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और फिर अँधेरा 


                          


              प्रिय गुरमीत ,

                                यहाँ हैवलॉक द्वीप , अंडमान के डॉल्फ़िन गेस्ट हाउस से मैंने पिछले हफ़्ते भी तुम्हें पत्र लिखा था । पर तुमने इस पते पर मेरे पत्र का जवाब नहीं दिया है । क्या तुम मुझे पत्र लिखने का अपना वादा भूल गए हो ? पिताजी बता रहे हैं कि वहाँ दिल्ली में बहुत गड़बड़ चल रही है । पिछले हफ़्ते से विश्व की सभी प्रमुख महाशक्तियाँ विनाशकारी तृतीय विश्व-युद्ध के मुहाने पर खड़ी हैं । पिताजी का कहना है कि अमेरिका और यूरोपीय देश एक ओर हैं जबकि चीन , रूस और उत्तर कोरिया दूसरी ओर हैं । चारो ओर भय और आतंक का माहौल छाया हुआ है । डाक-व्यवस्था भी बाधित हुई होगी । शायद इसीलिए तुम्हारी लिखी चिट्ठी मुझे नहीं मिली है । वहाँ हमारा दोस्त नफ़ीस  कैसा है ? और जेनेलिया कैसी है ?  मैं तुम्हारे और स्कूल के सभी दोस्तों के लिए चिंतित हूँ ।
             
अँधेरा
अँधेरा
सच कहूँ तो मुझे पिताजी की तृतीय विश्व-युद्ध वाली बात पर पूरा यक़ीन नहीं है । हो सकता है , वहाँ दिल्ली में सब ठीक हो और तुमने आलस के मारे मुझे पत्र लिखा ही नहीं हो । हमें यहाँ अंडमान के हैवलॉक द्वीप आए हुए एक हफ़्ते से ज़्यादा समय हो गया है । तुम्हें पता है , मम्मी तो यहाँ आना ही नहीं चाहती थी । वह तो कश्मीर जाना चाहती थी , पर पिताजी हम सब को मना कर यहाँ ले आए । वैसे मेरी इच्छा शुरू से ही अंडमान के जंगलों में घूमने की थी । अब तो मम्मी को भी यहाँ के समुद्र-तट और यहाँ की हरियाली अच्छी लगने लगी है । इस बीच वहाँ दिल्ली में रितिक रोशन की नई फ़िल्म लगने वाली थी । जब मैं वापस आऊँगा और सब ठीक होगा तो हम दोनों अपने पापा-मम्मी के साथ इकट्ठे वह फ़िल्म देखने जाएँगे ।

यहाँ डॉल्फ़िन गेस्ट हाउस के पास के ' बीच ' से समुद्र में सूर्योदय और सूर्यास्त बहुत सुंदर लगते हैं । पास ही मछलियों से भरी एक छोटी-सी नदी भी बह रही है । हमें बहुत मज़ा आ रहा है । हमने बहुत सारी तस्वीरें खींची हैं । जब मैं वापस दिल्ली आऊँगा तब तुम्हें ये सारी सुंदर फ़ोटो दिखाऊँगा । हमारे पड़ोस में केरल का एक परिवार ठहरा हुआ है । अंकल-आंटी के साथ एक प्यारी-सी छोटी बच्ची भी है । मैं उसके साथ खेलता हूँ ।

तुम्हारी बहुत याद आ रही है । तुम कैसे हो ? मैं मोबाइल फ़ोन पर तुमसे बात करना चाहता था पर इन दिनों यहाँ कोई भी फ़ोन काम नहीं कर रहा । पोस्ट-ऑफ़िस यहाँ से दूर है । यहाँ के रसोइया माइकेल अंकल हफ़्ते में दो बार दूर के बाज़ार जा कर खाने-पीने का सामान ख़रीद लाते हैं । लौटते हुए वे डाक-घर से यहाँ की चिट्ठियाँ भी ले आते हैं । तुम्हारी चिट्ठी की प्रतीक्षा है , दोस्त ।

                                                             --- तुम्हारा मित्र ,
                                                                                       पलाश ।



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प्रिय गुरमीत ,

                                सच-सच बताओ , तुम वहाँ ठीक-ठाक हो न ? यहाँ पिताजी , केरल वाले अंकल और सारे बड़े लोग बहुत चिंतित दिखाई देते हैं । वे रेडियो पर हो रहा प्रसारण सुनते रहते हैं । बात-बात पर उनके मुँह से ' परमाणु बम ' और ' तीसरा विश्व-युद्ध ' जैसे शब्द निकलते रहते हैं । उनके बीच हमेशा अमेरिका , रूस , चीन और उत्तर कोरिया की बातें हो रही होती हैं । उन सब की बातें सुनकर मम्मी भी चिंतित रहने लगी है। पूछने पर मम्मी ने बताया कि दुनिया में परमाणु-युद्ध शुरू हो गया है । जब मैंने वापस दिल्ली लौट चलने की बात की तो मम्मी ने बताया कि विश्व-युद्ध के कारण जहाज़ और विमान सेवाएँ बंद पड़ी हुई हैं । क्या यह सच है ? तब तो हम लोग न जाने कब तक के लिए यहाँ फँस गए हैं ।  

