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ये मेरा वादा रहा

             
मैं शराब नहीं पीता, पर शराब पीनेवालों से घृणा नहीं करता। लोग कहते हैं कि गम भुलाने के लिये शराब एक नुक्सा है परन्तु बात ऐसी नहीं है। शराब तो दुख का श्रृंगार करती है --- दुख को सजाने-संवारने का काम करती है --- जिससे दुख मनमोहक बन जाता है। सच में, मैखाना  दुख का ‘ब्युटी पार्लर’ से कुछ कम नहीं होता। मनुष्य को दुख से प्यार होने लगता है और वह दुख खोजने लगता है ताकि उसे पीने का बहाना मिलता जावे। शराब से ऐसा इश्क हो जाता है कि इसका दीवाना बना मनुष्य लाख चाहकर भी पीने की लत से छुटकारा नहीं पा सकता। 
खैर, जो पीते हैं, अपनी मर्जी से पीते हैं। अपना भला-बुरा, अपना सुख-दुख वे ही समझते हैं। हरेक आदमी अपने
शराब
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आप में एक नमूना होता है। विज्ञान ‘क्लोनिंग’ तो कर सकता है, पर फिर भी सोचने की प्रक्रिया की क्लोनिंग नहीं कर सकता। हर जीव एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न ही बनते हैं। कहा जाता है कि ईश्वर ने इन्सान बनाने का काम ठीक उसी तरह किया है जैसे नथ्थू प्याज के भजिये तला करता है। दो भजिये हू-बहू एक से कभी नहीं बनते। हरीप्रसाद सोनी को ही लीजिये। सब लखपतियों में वह अपने ढंग का अनोखा जीव है। वह कभी सोने-जवाहरात का धंधा करता था, उसकी गिनती लखपतियों में हो गई थी। अब वह सिर्फ शराब पीने का काम करता है। उसकी उम्र 70-80 के करीब होगी क्योंकि 80-90 का होना तो नामुमकिन-सा लगता है। वजह साफ है कि शायद ही कोई शराबी इस उम्र तक अपनी सेहत बचा पाता है। जितनी वह पीता है, उससे यही कहा जा सकता है कि वह कई वर्ष पहले मर चुका होगा। उसकी उम्र 70 वर्ष होगी इसमें भी संदेह है। शराब आदमी को जल्दी बूढ़ा बना देती है। पचास वर्ष की उम्र का आदमी भी सत्तर का दिखने लगता है।
हरीप्रसाद बोलता बहुत कम है। जो कुछ उसे बोलना होता है, वह अपने पैसों से बुलवा लेता है। वह नोट रखकर इशारे से व्हिस्की माँगता है। शांति के साथ पीता है और मन ही मन मुस्कराता भी जाता है। वह रात के आठ-नौ बजे के बीच आता है और देर रात तक पीता रहता है। होटल के बाहर ‘कार परर्किंग’ में उसकी कार का स्थान निश्चित है। उसकी सेवा में अब्दुल और दीनू --- बस ये दो जन --- रखे गये हैं। हरीप्रसाद भी बस इन दो व्यक्तियों को जानता है। बाकी सभी उसके लिये अजनबी हैं। होटल एक निर्धारित समय पर बंद होती है, पर एक छोटा दरवाजा हरीप्रसाद के लिये खुला रखा जाता है। उसका देर रात तक पीना बारवालों को भी अच्छा नहीं लगता। अब्दुल व दीनू भी कभी-कभी झुँझला जाते हैं और हरीप्रसाद को ‘बस और नहीं’ कहकर उसका पीना रोकने का असफल प्रयास करते हैं। पर ऐसा कभी-कभार ही कहा जाता है। वजह साफ है। हरीप्रसाद हरेक बोतल के खत्म होने पर उन्हें अच्छी ‘टिप’ देता है। टिप पाने की लालच में बारात के बेंड़वाले भी इसी कोशिश में रहते हैं कि उनकी कर्कश धुन पर बाराती देर तक नाचते रहें। सरकारी दफ्तरवाले भी इसी कारण देर रात तक और सभी छुट्टी के दिन काम करने का नाटक रचाते दिखते हैं। दफ्तर का ‘बॉस’ भी छुट्टी के दिन के लिये ‘जरूरी’ काम का ‘स्टाक’ बनाये रखता है। बाबू अपनी कमायी में लीन रहते हैं और बॉस अपने हिस्से में आती रकम पर ‘बकध्यानावस्था’ में कुर्सी पर विराजमान रहता है। सब को नशा है --- पैसे कमाने का। कमाईवाले हरेक दफ्तर को देर रात खुला रखने का नुक्सा सभी अच्छी तरह से जानते हैं।
