ' मोहरा ' फ़िल्म से कुछ लेना-देना नहीं । न ही उसका रवीना
 टिप-टिप बरसा पानी  वाली लड़की
 टिप-टिप बरसा पानी  वाली लड़की 
टंडन से कोई साम्य है । ऐसा नहीं है कि मैंने कभी हकीकत में उस लड़की को रिम-झिम फुहारों के बीच भीगे वस्त्रों में देखा हो । उस ' टिप-टिप बरसा पानी ' वाली लड़की ने मेरे स्मृति के जल में न जाने कौन से पत्थर फेंके होंगे जिनकी गुड़ुप् से पैदा हुई तरंगें वहाँ आज भी जीवंत हैं । अक्सर मैं 1994/2018 वाली यानी ' टिप-टिप बरसा पानी ' वाली लड़की को अपनी स्मृति के जल में पीली बिकनी पहन कर तैराकी करते हुए देखता हूँ , और मुझे लगता है जैसे मैं साहिल पर खड़ा-खड़ा ही उसके ख़्यालों के जल में डूब रहा हूँ । जब वह किनारे पर आती है तो मैं उसे ' हलो '  कहता हूँ । जवाब में वह भी मुझे ' हलो ' कहती है , और मेरे भीतर-बाहर सूर्योदय हो जाता है । रंग-बिरंगी तितलियाँ फ़िज़ा में तैरने लगती हैं । फूलों पर मँडराते हुए भँवरे मधुर गीत गुनगुनाने लगते हैं । एक सलोना इंद्रधनुष मेरे मन के आकाश में उग आता है , और मैं ओस-भरी मख़मली घास पर नंगे पैर चलने के गुदगुदाते सुखद अहसास से भर जाता हूँ ।

               " मैं आप को रोज़ तैरते हुए देखता हूँ । आप अच्छी तैराक हैं । " मेरे मन में कोई चीज़ छलाँगें मार रही है । 

               " जी , मुझे तैरना पसंद है । " अब 2018 में वह मुस्करा कर मुझसे कहती है , हालाँकि 1994 में वह मुझे अनदेखा करके आगे बढ़  जाती थी । 

               वह जब शावर ले कर फ़्रेश होने के बाद चेंजिंग-रूम से बाहर आती है तो मैं उसे तरण-ताल के बग़ल में स्थित कैफ़े में साथ कॉफ़ी पीने का आमंत्रण देता हूँ , जिसे वह सहर्ष स्वीकार कर लेती है । आज 2018 में भी वह उतनी ही सलोनी है जितनी वह बरसों पहले 1994 में थी , और मुस्कुराने पर अब भी उसके गालों में डिम्पल पड़ते हैं । 

               " आप अब भी बरसों पहले जैसी लगती हैं , " मैं कहता हूँ । जवाब में वह खिलखिला उठती है । मुझे जैसे पंख लग जाते हैं , और मैं मानो पूर्णिमा की चाँदनी रात में बादलों में तैरने लगता हूँ । मुझे उसकी खिलखिलाहट में से भी ' टिप-टिप बरसा पानी ... ' की मादक धुन आती सुनाई देती है । 

               " कॉफ़ी के लिए शुक्रिया , " वह एक लुभावनी अदा के साथ कहती है और मैं बिन पिए ही ज़मीन से डेढ़ इंच ऊपर उठ जाता हूँ ... 

               
                यदा-कदा मेरी स्मृति के ताल पर जमी काई के साफ़ होने पर मुझे एक और लड़की का धुँधला-सा चेहरा नज़र आता है । वह कौन है ? मेरी कोई सहपाठी ? जानी-पहचानी शक्ल वाला एक लड़का धुँधले चेहरे वाली उस लड़की के लिए रोज़ गुलाब के फूल तोड़ कर लाता है , पर संकोच के कारण कभी उस लड़की को वे फूल नहीं दे पाता है । वह लड़का अक्सर उस लड़की के लिए प्रेम-पत्र लिखता है , पर कभी अपने वे प्रेम-पत्र उस लड़की को देने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है । वह लड़का उस लड़की को बेहद चाहता है , पर हिचकने के कारण वह कभी उस लड़की को कॉलेज की कैंटीन में साथ चाय-कॉफ़ी पीने के लिए आमंत्रित नहीं कर पाता है । उस लड़की की शादी तय हो जाने की ख़बर सुनकर वह लड़का अकेले में रोता है , पर कभी किसी के सामने अपना ग़म ज़ाहिर नहीं कर पाता है ...


                पहले कभी-कभार 1994/2018 वाली यानी  ' टिप-टिप बरसा पानी ' वाली वह लड़की मुझे अपनी स्मृति के किसी मेट्रो-स्टेशन या किसी मॉल में दिखाई दे जाती थी । हमेशा उसके चेहरे पर ' थैंक्स फ़ॉर द कॉफ़ी ' वाली मोहक मुस्कान होती थी । उसे देखकर सावन के महीने में सुंदर पंख फैलाए मोर को नाचते देखने का सुखद अहसास होता था । वह एक खिलता गुलाब है । वह जैसे शायर का ख़्वाब है । वह एक उजली किरण है । वह जैसे वन में कुलाँचे भरती हिरणी का मस्त यौवन है । वह जैसे मेरे मन के आकाश में चमकता पूरा माहताब है । वह जैसे चंदन की आग है । 

