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मच्छर चालीसा 
Machar Chalisa


जय मच्छर बलवान उजागर, जय अगणित रोगों के सागर ।
नगर दूत अतुलित बलधामा, तुमको जीत न पाए रामा ।

गुप्त रूप घर तुम आ जाते, भीम रूप घर तुम खा जाते ।
मच्छर
मच्छर
मधुर मधुर खुजलाहट लाते, सबकी देह लाल कर जाते ।

वैद्य हकीम के तुम रखवाले, हर घर में हो रहने वाले।
हो मलेरिया के तुम दाता, तुम खटमल के छोटे भ्राता।

नाम तुम्हारे बाजे डंका ,तुमको नहीं काल की शंका।
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारा, हर घर में हो परचम तुम्हारा।

सभी जगह तुम आदर पाते, बिना इजाजत के घुस जाते।
कोई जगह न ऐसी छोड़ी, जहां न रिश्तेदारी जोड़ी।

जनता तुम्हे खूब पहचाने, नगर पालिका लोहा माने।
डरकर तुमको यह वर दीना, जब तक जी चाहे सो जीना।

भेदभाव तुमको नही भावें, प्रेम तुम्हारा सब कोई पावे ।
रूप कुरूप न तुमने जाना, छोटा बडा न तुमने माना।

खावन-पढन न सोवन देते, दुख देते सब सुख हर लेते।
भिन्न भिन्न जब राग सुनाते, ढोलक पेटी तक शर्माते .

बाद में रोग मिले बहु पीड़ा, जगत निरन्तर मच्छर क्रीड़ा।
जो मच्छर चालीसा गाये, सब दुख मिले रोग सब।


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