परन्तु अब्दुल व दीनू को हरीप्रसाद का यूँ देर रात बैठकर पीना अच्छा नहीं लगता है यद्यपि घड़ी की सुई के आगे बढ़ने के साथ-साथ टिप में भी इजाफा होता जाता है। वे दोनों हरीप्रसाद को सहारा देकर उसकी कार तक पहुँचाने में भी उत्साहित रहते हैं। हरीप्रसाद को कार में बिठाकर वे सलाम ठोकते हैं। हरीप्रसाद धुत्त नशे में उनको उस समय नोट थमाना कभी नहीं भूलता।
‘कम्बख्त, नशे में भी गाड़ी अच्छी चला लेता है,’ अब्दुल ने कहा।
दीनू पलटकर जवाब देता है, ‘जब तक दुर्घटना नहीं होती, सभी का गाड़ी चलाना अच्छा कहा जाता है।’
‘सच है, अभी तीन महिने पहले ही ये महोदय झाड़ से टकरा ही गये थे। शुक्र है कि फुटपाथ की मेड़ ने गाड़ी को झाड़ से दूर पर ही रोक लिया था।’
आज भी देखा तुमने,’ दीनू ने कहा, ‘कैसे झटके से गाड़ी चालू की थी।’
‘हाँ, आज कुछ ज्यादा ही चढ़ा ली है उसने।’
‘मैंने तो कहा भी था कि अब उसे और न दी जावे। तुम्हीं नहीं माने।’
अब्दुल मुस्कराने लगा, ‘मेरे मना करने पर वह पाँच सौ के नोट दिखाने लगा था। भला आती दौलत को कोई ठुकरा सकता है?’
‘पर उसका जिन्दा रहना ज्यादा जरूरी है, कुछ समझे।’
‘सो तो है। मेरी दुआ यही चाहती है कि वह लम्बी उमर पावे।’
‘काश! दुआ का असर पियक्कड़ों पर होता।’
‘होता है,’ अब्दुल ने जोर देकर कहा।
‘बशर्ते, दुआ देनेवाला होश में हो,’ दीनू ने अब्दुल पर व्यंग कसा और दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।
दूसरे दिन हरीप्रसाद को बार की ओर आता देख दीनू चहक उठा, ‘देख अब्दुल, वो आ रहा है। वह आज भी जिन्दा है।’
‘देखा, मेरी दुआ काम आ गई ना,’ अब्दुल ने ऐंठकर कहा।
भूपेन्द्र कुमार दवे
भूपेन्द्र कुमार दवे
फिर दोनों हरीप्रसाद की खिदमत में लग गये। हरीप्रसाद पीता रहा और इनकी जेबें गरम होती रही। रात एक बजे दौर पूरा हुआ। आज हरीप्रसाद ज्यादा खुश नजर आया, पर गाड़ी में बैठते ही वह एक ओर लुढ़क गया। दीनू व अब्दुल ने उसे उठाकर सीट पर लिटा दिया और बार बंद करने चल पड़े। हरीप्रसाद रात भर उसी हालत में गाड़ी में पड़ा रहा या नहीं इसकी खोज-खबर उन दोनों ने नहीं की। परन्तु घर लौटते समय दोनों ने कसम खाई कि आईंदा उसे इतनी पीने नहीं देंगे। हरीप्रसाद को जिन्दा रखना है। इसके लिये यह आवश्यक है  कि वह एक हद के बाहर न पिये और गाड़ी चलाकर सुरक्षित घर पहुँच जाया करे। शराब एक दुर्घटना के अतिरिक्त और क्या कुछ करती है इसकी चर्चा उन दोनों ने नहीं की। शायद वे इस बारे में कुछ जानते ही न थे या फिर इस ज्ञान से उनका कोई सारोकार ही न था।
अगले दिन हरीप्रसाद जब बार में पहुँचा तो दीनू ने देखा कि उसके माथे और बाँये हाथ पर पट्टी बँधी थी। अब्दुल की ओर देखकर दीनू यकायक बोल उठा, ‘क्या कल तुमने इनके लिये दुआ नहीं माँगी थी।’
अब्दुल निरुत्तर रहा। एक चूक का इतना असर पड़ेगा, उसने सोचा ही न था। हरीप्रसाद की इस हालात का एकमात्र जिम्मेदार वही है, उसने माना। अब्दुल को इस तरह सोच में पड़ा देख दीनू ने पूछा, ‘क्यों अब्दुल किस सोच में पड़ गये हो?’
