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नई कविता और कहानी का पाठकों पर प्रभाव 



कवि अदृश्य को दृश्य दिखाई देते हैं, अश्रव्य को श्रव्य और नामहीन को नाम देने वाली ऊर्जा है । उनके कार्यों का प्रभाव हमेशा तत्काल परिलक्षित नहीं हो होता है, लेकिन उनका रचना संसार पूरे समाज और राष्ट्र को बदलने में सक्षम है। 

नई कविता और कहानी
नई कविता और कहानी
नई कविता’ और कहानियों का अपने पाठक के और स्वयं अपने प्रति उत्तरदायित्व बढ़ गया है।नई कविता की प्रयोगशीलता का पहला आयाम भाषा से सम्बन्ध रखता है।वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के प्रति चिन्ता, पर्यावरण चेतना, समाज में नारी की दशा और उसकी शिक्षा-सजगता की ज़रूरत आदि विभिन्न सरोकार नई कविता और कहानियों के प्राण है। दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, धार्मिक, जातीय, भाषाई और यौन अल्पसंख्यकों के कई दबाने वाली और हाशिए वाली आवाज़ों का उद्भव - कविता का एक और वास्तविक प्रकार का लोकतांत्रिककरण है। वे अपनी पीड़ा, अलगाव और विद्रोह के लिए एक भाषा खोजने की कोशिश कर रहे हैं। नई कविता को सम्बोधित करते हुए अज्ञेय कहते हैं "काव्य का विषय और काव्य की वस्तु (कंटेंट) अलग-अलग चीज़ें हैं; पर जान पड़ता है कि इस पर बल देने की आवश्यकता प्रतिदिन बढ़ती जाती है! यह बिलकुल सम्भव है कि हम काव्य के लिए नए से नया विषय चुनें पर वस्तु उसकी पुरानी ही रहे; जैसे यह भी सम्भव है कि विषय पुराना रहे पर वस्तु नई हो... नि:सन्देह देश-काल की संक्रमणशील परिस्थितियों में संवेदनशील व्यक्ति बहुत कुछ नया देखे-सुने और अनुभव करेगा; और इसलिए विषय में नएपन के विचार का भी अपना स्थान है ही; पर विषय केवल ‘नए’ हो सकते हैं, ‘मौलिक’ नहीं-मौलिकता वस्तु से ही सम्बन्ध रखती है। विषय सम्प्रेष्य नहीं है, वस्तु सम्प्रेष्य है। नए (या पुराने भी) विषय की, कवि की संवेदना पर प्रतिक्रिया, और उससे उत्पन्न सारे प्रभाव जो पाठक-श्रोता-ग्राहक पर पड़ते हैं, और उन प्रभावों को सम्प्रेष्य बनाने में कवि का योग (जो सम्पूर्ण चेतन भी हो सकता है, अंशत: चेतन भी,और सम्पूर्णतया अवचेतन भी)-मौलिकता की कसौटी का यही क्षेत्र है।"

नई कविताओं और कहानियों में रचनाकार  के निजी जीवन और समसामयिक सामाजिक, राजनीतिक जीवन की त्रासदी परस्पर गुम्फित है । ये कविताएँ और कहानियां राजनीति से भागती नहीं क्योंकि वह आज के जीवन का हिस्सा है लेकिन राजनीतिक मतवाद से उनका अलगाव अवश्य है । दरअसल, नई कविताओं और कहानियों के लिए  इनसान से बड़ा कुछ भी नहीं हैµन ईश्वर, न प्रकृति सबका कद उनके यहाँ एक है । नई कविता भाषा से दुर्व्यवहार करनेवाले कवियों की इधर बढ़ती हुई भीड़ के लिए एक सबक भी है । नई कविता अपनी निजी दुनिया में ले जाकर, सामाजिक ‘सच्चाई’ से सूक्ष्म सम्पर्क करती हुर्इं, पाठक के मन में भाषा के प्रति एक धड़कता हुआ रिश्ता बनाती हैं । नई में कविता में जो ‘गुस्सा’ धीरे–धीरे अपेक्षाकृत अधिक मुखर हुआ है, उसके पीछे भाषा पर पड़ने वाले दबाव की स्थिति से एक गहरा रचनात्मक मुकाबला है । कविता में निषेधी भाषा की तीव्र उपस्थिति कुछ करने और बदलने की इच्छा से अनुप्रेरित है , सिर्फ गुस्से से ही नहीं ।

