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मैं लिखती हूँ


हाँ मैं लिखती हूँ....
लिखना नही जानती फ़िर भी.......,,
ताकि जो अज्ञात है ,अदृश्य है
कुछ लिख जाऊँ उसके बारे में भी
यूँ ही लिखते -लिखते.. .. ,,,
मैं लिखती हूँ
मैं लिखती हूँ
हाँ लिखती हूँ कुछ उलझा सा...
जब ये बंदी मन झटपटाता है... ,,
बार -बार लिखती हूँ ,
शायद लिख जाऊँ मैं जीवन दर्शन
सुलझे शब्दों में.. ,,
मौन कोलाहल से बेचैन हो..
लिख जाती हूँ कुछ अटपटा ,
बेतुका कभी -कभी....,,
हाँ लिखती हूँ
जिससे जो बँद है , बंदी है
मुखरित हो....!!
स्वच्छंद हो....!!
गाये , गुनगुनाए ...!!
और बताए वो कौन है..!!
जो अन्दर मौन है...!
जिसे बार -बार जानना चाहा
लाखों प्रयासों से...
फ़िर भी वो हो गया
अज्ञात ,अदृश्य ,अव्यक्त
हर बार....!
लिखती हूँ , गाती हूँ ,
कागजों पर रंग बिखराती हूँ ,,
कभी बेतरतीब....,
कभी करीने से....,
फ़िर देखने उतरती हूँ
मन के आँगन में...
ज़रा देखूं तो....!
वो जो मौन है
कुछ मुखरित हुआ क्या...?
वो जन्मांतरौं का बंदी
कुछ खुला क्या ...?
या बँधा है अभी अगणित जंजीरों में
और पाती हूँ....
वो मुक्त बंदी अभी भी
जकड़ा हुआ है
मान -सम्मान रिवाजों की...
सुनहरी जंजीरों में !!


- मीनाक्षी   वशिष्ठ"

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  1. सर्वथा मुक्त कोई नहीं, कहीं न कहीं से बँधा होता ही है
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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