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मंदिर और कोठा 


एक शहर में दो मित्र थे .वे सदैव साथ साथ घूमने फिरने या मंदिर में भगवान् का दर्शन करने के लिए जाते रहते . एक दिन वे दोनों मंदिर में शिव जी का  दर्शन करने जा रहे थे .तभी बरसात शुरू हो गयी .उसी रास्ते में एक वैश्या का कोठा भी पड़ता था ,जहाँ उस समय गाने - बजाने की आवाज आ रही थी .एक मित्र के मन में आया कि क्यों न बरसात से बचने के लिए वैश्या के कोठे पर चले जाएँ ,वहाँ उसके नृत्य गीत का आनंद लिया जाए .वह 
मंदिर
मंदिर
अपने मित्र से बोला - मित्र , मैं वैश्या के घर जा रहा हूँ ,क्या तुम भी चलोगे ? दूसरा मित्र बोला - नहीं ! मैं मंदिर ही जाऊँगा .दोनों अपनी - अपनी जगह चले गए .एक मंदिर में दूसरा वैश्या के कोठे पर .

अब कोठे पर जाने वाला मित्र सोचने लगा कि मेरा मित्र तो मंदिर में भगवान् के दर्शन कर रहा होगा और मैं नाच - गाने के चक्कर में यहाँ बैठा हूँ .दूसरी ओर जो मंदिर में गया था ,वह भी सोच रहा था कि मैं तो बरसात में भीग गया और मेरा दोस्त वैश्या के आनंद से बैठा होगा .इस तरह दोनों मित्र एक - दूसरे के विषय में ही सोच रहे थे क्योंकि दोनों में पक्की दोस्ती थी . 

कुछ समय बाद एक दुर्घटना में दोनों की मृत्यु हो गयी .मरने के बाद एक स्वर्ग गया और दूसरा नरक में जा पहुँचा .जो लड़का मंदिर गया था ,उसे नरक मिला था और जो वैश्या के पास गया था ,उसे स्वर्ग .संयोगवश फिर दोनों मित्रों की वहाँ मुलाकात हो गयी .तब दोनों ने बात की .जो मंदिर गया था ,उसने मित्र से पूछा .तुम्हे स्वर्ग कैसे मिला ? तू तो कोठे पर गया था .दूसरा मित्र बोला - मैं कोठे पर जरुर गया था ,किन्तु मेरा मन तुम्हारे पास मंदिर में लगा था .अब उसको बात समझ में आ गयी कि मैं मंदिर तो अवश्य गया था ,लेकिन मेरा मन तो कोठा पर तुम्हारे विषय में ही सोचता रहा .इससे यह साबित हुआ कि मन जहाँ रहता है ,उसे वही गति मिलती है .जो भी कार्य मन लगाकर न किया जाए उस काम में सफलता नहीं मिलती और काम भी बिगाड़ जाता है .इसीलिए जो भी काम करो ,उसे मन लगाकर मेहनत से पूरा करो ,तभी सफल हो पाओगे . 


कहानी से शिक्षा - 

  • जो जैसा सोचता है और करता है ,वह वैसा ही बनता है . 
  • छोटी - छोटी भूलों पर ध्यान दें और अपना सुधार करें . 

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