         आज सुबह से रेडियो पर भी कोई प्रसारण नहीं हो रहा । टी. वी . पर प्रसारण तो दो-तीन दिनों पहले ही बंद हो गया था । सुबह से मम्मी की तबीयत भी ख़राब चल रही है । पापा यहाँ अपने साथ जो दवाइयाँ लाए थे , वे सब अब ख़त्म होने वाली हैं । मैं यहाँ के माहौल में बढ़ रहे तनाव को महसूस कर सकता हूँ ।

          दोस्त , मैं तुम्हें एक राज की बात बताता हूँ । मेरी मम्मी को ' बेबी ' होने वाला है । कल रात मम्मी ने मुझे यह बात बताई । उन्होंने मुझे यह बताया कि मेरे इस बेबी ( भाई या बहन ) को पाँच-छह महीने के बाद भगवान जी हमारे पास भेजेंगे । मम्मी ने मुझे कहा कि अभी मैं यह बात किसी को नहीं बताऊँ । तुम भी प्लीज़ यह सीक्रेट अभी किसी से शेयर नहीं करना । गुरमीत , तुम तो जानते हो कि मुझे एक बेबी बहन चाहिए । मैं रोज़ भगवान जी से प्रे कर रहा हूँ कि ऐसा ही हो । मम्मी कहती है कि भाई हो या बहन , सेहतमंद होना चाहिए । हमारी क्लासमेट नेहा के भाई की तरह बीमार नहीं ।

           गुरमीत , अभी सुबह के ग्यारह ही बजे हैं , पर बाहर अँधेरा-सा छाया हुआ है । हवा भी साफ़ नहीं है । पिछले दो दिनों से हमें सूरज की रोशनी ही नहीं दिखी है । यहाँ सब बड़े लोग बहुत फ़िक्रमंद हैं । तुम सब वहाँ कैसे हो ? मैं अब भगवान जी से प्रार्थना करने जा रहा हूँ । अपने पापा-मम्मी को मेरी नमस्ते कहना ।

                                                                    --- तुम्हारा मित्र ,
                                                                                            पलाश ।

     

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प्यारे दोस्त गुरमीत ,
तुम कैसे हो ?

यहाँ पिछले नौ-दस दिनों से बाहर अँधेरा छाया हुआ है । अब तो मुझे तारीख़ भी याद नहीं । जिस अँधेरे का बात मैंने अपनी पिछली चिट्ठी में की थी , अब वही अँधेरा जैसे हमेशा के लिए यहाँ छा गया है । यहाँ हमारे ठहरने की जगह पर खाना-पानी ख़त्म होता जा रहा है । इतने दिनों से यहाँ सूरज ही नहीं उगा । चारो ओर घुप्प अँधेरा है । सूरज की गर्मी के बिना ठंड बढ़ती जा रही है । बड़े लोग आपस में बातें कर रहे हैं कि परमाणु-युद्ध की वजह से धरती पर बहुत समय के लिए ' न्यूक्लिअर विंटर ' आ जाएगी और सारे जीव-जंतु और पेड़-पौधे नष्ट हो जाएँगे । हे भगवान् , अब क्या होगा ? मुझे यहाँ घबराहट हो रही है ।

                  इस बीच हम इस जगह के बेसमेंट में शिफ़्ट हो गए हैं । पिताजी ने बताया है कि परमाणु-युद्ध की वजह से बाहर की हवा ज़हरीली होती जा रही है । चारो ओर एक कड़वा धुआँ फैला हुआ है । यह कैसा विनाशकारी युद्ध है ? नदी से आ रहा हमारा पीने का पानी भी अब बदबूदार हो गया है । उसे उबाल कर पीने के बावजूद हमें उल्टी हो रही है ।

                   दोस्त , जब से यहाँ अँधेरा आया है , केरल वाले अंकल-आंटी की छोटी गुड़िया बीमार रहने लगी है । यहाँ पिछले कुछ दिनों से लाइट भी नहीं है । बिना बिजली के हम सब इन दिनों मोमबत्तियों के सहारे अपना समय गुज़ार रहे हैं । लेकिन मुझे डर है कि हमारी मोमबत्तियाँ भी जल्दी ही ख़त्म हो जाएँगी । तब हम क्या करेंगे ?

