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सावन मनभावन


हम सभी के जीवन में मनभावन सावन से जुड़ी कुछ खट्टी-मीठी यादें ,कुछ किस्से-कहानियाँ जरुर होते हैं । किसी दोस्त,परिवार या प्यार के साथ बीता कोई बरसात का  दिन और कुछ नही तो बचपन में अपने शरारती
मनभावन सावन
मनभावन सावन
दोस्तों के साथ मिलकर झमाझम  बरसात में की गई ढेर सारी शैतानियाँ,इन्हें तो कोई भुला ही नही सकता ।ये टिप टिप करती बूँदें जाने क्या -क्या भूला बिसरा याद दिलाती हैं ! यादों का शहद घुला होता है इन बूंदों में ...!
ये बूँदें बहुत कुछ कहती है गुनगुनाती है पर चौतरफा शोर से घिरे हुए हम इन्हे अनसुना कर देते है । ये और-और की तृष्णा औरों से ज्यादा जोड़ने की चाहत और बाहर -भीतर के शोर से घिरे हम जब अपनी ही आवाज़ को अनसुना कर देते है तो भला बूँदों की आवाज़ को कैसे सुनेंगे !!
वरना कौन ऐसा है जिसे झमाझम बारिश को देख बचपन की शैतानियां याद ना आती हो ! बूंदों के हथेलियाँ  को छूते ही यादों के सन्दूक खुद व खुद खुल जाते हैं ।
आज सावन को खिड़की से देखते हुए जब छन -छन करती बूँदों के सुर में पत्तों को थिरकते देखा तो अहसास हुआ कि  जीवन की आपाधापी में जाने कब इतने व्यस्त हो गये कि प्राकृतिक सौन्दर्य को नयन भर देखने की, छोटी -2 खुशियों को खुलकर जीने की फुरसत ही नही रह गयी अब किसी के पास...... !! 
वरना याद करो वो बचपन का सावन और रिमझिम फुहारें जो सारे बंधन तोड़ देती थी आज मन को बांध रखा है जोर जबरदस्ती से और एक वो दिन थे जब हमारे हर पल को जीने की जिद के आगे किसी का जोर नही चलता था । बड़ो के लाख मना करने पर भी छत पर चले जाते थे पानी में छप -छप करने...!! 
बड़ी प्यारी-प्यारी यादें सम्भाल रखी है मैंने अभी तक बचपन की.....!
हाय ! कितना खास था वो बचपन का सावन --------!
मैंने जिद मचा के छत पर पानी में छप-छप तो नही की पर हाँ नानी के घर की कच्ची छतों पर बादल घिरते ही  
कोई छोटा सा छेद कर देती थी जैसे ही बारिश शुरु होती पानी  नीचे आने लगता और नानी खुद व खुद छत पर भेज देती थी छत पर हुआ छेद ढूंणकर बंद करने के लिए इस तरह बिना किसी जिद व शोर शराबा के हर बारिश में जम के नहाती ।
जब भी बादल घिरते आस पास की सूनी छतों पर मोर इकट्ठे होने लगते थे बादल की गर्जन के साथ ही मुहल्ला मोरों की आवाज़ से गूँज उठता था और थोड़ी देर बाद मोर नाचना शुरु कर देते।मैं भी मोरों की आवाज़ सुनते ही छत पर जाने की कहती तो नानी कहतीं ---------
"मोरन नै नाचन दै उनपे तो कछू काम नाय तू अपनों स्कूल कौ काम कर"😒 अब आप ही बताएँ जिसकी छत पर मोर नाच रहे हो उस बच्चे का मन कही कितावो  में ठहर सकता है । मैं छत पर जाने के हजार बहाने ढूंड़ती ।कभी कहती नानी-छत से चौलाई तोड़ लाऊ तो कभी कहती नानी फुलवारी में बहुत सारे फूल खिले हैं ले आऊ वरना तेज बारिश हो गयी तो बिखर कर टूट जायेंगे ।
नानी मेरे नये नये बहाने सुन शक की नजरों से मुझे  देखती और आखिरकार छत पर जाने की हाँ कह ही देती थी ।मैं छटपट मगर चुपके से जाकर छत पर छुप जाती थी जैसे ही छतों पर मोरनीयों का आना शुरु होता जगह -जगह मोहक नृत्य शुरू हो जाता था ! आस -पास की छतों पर मोरों के कई जोड़े नाच रहे होते थे उनके बड़े -बड़े पंखों के हिलने से झाँझर जैसी झनन -झनन की आवजें निकलती थी ।मैं तो इस मनमोहक दृश्य को सुध-बुध खोये देखती रहती थी ये सब देख बस यही शब्द निकलते थे, 