              अब अक्सर ' टिप-टिप बरसा पानी ' वाली वह लड़की मेरी प्रेयसी बन कर मेरे ख़ुशनुमा सपनों में आती है । मैं उसके चेहरे पर गिर आई बालों की लटों को पीछे हटाकर उसका माथा चूम लेता हूँ । उसका चेहरा मेरा स्पर्श पा कर धीरे-धीरे और नरम पड़ने लगता है । तब उसके चेहरे पर एक सलोनी मुस्कान आ जाती है जिसका मैं दीवाना हूँ । हमारे भीतर इच्छाओं के निशाचर पंछी पंख फैलाने लगते हैं । फिर कमरे की ट्यूब-लाइट बुझ जाती है और ज़ीरो वॉट का बल्ब जल जाता है । एक चाहत भरी फुसफुसाहट उभरती है । फिर एक मादक हँसी गूँजती है । 

             खिड़की के बाहर एक सलेटी रात रोशनी के बचे-खुचे क़तरे बीनकर ले जा रही होती है । लेकिन कमरे के भीतर हमारे अन्तर्मन रोशन होते हैं । 

             धीरे-धीरे हवा कसाव से भर जाती है । दीवार पर दो छिपकलियाँ आलिंगन-बद्ध पड़ी होती हैं । मैं अपनी प्रिया के स्नेह-पाश में होता हूँ । जैसे सबसे ज़्यादा चमकता हुआ नक्षत्र मेरे आकाश में होता है । उसके भीतर से सम्मोहक ख़ुशबुएँ फूट रही होती हैं । ज़ीरो वॉट के ताँबई उजाले में मांसल सुख अपने पैर फैला रहा होता है । मेरी धानी - परी मेरी बाँहों में होती है । मेरी मरमेड मेरी निगाहों में होती है । ऊपर गेंहुआ शंख-से उसके उत्सुक वक्ष होते हैं जिनकी जामुनी गोलाइयों में अपार गुरुत्वाकर्षण होता है । नीचे ठंडी सुराही-सी उसकी कमनीय कमर होती है जहाँ पास ही महुआ के फूलों से भरा एक आदिम जंगल महक रहा होता है । बीच समुद्र में भटकता हमारा जहाज़ एक हरे-भरे द्वीप पर पहुँच गया होता है । 

             एक ऐसा समय होता है जब तन और मन के घाव भरने लगते हैं , जब सपने सच होने लगते हैं , जब सुख अपनी मुट्ठी में होता है और मुँदी आँखें फिर से नहीं खुलना चाहतीं । जब सारी चाहतें ख़ुशबूदार फूलों में बदल जाती हैं और जीभ पर शहद का स्वाद आ जाता है । वह एक ऐसा ही पल होता है -- घनत्व में भारी किंतु फिर भी बेहद हल्का । समय का रथ एक उत्सव की राह पर से गुज़र रहा होता है । 

             हमारा पहला चुम्बन जादुई था । हमारा पहला मिलन तिलिस्मी । उस स्पर्श से हमारे तन-मन में हज़ारों सूरजमुखी खिल उठे थे । उसके बाद तो हर बार हम एक नई भाषा और नए शिल्प में अपने मिलन की कथा लिखते थे । हम एक-दूसरे को जितना अधिक पीते थे , हमारी प्यास उतनी ही बढ़ती जाती थी । कभी वह शहद-सी होती , कभी चाशनी-सी , कभी गुड़-सी , कभी गन्ने-सी , कभी खोए-सी , कभी मलाई-सी । कभी वह पायल की झंकार-सी होती , कभी पियानो-सी , कभी वायलिन-सी , कभी माउथ-ऑर्गन-सी , कभी जलतरंग-सी । कभी वह भोर-सी होती , कभी गोधूलि-सी , कभी शिखर-दुपहरी-सी , कभी गुलज़ार रात-सी । कभी वह शोलों-सी होती , कभी शबनम-सी , कभी सरगम-सी , कभी मधुबन-सी ।   

              हम जितना अधिक एक -दूसरे में डूबते जाते , उतने ही अच्छे तैराक बनते जाते । हमारा तन-मन एक मीठे दर्द से भर जाता । तब उसकी आँखों में उतर आए आकाश का रंग गहरा नीला हो जाता और मेरी आँखों में हहराता समन्दर शीशे-सा पारदर्शी लगने लगता । तब धरती की हरियाली ज़रा और बढ़ जाती और क्षितिज हमसे बस दो क़दम दूर लगता । तब दिन भर गुनगुनाते रहने का मन करता और रात की देह पर गिरी ओस की बूँदें मोतियों-सी चमकतीं । तब हमारे भीतर वसंत की ख़ुशबुएँ महकने लगतीं और एक-दूसरे के भीतर टहलते हुए हम जागती आँखों से सपने देख रहे होते ...

                

              मेरी स्मृति में मौजूद ' टिप-टिप बरसा पानी ' वाली यह लड़की क्या केवल मेरे ख़्यालों की उपज है ? मेरी कल्पना मात्र है ? उसका चेहरा मेरे अतीत में मौजूद एक लड़की के धुँधले चेहरे में क्यों बदल जाता है ? जो भी हो , वह कितनी वास्तविक लगती है ।  कुछ है जो हम दोनों को आपस में जोड़ता है । शायद किसी और ही जीवन में । किसी और ही दुनिया में । एक ऐसी दुनिया में जहाँ मैं खुद अपने-आप से भी जुड़ जाता हूँ । जहाँ मैं खुद से भी मिल पाता हूँ । 

                 मैं -- पैंतालीस साल का एक अकेला , अविवाहित व्यक्ति , ' टिप-टिप बरसा पानी ' वाली लड़की जिसकी एकमात्र स्त्री-मित्र है ।



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प्रेषक : सुशांत सुप्रिय 
           A-5001 , 
           गौड़ ग्रीन सिटी , 
           वैभव खंड , 
           इंदिरापुरम् , 
           ग़ाज़ियाबाद - 201014 
           ( उ. प्र. ) 
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com 
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