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ज़द्दोज़हद 



नींद खुल गयी तपाक से
ऐसा लगा, जैसे तुम मेरे पास बैठे हो
आँखें अभी भी नींद से बोझिल ही थीं
आभा सिंह
आभा सिंह
तुम्हें छूने को जैसे ही मैंने हाँथ बढ़ाया
तुम तो कहीं हवा में भी नहीं थे मेरे पास
तुम तो इतनी दूर किसी ऐसी जगह जा बैठे हो
न तुम तक मेरी ख़ामोशी पहुंचती है
न मेरे होने की आहट.......

एक कमज़र्फ तुम्हारे होने का अहसास
जिसे मैं सीने में कहीं दफ़न कर देना चाहती हूँ
कि तुम्हारे होने की फ़िक्रमंदी से बिलख होकर
पर तुम.....
तुम्हें अहसासियत के 'अ' का इल्म तक नहीं है.....

तुम सूरत ढूंढने वाले ख़रीदारार निकले
और मैं सीरत की दुकान पर बैठती हूँ
वही बेचती हूँ
वही खरीदती हूँ
तुम्हें जो मैंने बेचने के लिए
अपनी दुकान की सभी
सीरतों को बिछा दिया था तुम्हारे सामने
अपने अंचल में,
सभी सीरतों को नज़रअंदाज़ कर
तुमने मेरा आँचल उठा लिया था.....

तुम तो चले गए
मेरा आँचल तुम्हारे साथ ही चला गया
सीरत यहीं रह गयी
सूरत से पराजित होकर.......


- आभा सिंह 

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