अब्दुल चुप रहा।
‘क्या हुआ?’ दीनू ने हरीप्रसाद से पूछना चाहा पर लफ्ज ओठ पर ही रुक गये। हरीप्रसाद जिन्दा है इसलिये रोज की तरह पीने बैठ जाता है। इसके आगे दीनू व अब्दुल खोज-खबर लेने की हिम्मत नहीं हुई या फिर उन्होंने इसकी जरुरत ही नहीं समझी।
अब्दुल को याद है कि एक बार उसने कुछ प्रश्न हरीप्रसाद से किये थे। शायद उसके पीने की वजह जानने या फिर उसके ठौर-ठिकाने की जानकारी पाने। तब हरीप्रसाद की आँखें लाल हो उठीं थी। अब्दुल यह जानता था कि हर पियक्कड़ का गुस्सा लाल कपड़े को देखकर उत्तेजित साँड़ से कम नहीं होता। वह वहाँ से तुरन्त खिसक गया था। दीनू को भी उस दिन हरीप्रसाद ने ‘टिप’ देने में कंजूसी की थी। दीनू और अब्दुल में उस दिन खूब ठनी।
‘तुम्हें क्या जरुरत थी उसका मूड़ खराब करने की?’ दीनू ने अब्दुल को आड़े हाथ लिया।
‘आखिर वो अब अपना है,’ अब्दुल ने सफाई देते हुए कहा, ‘ऐसे शख्स की खोज-खबर हमें रखनी ही चाहिये।’
‘क्या यह बहुत जरुरी है?’
‘हाँ। जरुरत है। क्या पता हमें उसे उठाकर कभी उसके घर तक ले जाना पड़े । तब हम उसे कहाँ ले जावेंगे? कुछ अता-पता या उसका फोन नंबर भी तो अपने पास नहीं है।’
‘किस किस का पता रखेंगे हम? यहाँ तो दिन-रात सैकड़ों आते हैं और सभी अधमरे होने तक पीते हैं।’
‘सो तो है,’ अब्दुल ने गंभीर मुद्रा में कहा, जैसे कुछ सोच में पड़ गया हो। फिर कुछ देर बाद बोला, ‘पर दीनू, यह हरीप्रसाद तो हमारा खास है ना।’
‘वो कुछ नहीं है। हाँ, उसके पैसे जरूर खास हैं।’
‘वही तो मैं कह रहा था।’
‘तो क्या उसका अता-पता लगाकर उसके यहाँ डकैती करने का प्लान है?’
यह सुन अब्दुल चीख पड़ा, ‘अब्दुल ऐसा सोच भी नहीं सकता। अब्दुल खुदा का बंदा है। समझे।’
दीनू ने इसके बाद अब्दुल से कुछ नहीं कहा। वह बार बंद कर सढ़क पर आ चुका था।
हरीप्रसाद का पीना तथा ज्यादा पीने का क्रम चलता रहा। दोनों हरीप्रसाद को कभी-कभार ज्यादा न पीने की हिदायत भर दे दिया करते थे। वह उनका कहा मानकर उठ खड़ा हो जाता। पर अब वह जल्द लड़खड़ाने भी लगा था। शराब का असर उसपर जल्द व ज्यादा ही होने लगा था। अब्दुल और दीनू ने इस कमजोरी को भाँप लिया था। होटल में आते समय भी उन्होंने हरीप्रसाद को लडखड़़ाते देखा था जैसे वह पहले ही पीकर आया हो।
‘क्या सेहत खराब होने से शराब की खुमारी लम्बे समय की हो जाती है?’ अब्दुल ने पूछा।
अब्दुल के इस प्रश्न पर दीनू ने हरीप्रसाद को गौर से देखा। उसे हरीप्रसाद की अधखुली आँखें और चेहरे के अनमने भाव ने विचलित कर दिया। ‘अब्दुल!’ दीनू ने धीमी आवाज में कहा।
‘क्या बात है?’
‘यार, इसे जिन्दगी की पटरी से फिसलने में अब देर नहीं लगेगी।’
‘पर हम कर भी क्या सकते हैं?’ अब्दुल ने लापरवाही से कह तो दिया पर वह भी दीनू की तरह भीतर ही भीतर कँप उठा।
‘एक उपाय है,’ दीनू ने कहा और अब्दुल से आगे कुछ कहे बगैर हरीप्रसाद के पास आया और बोला, ‘साहब, आज नहीं है।’
हरीप्रसाद यह सुनने का आदी नहीं था, वह एकदम शेर की तरह दहाड़ा, ‘क्या बकता है?’