                   इस बीच हमारे रसोइया माइकेल अंकल एक दिन अँधेरे में ही बाज़ार और पोस्ट-ऑफ़िस के लिए निकले । पर वे लौट कर वापस नहीं आ पाए । पता नहीं वे कहाँ गुम हो गए ।

                   तुम अपना ख़याल रखना , दोस्त ।

                                                                    --- तुम्हारा मित्र ,
                                                                                             पलाश ।



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                    प्रिय गुरमीत ,

                                       कुछ ही घंटे पहले केरल वाले अंकल-आंटी की छोटी गुड़िया की मौत हो गई । वह लगातार बहुत बीमार चल रही थी । उसके शरीर में जगह-जगह फोड़े-फुंसी उग आए थे , और उसके सारे बाल झड़ गए थे । वह सारा दिन दर्द से चीख़ती-कराहती रहती थी । यहाँ कोई डॉक्टर भी नहीं था । आज मैं बहुत दुखी और डरा हुआ हूँ और मुझे रोना आ रहा है ...                                                                          

                                                                --- तुम्हारा मित्र ,
                                                                                         पलाश ।



           ***             ***             ***             ***             ***             ***



                   प्रिय गुरमीत ,

                                      कल रात मेरी मम्मी ने समय से बहुत पहले एक मरे हुए बच्चे को जन्म दिया । हम सब बहुत रोए । जानते हो , उस बेबी के हाथ-पैर ही नहीं थे । पापा ने बताया कि ऐसा दुनिया में हो रहे परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से होने वाले रेडिएशन की वजह से हुआ है । पापा ने बताया कि आने वाले कई सालों तक दुनिया के ज़्यादातर बच्चे ऐसे ही टेढ़े-मेढ़े पैदा होंगे ।

                   पहले तो मम्मी कई घंटे तक उस मरे हुए बेबी को अपनी छाती से चिपकाए रहीं । फिर वह फूट-फूट कर बहुत रोईं । मैं भी बहुत दुखी और उदास हूँ । पापा और केरल वाले अंकल ने उस मरे हुए बेबी को बाहर अँधेरे में जा कर कहीं दफ़ना दिया । मम्मी की हालत ख़राब होती जा रही है । इस घटना से वह भीतर तक हिल गई हैं । वे अचानक ही कभी हँसने लगती हैं , कभी बेतहाशा रोने लगती हैं , तो कभी चीख़ने-चिल्लाने लगती हैं । मुझे यहाँ बहुत डर लग रहा है । पता नहीं वहाँ दिल्ली में तुम लोगों का क्या हाल है । काश यह अँधेरा जल्दी दूर हो जाता और सूरज दोबारा दिख जाता । तब सब पहले जैसा ठीक हो जाता और हम वापस दिल्ली लौट आते । मुझे तुम सब की बहुत याद आ रही है ।

                                                                     --- तुम्हारा मित्र ,
                                                                                        पलाश ।



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                    प्रिय गुरमीत ,

                                       पता नहीं मैं तुम्हें लगातार चिट्ठियाँ क्यों लिखता रहता हूँ । पता नहीं तुम इन्हें कभी पढ़ भी पाओगे या नहीं । पापा और केरल वाले अंकल कभी-कभी टॉर्च लेकर बाहर अँधेरे में जाते हैं । पापा कहते हैं कि वे तुम्हें लिखी मेरी सारी चिट्ठियाँ पोस्ट-ऑफ़िस में दे देते हैं । लेकिन अभी पोस्ट-ऑफ़िस की सारी सेवा बंद पड़ी हुई है । यहाँ खाना बनाने की गैस भी ख़त्म हो चुकी है । सब

बड़े लोग अँधेरे में ही जंगल से लकड़ियाँ काट कर लाते हैं , जिनके सहारे आग जला कर बचा-खुचा खाना पकाया जाता है ।

                    यहाँ मम्मी और केरल वाली आंटी लगातार बीमार चल रही हैं । दोनों बदहवास हालत में अकेले में अपने-आप से न जाने क्या-क्या बातें करती रहती हैं । पिताजी और केरल वाले अंकल भी अब बाक़ी बड़े लोगों की तरह उदास और गुमसुम रहते हैं । अब मैं तुम्हें जो चिट्ठियाँ लिखूँगा , वह अपने पास ही रखूँगा । मैं नहीं चाहता हूँ कि पापा इस अँधेरे में चिट्ठियाँ पोस्ट करने दूर डाक-घर जाया करें । जब कभी हम मिलेंगे , मैं तुम्हारे नाम लिखी अपनी सारी चिट्ठियाँ तुम्हें सौंप दूँगा ।

                    वहाँ दिल्ली में क्या हाल है ? क्या वहाँ अँधेरा छँटा और स्कूल फिर से शुरू हुआ ?अब तो मुझे इस टापू पर फँसे हुए कई हफ़्ते हो गए हैं । पता नहीं , आगे क्या होगा । तुम , जेनेलिया और नफ़ीस मुझे बहुत याद आते हो ।