अहा ! कितना सुंदर।।
मौसम की पहली बूंदा बाँदी के बाद माहौल में नमी की जगह गर्मी और उमश बढ़ जाती पर हमें तो इस पहली बूंदा बांदी से ही सावन के आने का संदेसा मिल जाता और हम उसके स्वागत की तैयारियों में जुट जाते।
मानसून आने न आने का  कोई फर्क नही पड़ता था हमारी खुशियों पर,'आखिर ये गँवारो का गाँव था और यहाँ के लोग हर मौसम को जीना और हर उत्सव पर जी भर खुशियाँ मनाना जानते थे ये स्मार्ट लोगो से भरा शहर नही था जहाँ हर उत्सव एक तारीख बनकर रह जाता है''
खैर..........!
अभी तो मौसम में सावन के  लक्षण भी ढंग से दिखने शुरु न हुए होते थे कि घर-घर में महिलाएं और बच्चियाँ सावन की  अगवानी को तैयार हो जाती। घर-घर में सुंदर-सुंदर नक्काशीदार,नग जड़ी पटलियाँ सजाई  जातीं तो कुछ लडकियाँ पटलियों को रंगों से लोक कलाओं से सजा लेती थी ।कुछ लडकियाँ रंग-बिरंगे मोती और घुंघरु की लड़ियाँ पिरोकर झूले की रस्सी में लपेट लेतीं हवा के साथ खेलते हुए झूले पर घुंघरु की रुनझुन उसे और लुभावना बना देती थी। रक्षाबंधन और हरियाली तीज पर पास पडोस की सभी महिलाएँ और लडकियाँ  सामूहिक झूले पर झूलने जाती थी । हर मुहल्ले में एक बड़ा झूला होता जिसे त्योहारों पर ताजा फूलों से सजा लिया जाता जिससे झूला और सुंदर लगता था ।
मौसम की पहली बारिश के साथ ही आम ,नीम ,पीपल की ऊँची डालो पर झूले डल जाते थे ! अभी तो सावन  की एक-दो बारिश ही हुई होती सावन की झड़ी लगना अभी दूर होता था और हमारा नियमित झूलना चालू हो जाता ।
मीनाक्षी वशिष्ठ
मीनाक्षी वशिष्ठ
स्कूल से आते ही हम ज़रा बन ठन कर सावन के स्वागत में तैयार होकर झूले के पास इकट्ठे हो जाते थे । नानी मेरी सुंदर वाली चोटी बनाती थी घर की बगिया में मोगरा ,गेंदा और लाल फूलों के गुच्छे लटके रहते थे नानी कभी-कभी फूलों को गुंथकर बालों में लगा देती, नन्हे हाथों में सुंदर मेंहदी और लाल हरी सुंदर खनखनाती चूड़ियां होती थी ! मोटी रस्सी से पड़े झूले पर हम दो या तीन बच्चे बैठ जाते थे पटली के दोनो किनारों पर दो हमसे बड़े लड़के खड़े रहते थे जो की झूले की गति सम्भाल सके ! वो दोनो जोर से झूले पर पींगे बढ़ाते और झूले की गति आसमान झूने लगती थी । नानी झूल नही सकती तो क्या हुआ हम बच्चों की खुशियों में शामिल तो हो ही सकती थी।"कितना अच्छा लगता है ना जब आपकी खुशियों में आपका परिवार,आपके बड़े शामिल होते हैं "
तो नानी भी पास ही चबूतरे पर पड़ोसनो के साथ सावन के गीत गाती रहती थीं। हल्की फुहारों और सावन के मल्हारो के बीच झूलते हुए जब मैं ऊँचाई से नीचे देखती थी तो काफी डर लगता था पर नानी को पास ही खड़ी देखकर जान में जान आ जाती थी  जो कि कुछ पड़ोसनो के साथ मिलकर बड़े प्यारे सुर में गा रही होती थीं--------


"कच्ची नीम की निम्बौरी सावन जल्दी अईयो रे.........''





मीनाक्षी वशिष्ठ
जन्म स्थान ->भरतपुर (राजस्थान )
वर्तमान निवासी टूंडला (फिरोजाबाद)
शिक्षा->बी.ए,एम.ए(अर्थशास्त्र) बी.एड
विधा-गद्य ,गीत ,प्रयोगवादी कविता आदि।

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