‘आज नहीं है,’ दीनू ने दुहराया।
‘क्या कहा?’ इतना कहकर हरीप्रसाद ने दीनू की गर्दन अपने हाथों की गिरफ्त में ले ली। परन्तु अब्दुल को अपनी ओर आता देख हरीप्रसाद ने अपनी पकड़ ढीली कर दी। अब्दुल ने कालर पकड़कर हरीप्रसाद को जमीन से अपने छः फीट के कद के बराबर उठाकर कुर्सी पर हरीप्रसाद को पटक दिया।
कुर्सी पर बैठते ही हरीप्रसाद ने बगैर कुछ कहे जेब से नोट की गठ्ठियाँ निकाली और मेज पर बिखेर दी। लेकिन अब्दुल ने एक ही झटके में सारी गठ्ठियाँ हरीप्रसाद की कमीच की जेब में ठूँस दी। और कहा, ‘आज नहीं पीने का। सुना आपने, आज नहीं पीने का।’
हरीप्रसाद आग बबूला हो उठा। उसके माथे पर उभरती पसीनें की बूँदें धार बनकर बहने लगी। फिर भी उसने काँपते हाथों से पैसे जेब से निकाले और अब्दुल की तरफ बढ़ाकर गिड़गिड़ाने लगा, ‘बस एक।’
‘नहीं माने, नहीं,’ अब्दुल ने ऊँची आवाज में कहा। हरीप्रसाद का चेहरा रुआँ-सा देख दीनू को तरस आ गया। पर अब्दुल ने दीनू के हाथ से बोतल छीनकर जमीन पर दे मारी, ‘मैंने कह दिया, आज नहीं पीने का। बस, इसके आगे कुछ नहीं।’
अब सब तरफ सन्नाटा-सा छा गया। हरीप्रसाद सिर नीचा किये दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा। दरवाजे की चौखट पर आकर हरीप्रसाद एक क्षण रुका और पलटकर देखने लगा। बार के पीछे कतारबद्ध शराब की बोतलें रखीं थी और करीने से वो शीशे भी सजे थे जिससे वह शराब पिया करता था। उसकी आँखें नम हो उठी। दीनू ने अब्दुल से कहा, ‘आज हमने अच्छा नहीं किया।’
‘क्या अच्छा --- क्या बुरा --- यह तो समय बतायेगा। इसकी सेहत तो देखो। ज्यादा से ज्यादा दो-तीन दिन पियेगा और उसके बाद ‘टें’ हो जावेगा।’
‘लेकिन मना करने पर तो यह अधमरा-सा अभी ही लगने लगा है। बिन पिये तो यह जी ही नहीं सकेगा।’
‘तो मैं क्या करू?’ अब्दुल बोला, ‘जान-बूझकर मैं उसे मौत की ओर ढकेल भी नहीं सकता।’
‘अब्दुल उसके चेहरे को देखो। ऐसा लगता है कि मौत उसे नहीे, वह स्वयं मौत को बुला रहा है।’
‘तुम क्या सोचते हो कि ये खुदकुशी करेगा? यहाँ नहीं मिली तो कहीं और जाकर पियेगा। खुदकुशी तो आदमी पहली बुँद पीकर ही कर चुका होता है। पीने की लत पड़ जाने पर आदमी को न जीने का और न मरने का होश रहता है।’
‘मुझे तो लगता है आज हमने ठीक नहीं किया,’ दीनू ने एक बार फिर वही वाक्य कहा। दीनू के इन शब्दों को सुन अब्दुल ने हरीप्रसाद के चेहरे को पढ़ने दरवाजे की ओर देखा। हरीप्रसाद बाहर जा रहा था। अचानक वह रुका और कहने लगा, ‘तुम दोनों ही मेरे मित्र रहे हो। तुम्हें खोने का मुझे दुख है। खैर, मैं आज से शराब नहीं पियूँगा। ये मेरा वादा रहा।’ इतना कह हरीप्रसाद ने अपने पैर बाहर बढ़ाये।
अब्दुल और दीनू कुछ कह पाते, तब तक हरीप्रसाद बाहर जा चुका था। सड़कबत्ती की तेज रोशनी में एक लड़खड़ाता साया दूर हटता दिखाई दे रहा था। अब्दुल दीनू का हाथ पकड़कर बाहर आया। दोनों शायद सोच रहे थे कि पियक््कड़ ऐसे वादे कई बार करते हैं, पर पीना की लत छुटती नहीं है। हरीप्रसाद अब कार में बैठ चुका था। दोनों ने उसके करीब जाकर सलाम ठोकना चाहा।
पर तब तक हरीप्रसाद अपनी कनपट्टी पर रखी पिस्तौल चला चुका था।

                        


यह रचना भूपेंद्र कुमार दवे जी द्वारा लिखी गयी है आप मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल से सम्बद्ध रहे हैं आपकी कुछ कहानियाँ व कवितायें आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है 'बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ''बूंद- बूंद आँसू' आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैसंपर्क सूत्र - भूपेन्द्र कुमार दवे,  43, सहकार नगररामपुर,जबलपुरम.प्र। मोबाइल न.  09893060419.           

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