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हिंदी गद्य के विकास में द्विवेदी युग की भूमिका 


भारतेंदु के पश्चात हिंदी गद्य धारा को महत्वपूर्ण मोड़ देने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं .उनकी साहित्यिक सेवाओं और प्रभाव के कारण ही हिंदी गद्य का दूसरा युग सन १९०३ से सन १९२० तक का समय द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है .भारतेंदु युग के लेखकों ने साहित्य रचना तो बड़े वेग से ही ,किन्तु वे भाषा का परिष्कार न कर सके .उसमें व्याकरण की अशुद्धियाँ ,पद - विन्यास एवं वाक्य विन्यास सम्बन्धी त्रुटियाँ बनी रही .आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जी ने सन १९०३ में सरस्वती पत्रिका के संपादन और प्रकाशन द्वारा भाषा के परिमार्जन ,संसार और परिष्कार का महत्वपूर्ण कार्य किया .उन्होंने साहित्यकारों का ध्यान हिंदी गद्य की त्रुटियों की ओर आकर्षित किया .अपरिपक्व लेखकों की भाषा शैली की आलोचना की ,नवयुवक साहित्यकारों को प्रोत्साहित .उनकी प्रेरणा और मार्ग दर्शन पाकर गद्य की विविध विधाओं में उच्चकोटि के साहित्य का निर्माण हुआ .द्विवेदी जी ने भाषा का एक स्तर प्रतिशितित किया .शब्द भण्डार की वृद्धि के साथ भाषा को गहन भावों को व्यक्त करने के योग्य बनाया .द्विवेदी जी ने खड़ीबोली को गद्य की भाषा ही नहीं ,पद्य की भाषा भी बनाया . 

द्विवेदी युग में निबंध साहित्य का विशेष विकास हुआ .विचारात्मक ,वर्णनात्मक,अलोचात्मक ,भावनात्मक ,कलात्मक आदि सभी प्रकार के निबंध इस युग में लिखे गए .द्विवेदी स्वयं श्रेष्ठ निबंधकार थे .इनके अतिरिक्त अध्यापक पूर्ण सिंह ,गोपालराम गहमरी ,माधवप्रसाद मिश्र ,पद्मसिंह शर्मा ,बालमुकुन्द गुप्त आदि इस युग के प्रमुख निबंधकार है .हिंदी कहानी का प्रारंभ भी दिवेदी युग से ही माना जाता है .सरस्वती पत्रिका में अनेक मौलिक कहानियाँ प्रकाशित हुई .किशोरीलाल गोस्वामी ,गुलेरी ,बंग महिला आदि इस युग के प्रसिद्ध कहानीकार है .इस काल में मौलिक और अनुदित नाटकों की भी रचना हुई .मौलिक नाटककारों में बद्रीनारायण भट्ट ,किशोरीलाल गोस्वामी आदि प्रमुख है .दूसरी ओर सीताराम ,रामकृष्ण वर्मा ,सत्यनारायण आदि ने संस्कृत ,बंगला ,अंग्रेजी के नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया .इसके अतिरिक्त उपन्यास ,आलोचना आदि विधाओं पर श्रेष्ठ गद्य साहित्य का सृजन हुआ . 

इस युग ने हिंदी साहित्य को अनेक नवयुवक ,रचनाकार प्रदान किये और हिंदी भाषा को व्याकरण सम्मत रूप प्रदान किया .सरस्वती पत्रिका के माध्यम से द्विवेदी युग ने हिंदी की आलोचना विधा का मार्ग प्रशस्त किया .इस युग में द्विवेदी युग के अतिरिक्त बालमुकुन्द गुप्त ,माधवप्रसाद मिश्र ,प.पद्मसिंह शर्मा ,अध्यापक पूर्णसिंह ,चंद्रधर शर्मा गुलेरी ,मिश्र बंधू ,प्रेमचंद आदि लेखकों ने हिंदी गद्य साहित्य की श्री वृद्धि की .आचार्य रामचंद शुल्क ,जयशंकर प्रसाद ,प्रेमचंद ,गुलाबराय ,श्यामसुन्दर दास जैसे लेखकों ने इसी युग में श्रेष्ठ साहित्य रचना प्रारंभ कर दी थी ,जिन्होंने आगे चलकर हिंदी गद्य साहित्य को गरिमा के उच्च शिखर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया .इस युग के साहित्यकार में जहाँ एक ओर राष्ट्रीय भावना पायी जाती है ,वहीँ दूसरी ओर इसमें नारी सुधार और समाज सुधार की प्रवृत्ति भी विद्यमान है . 


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