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नानी का गाँव 


नानी तेरा गाँव
प्यार की छाँव
और बागों के झूले
बता मन कैसे भूले.....    
नही भूल पाई मैं
नानी
नानी
तुम्हारी बगिया  का
वो बेर का पेड़
उस पर घोंसला  बुनता
वो सूर्यपक्षी,,
हाँ मिलती हूँ उससे
फुरसत के पलों में
और वो चहकता है मुझे देख
आज भी.....!
तेरे आँगन का वो
शर्मीला बेला
अब भी महकता है
रातों को छुपकर
जो झूले थे नानी के घर
बागों में जी भर झूले
भला मन कैसे भूले ।।
नानी तेरा गाँव-------
पीले,लाल गुलाबी और सफेद
भोले-भाले कनेर का परिवार
और धमाचौकड़ी मचाती
शरारती गिलहरियों की टोली
आ धमकती थीं गाहे-बगाहे
जो कुतर डालती थी
कनेर की कच्ची कलियाँ और फल
तो कभी ले भागती थी मेरी
मूंगफलियाँ
वो चुलबुली नहीं सुधरीं
आज भी .......!
मेरे साथ छुआ-छुवऊअल
खेलते शरारती नेवलों की
खिड़की से उझकती
गोल मटोल आँखे देख
चमक उठती हैं मेरी उदास                      
आँखे आज भी.......!
वो पंछियों का कलरव
अब भी इन कानों में गूंजे
भला मन कैसे भूले ।।
ओ नानी तेरा गाँव......!
सुर्ख लाल फूलों के
खिलते ही
खिल उठती थी
गर्मियों की सूनी
बेरंग दोपहरी ।।
झुर्रीदार हाथों से
गुथे गजरे
जो नानी सजाती थीं
मेरे बालों में ,,
महकते हैं आज भी...!
हाय वो महकी महकी याद
आज भी मन में डोले ।।
नानी तेरे कच्चे घर का पक्का आँगन
जहाँ बहुत से खेल
अधूरे छूट गये थे
और छूट गये थे
साथी सारे उन गलियों के
उन्हें  मन कैसे भूले ।।
 नानी तेरा गाँव
भला मन कैसे भूले ।।
...कैसे भूले ।।




मीनाक्षी वशिष्ठ
जन्म स्थान ->भरतपुर (राजस्थान )
वर्तमान निवासी टूंडला (फिरोजाबाद)
शिक्षा->बी.ए,एम.ए(अर्थशास्त्र) बी.एड
विधा-गद्य ,गीत ,प्रयोगवादी कविता आदि।

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