नई कहानियों और  कविताओं में वैयक्तिक संवेदना ने भाषा को सांस्कृतिक चेतना के अधिक योग्य बनाया है। मानवकृत सभ्यता और इतिहास के बीच की बातचीत के लिए आदमी ही इन कविताओं का मुख्य आधार है। वही आदमी एक ‘सम्पूर्ण आदमी’ बन सकने के लिए तरह-तरह से अपनी सामुदायिक पहचान बनाता चलता है जो गाहे-बगाहे नियति के निरीह प्रसंग में अविश्वसनीय और अकेला दिखता है। परिवेश ही इन कविताओं का मुख्य पात्र है। प्रत्येक स्थल पर यह महसूस होता रहता है कि हिंसा और युद्ध के बीच मानवीय श्रम के कई दूसरे रूप भी हैं जो उतनी ही तत्परता से भाषा का निर्माण करते हैं जितनी तत्परता से विचार व सौन्दर्य का। इन कविताओं में प्रवेश पाते ही हम अपने सामाजिक जीवन के एक-न-एक गहरे प्रसंग से जुड़ जाते हैं। समकालीन कविता में एक साथ कई स्तरों पर भाषा का ऐसा विकास दुर्लभ है।

नई कविताओं और कहानियों में वर्तमान समय के ढेरों ज़रूरी किन्तु अनुत्तरित सवाल हैं। धूमिल की ‘पटकथा’, ‘मुनासिब कार्रवाई’, ‘उस औरत की बग़ल में लेटकर’ तो इस बात की गवाही भी देती हैं कि धूमिल को आत्म-साक्षात्कार प्रिय है। और ख़ुद से रू-ब-रू होना कितना कठिन होता है, यह हर विज्ञ व्यक्ति जानता है। ‘मोची राम’, ‘रामकमल चौधरी के लिए’, ‘अकाल’, ‘दर्शन’, ‘गाँव’, ‘प्रौढ़ शिक्षा’ सरीखी कविताएँ धूमिल के गहरे आत्मविश्वास की पहचान कराती हैं। एक ऐसे आत्मविश्वास की पहचान जो रचनात्मक उत्तेजना और समझ से प्रकट हुई है। कहना न होगा कि जर्जर सामाजिक संरचनाओं और अर्थहीन काव्यशास्त्र को आवेग, साहस, ईमानदारी और रचनात्मक आक्रोश से निरस्त कर देनेका माद्दा नई कविताओं में हैं। 

आज की कहानियों में अथक जिजीविषा, सयानी और संयत परिवर्तनशीलता, शब्द की सम्भावना और सीमा को स्पष्टता और निर्भीकता से अंकित करने का सशक्त साक्ष्य है।अदम्य जीवनोल्लास और उतना ही उनके अन्तर में बसा अवसाद  शब्द-प्रगट है। आज के रचनाकार अपनी लगभग अकेली और अद्वितीय राह पर अग्रसर हैं । उस पर आत्मविश्वास से चलते हुए वे कई अप्रत्याशित मानवीय अभिप्राय और दृश्य उकेरते- खोजते हैं। हमारे समय में अन्तःकरण की विफलता, नागरिकों के लहू-रिसते घाव, सदियों से हिलगी हताश प्रार्थनाएँ, अपने निबिड़ शून्य में सिसकता ब्रह्मांड, चकाचौंध के फिसलन भरे गलियारों में अनसुना विलाप आदि सभी आज की नई कहानियों और  कविता में दर्ज हैं। आज की  कविता नाउम्मीद अँधेरे से इनकार नहीं करती पर उम्मीद का दामन भी नहीं छोड़ती। 

सोशल मीडिया ने कविता और कहानियों का अधिक लोकतांत्रिककरण किया है। यह दो स्तरों पर हो रहा है: रचनाकारों  की संख्या में वृद्धि हुई है। अब रचनाओं  को प्रकाशित करने के लिए किसी संपादक के विवेकाधिकार पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है - कोई ब्लॉग शुरू कर सकता है या फेसबुक या ऑनलाइन जर्नल पर कविताओं को प्रकाशित कर सकता है। दूसरा यह है कि कविता और कहानियों  की भाषा परिष्कृत या सुझावक नहीं है जितनी पहले थी - अधिकांश साहित्यकार  रोजमर्रा की भाषा का उपयोग करते हैं और अपनी छोटी दुनिया के बारे में बात करते हैं। इस तरह के आत्म-प्रकाशन के साथ एक समस्या यह है कि कविताओं को केवल कुछ मुट्ठी भर मित्रों द्वारा पढ़ा  जाता है जो आम तौर पर केवल कवि की प्रशंसा करते हैं और उत्कृष्टता में टिप्पणी करते हैं। इससे सभी कवियों के शुरुआती चरण में आवश्यक आलोचना की कमी होती है।नई कविता और कहानियां अगर इस काल की प्रतिनिधि और उत्तरदायी रचना-प्रवृत्ति है, और समकालीन वास्तविकता को ठीक-ठीक प्रतिबिम्बित करना चाहती है, तो स्वयं आगे बढक़र यह त्रिगुण दायित्व ओढ़ लेना होगा। कृतिकार के रूप में नए कवि को साथ-साथ वकील और जज दोनों होना होगा। 


- सुशील शर्मा 

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