                                                            --- तुम्हारा मित्र ,
                                                                                      पलाश ।



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                    प्रिय गुरमीत ,

                                       ऐसा लग रहा है जैसे मैं बरसों से तुम सब से नहीं मिला हूँ । मैं , पापा-मम्मी और केरल वाले अंकल-आंटी -- हम सभी अब बीमार रहने लगे हैं । यहाँ पीने के लिए अब साफ़ पानी नहीं बचा है । खाने का सामान भी लगभग ख़त्म हो गया है । हम सभी लोग बेहद कमज़ोर हो गए हैं । बड़े लोग अब जंगल से लकड़ियाँ काट कर नहीं ला पा रहे हैं । हम सब दस्त और उल्टियों से पीड़ित हैं । हमारे पास अब कोई दवाई नहीं बची ।

                   दोस्त , अब तो तुम सब से मिल पाने की उम्मीद भी कम होती जा रही है । हम यहाँ बाक़ी सारी दुनिया से कटे हुए फँसे पड़े हैं । पता नहीं बाक़ी दुनिया का क्या हाल है ।

                                                                      --- तुम्हारा मित्र ,
                                                                                               पलाश ।



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                   प्रिय गुरमीत ,

                                      पापा के मना करने के बाद भी कल मैं छिप कर के बेसमेंट से निकला और टॉर्च लेकर बाहर अँधेरे में गया । बाहर यह देखकर मैं सन्न रह गया कि यहाँ के सारे जंगल और सारी हरियाली नष्ट हो गई है । बाहर केवल उजड़ी हुई धरती की काली-भूरी मिट्टी बची है । बाहर की ज़हरीली हवा में साँस ले पाना भी मुश्किल हो रहा था । भाग कर मैं वापस बेसमेंट में लौट आया । हम इंसानों ने अपनी सुंदर धरती को नर्क बना दिया है ।

                                                      --- तुम सब को याद करता ,

                                                                             तुम्हारा मित्र ,
                                                                                    पलाश ।



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                  प्रिय गुरमीत ,

                                     यह शायद तुम्हें लिखा मेरा अंतिम पत्र होगा ।

                  कल रात से मुझे तेज बुखार हो गया है । मेरी देह में भी जगह-जगह फोड़े निकल आए हैं और मेरे सारे बाल झड़ गए हैं ।

                   मुझे शक है कि दिल्ली भी इस युद्ध में तबाह हो गई होगी और शायद अब तुम और मेरे बाक़ी मित्र इस दुनिया में नहीं बचे होगे । पर क्या करूँ ? तुम्हें चिट्ठी लिखना पागलपन से बचने का एकमात्र रास्ता लगता है ।

                    बाहर अँधेरा छँटने का नाम ही नहीं ले रहा । पापा-मम्मी और केरल वाले अंकल-आंटी भी भूख और बीमारी की वजह से सूख कर काँटा हो गए हैं । दोस्त , मुझे लगता है , मेरा अंत समय आ गया है । पर मुझे मरने से डर नहीं लगता । परमाणु-युद्ध के विनाशकारी प्रभाव वाली दुनिया में बचे रहने से कहीं बेहतर है जल्दी मर जाना ।

                    पापा बता रहे थे कि शायद कुछ सालों के बाद यह अँधेरा छँट जाए । बाहर की हवा भी तब शायद बेहतर हो जाए , हालाँकि तब तक दुनिया में कितने लोग बचे रह सकेंगे , कहना मुश्किल है । पर मुझे उम्मीद है कि शायद तब तक दुनिया में बचे रह गए कुछ लोग दोबारा एक नई दुनिया बसा सकें जहाँ कभी युद्ध नहीं होंगे , चारो ओर शांति होगी और बड़ों और बच्चों को यूँ घुट-घुट कर असमय मरना नहीं पड़ेगा ।

                     दोस्त , पापा कहते हैं कि सारे ईश्वर एक ही हैं । हम ही लोग उन्हें अलग-अलग नामों से बुलाते हैं । मुझे लगता है , मैं जल्दी ही मर कर तुम सबसे मिलने ऊपर परम-पिता परमेश्वर के पास पहुँच रहा हूँ । वहीं मिलते हैं ...

                                                                    --- तुम्हारा मित्र ,
                                                                                             पलाश ।



                               ------------०------------



प्रेषक : सुशांत सुप्रिय
            A-5001 ,
            गौड़ ग्रीन सिटी ,
            वैभव खंड ,
            इंदिरापुरम ,
            ग़ाज़ियाबाद - 201014
            ( उ. प्र. )
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@ gmail.com
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