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हिंदी और हम 



“यूनान,मिस्र,रोमां सब मिट गये जहाँ से ,
कुछ तो ऐसी बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी | “

भारतीय संस्कृति और हमारी भाषा हिंदी दोनों पर ये बात एकदम सटीक बैठती है|किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी संस्कृति,उसकी भाषा से होती है|हिंदी मात्र एक भाषा नहीं बल्कि मातृभाषा है | अनेक राज्यों में बोले जाने के कारण इसमें कुछ क्षेत्रीय बदलाव आना स्वाभाविक सी बात है| तभी तो कहा जाता है –

कोस–कोस पर बदले पानी,चार कोस पर बानीं |

हिंदी  भाषा का विकास -  

हिंदी
संस्कृत से जन्मी हिंदी हमेशा से इसी रूप में नहीं थी|प्राचीन भारत में वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत दो भाषाएँ थीं|मध्य भारतीय आर्य भाषाकाल  में पालि,प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाएँ विकसित हुईं|ब्रज और अवधी भाषाओँ से गुजरते हुए आज की खड़ी बोली ने अपना स्वरुप पल्लवित कर लिया|विदेशी लोगों के आगमन की वजह से इसमें समय-समय पर बदलाव आते रहे और यही इसके जीवंत होने का प्रमाण है|कहीं संस्कृत के शब्द हैं तो कहीं उर्दू के,कहीं अंग्रेजी है तो कहीं फारसी|इन सबसे हिंदी भाषा का विकास ही हुआ है|प्राचीन काल में अवधी एवं बृजभाषा का बहुत महत्त्व था|और आज भी या कभी भी, इन बोलियों को हम अपने जीवन से निकाल नहीं सकते|क्योंकि विश्व के सर्वश्रेष्ठ साहित्य की रचना इन भाषाओँ में हुई है|हमारे जीवन का आधार ग्रन्थ राम चरित मानस अवधी भाषा में लिखा गया है|कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन बृजभाषा में ही हुआ है|इसीलिए भले ही आज इन का क्षेत्र सीमित हो गया हो लेकिन ये हमेशा भारत के ही नहीं बल्कि विश्वपटल पर भी विद्यमान रहेंगी |


विश्व में हिंदी का स्थान - 

हिंदी विश्व की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है|और पहले स्थान पर है चाइनीज़|क्यों ? ये एक विचारणीय प्रश्न है|चीन की जनसंख्या सर्वाधिक है इसलिए वह प्रथम स्थान पर है|भारत की जनसंख्या भी बहुत है पर फिर भी, द्वितीय स्थान भी न पा सके क्योंकि हिंदी भाषी लोगों की संख्या भारत में ही कम होती जा रही है| हिंदी को तो अपने घर में सौतेले व्यवहार का सामना करना पड़ता है|अंग्रेज़ों ने बड़े लोगों की भाषा, शासकों की भाषा के रूप में अंग्रेजी का जो बीज बोया था आज वो एक विशाल वट वृक्ष बन चुका है| आज के माता-पिता बच्चे के जन्म के साथ ही उसमें अंग्रेज़ी सोच और शब्द के बीज बोने लग जाते हैं|बच्चे से दैनिक वार्तालाप भी हिंदी में न करके अंग्रेज़ी या फिर अपनी बोली में करना पसंद करते हैं|बड़े और अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों में प्रवेश पाने की प्रतिस्पर्धा ने लोगों के सोचने का तरीका ही बदल दिया है|पर क्यों.......?उन्नति के लिए अन्य भाषाएँ सीखना कोई गलत काम नहीं है किंतु अपनी मातृभाषा की अवमानना करना गलत है|
विद्यालयों में छात्रों के लिए हिंदी साहित्य अब कठिन विषय हो गया है|वे अपने विचारों को न तो सही से लिख पाते हैं और न बोल पाते हैं|आजकल की पीढ़ी न तो हिंदी छोड़ सकी और न ही अंग्रेज़ी को पूरी तरह अपना सकी|इसलिए तो वे आजकल हिंगलिश भाषी हो चुके हैं|पर हिंदी विदेशों में लोगों को आकर्षित कर रही है|तभी तो आज हर जगह हिंदी विद्यालयों की स्थापना हो रही है| 


