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ज्ञानी और मूर्ख 
Gyani aur Murkh


भोंदू नाई नरहरी चौबे के नित बाल बनाता था ,
बनवाई में पंडितजी से दो पैसे वह पाता था .
ज्ञानी और मूर्ख
ज्ञानी और मूर्ख
बाल बनाते समय एक दिन ,महाराज को लगा छुरा,
कहा न कुछ उसने भोंदू से , यद्यपि ह्रदय में लगा बुरा .
दो की जगह आज द्विजवर ने ,पैसे उसे दस - बीस ,
अति प्रसन्न हो नाईजी तब , घर को चले नवाकर सीस .
चलते समय राह में उसने अपने मन यों किया विचार ,
छुरा मारने से ही मुझको ,पैसे मिले अधिक इस बार .
दिवस दूसरे पेटी लेकर ,चले बनाने जब वे बाल ,
करता हुआ खोज नाई की ,मिला उन्हें जब घप्पेलाल .
बाल बनाते समय लोभवश ,भोंदू चले वही फिर चाल ,
ऐसा गहरा छुरा चलाया ,ली उघेड घप्पे की खाल .
लगा रुधिर बहने घप्पे का , क्रोध वेग क्यों सके संभाल ,
झपट उठा भोंदू को उसने ,पटक दिया भू पर तत्काल .
टूट पड़ा फिर उसके ऊपर ,सिंह गाय पर हो जैसे ,
खूब जमा जूते कस - कसकर ,छीन लिए पेटी - पैसे .


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