इंटरनेट की दुनिया में हिंदी -                     

आजकल हर कोई मोबाइल और इन्टरनेट का प्रयोग करता है|आज की इस सूचना  क्रांति में भी हिंदी का तेजी से प्रचार और प्रसार हो रहा है|हिंदी भाषा का इतना अधिक मांग है कि दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल  ने भी वर्ष 2009 में हिंदी भाषा को अपना लिया और हिंदी की लोकप्रियता इतनी अधिक है कि दूसरी भाषा के मुकाबले हिंदी 94% की वृद्धि दर से सबसे आगे बढने वाली भाषा है जिसे गूगल भी मानता है|  अनेक प्रकार के हिंदी मोबाइल एप्प भी मौजूद है|
हर जगह इन्टरनेट पर हिंदी भाषा के रूप में कुछ भी सर्च  कर सकते है और कोई भी जानकरी हिंदी में भी प्राप्त कर सकते है|
यहाँ तक कि गूगल खुद ऑनलाइन हिंदी टाइपिंग के लिए गूगल हिंदी टाइपिंग टूल  सेवा प्रदान करता है| हिंदी दिनप्रतिदिन  प्रगति कर रही है तभी तो हिंदी दिवस वैश्विक स्तर पर भी मनाया जाता है| आज आवश्यकता है हम सब के शपथबद्ध होने की कि हम अपनी मातृभाषा को पूरा सम्मान दें| 

जय हिंदी जय भारत 



लेखिका-
इलाश्री जायसवाल(हिंदी अध्यापिका)  
91,हारमनी अपार्टमेंट 
c-58/16,सेक्टर-62 
नॉएडा 201301 
मो-9911542580 

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  1. इलाश्री जी,
    पहले तो सुधार कर लें हिंदी कुछ भारतीयों की मातृभाषा है " भारतीयों" की मातृभाषा नहीं. हिंदी को इसी तरह थोपे जाने के कारण अहिंदी भाषियों में हिंदी का विरोध है. दूसरा हम हिंदी भाषी बस बोलते हैं कि यह करना चाहिए वह करना चाहिए. कौन करता है? आप शिक्षिका हैं जानती ही होंगी.. उद्यमें नहिं सिद्ध्यंती कार्याणि न मनोरथैः.
    हिंदी को अंग्रेजी के समतुल्य या बेहतर बनाया जाए तो लोग मजबूरी में हिंदी से आकर्षित होंगे. साथ ही यह भी उल्लेख करना चाहूँगा कि हिंदी राष्ट्र भाषा भी नहीं है. केवल राजभाषा है... अंग्रेजी फिर वहाँ भी साथ बैठी है.
    विस्तार के लिए ISBN9789387905245 (हिंदी: प्रवाह और परिवेश" पढ़ें.
    संपर्क क हेतु ब्लॉग laxmirangam.blogspot.in

    देखें.


    एम आर अयंगर.

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    1. आप की टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद|मैं हिंदी भाषा से प्रेम करती हूँ इसलिए अगर कोई उसे राष्ट्रभाषा कहकर बुलाता है तो मैं उसका विरोध नहीं करती बल्कि हृदय से चाहती हूँ कि उसे वह स्थान मिले जिसकी वह अधिकारिणी है|हिंदी का विरोध वही करता है जो इस भाषा से प्रेम नहीं करता|हिंदी भाषा की समृद्धता को परिचय की आवश्यकता नहीं है और न ही अंग्रेजी की बैसाखी की|हम अंग्रेजों से तो आज़ाद हो गए पर अंग्रेजी के रूप में भाषायी गुलाम बन गए|मैं सभी भाषाओँ का सम्मान करती हूँ पर अपनी भाषा की अवमानना नही करती|और यही अपेक्षा मैं हर सच्चे भारतवासी होने से करती हूँ|

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    2. आप बेनामी रहकर जवाब दे रही हैं.
      यदि राजभाषा नहीं है बताना उसका अपमान है तो वही सही, पर जानकारी देना मैंने अपना फर्ज समझा.चाहना और यथार्थ को स्वीकारना दो अलग बातें हैं.आप मानें या न मानें आज भी हिंदी अंग्रेजी के स्तर की तो नहीं ही है. और जब तक उस दिशा में काम नहीं होगा, हिंदी अंग्रेजी को अपदस्थ नहीं कर सकेगी. सत्यता के कहने से अपमान होने की आपकी मंशा को बदलना होगा. इन सब बातों से आप किसी को सच्चा भारत वासी होने का सत्यापन नहीं कर सकती. ये तो सरकार के देशद्रोही सर्टिफिकेट जैसा हो गया. हिंदी के प्रति मेरी रुचि इसी पोर्टल पर देख सकती हैं. लिंक दे रहा हूँ.

      http://www.hindikunj.com/p/mr.html

      सादर
      अयंगर

      हटाएं

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